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पद्मिनी एकादशी व्रत कथा (Padmini Ekadashi Vrat Katha)

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से संतान सुख, यश और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है. साथ ही, व्यक्ति को वैकुंठ धाम की प्राप्ति का फल भी मिलता है. इस दिन पूजा के दौरान पद्मिनी एकादशी व्रत कथा का पाठ करना बेहद महत्वपूर्ण माना गया है.

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा
पद्मिनी एकादशी व्रत कथा

राजा कीतृवीर्य की कई रानियां थीं, परंतु उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हो रही थी. संतानहीन होने के कारण राजा और रानियां बहुत दुखी रहते थे. फिर एक दिन संतान की कामना से राज अपनी रानियों के साथ जंगल में तपस्या करने निकल गए. कहते हैं कि तपस्या करने से राजा की हड्डियां ही शेष रह गयी परंतु तपस्या का कोई परिणाम नहीं निकला. तब रानी ने अनुसूया मां से इसका उपाय पूछा. 

 

माता अनुसूया ने रानियों से अधिकमास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा. रानी ने पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा. व्रत की समाप्ति पर भगवान प्रकट हुए और वरदान मांगने के लिए कहा. रानी ने भगवान से कहा कि हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे बदले मेरे पति को वरदान दीजिए. तब भगवान ने राजा से वरदान मांगने के लिए कहा. राजा ने प्रमाण करने के बाद कहा कि आप मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सर्वगुण सम्पन्न हो, आपके अतिरिक्त किसी से पराजित न हो और जो तीनों लोकों में आदरणीय हो. यह सुनकर भगवान ने कहा तथास्तु!

 

कुछ समय पश्चात रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से जाना गया. कालान्तर में यह बालक अत्यंत पराक्रमी राजा हुआ जिसने रावण को भी बंदी बना लिया था. इसकी तीनों लोकों में कीर्ति हो चली थी. बाद में इसे श्रीहरि विष्णु के ही अवतार परशुरामजी ने इसका वध किया था.

 

विष्णु जी आरती 

 

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

 

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

 

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

 

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

 

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

 

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

 

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

 

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

 

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

 

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

 

-------समाप्त-------
 

समाप्त

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