स्कंद षष्ठी पर भगवान कार्तिकेय की पूजा के साथ व्रत कथा सुनने का विशेष महत्व माना गया है. मान्यता है कि शुक्ल पक्ष की षष्ठी को कार्तिकेय का जन्म हुआ था. उन्होंने तारकासुर का वध किया था. स्कंद पुराण के अनुसार इस दिन पूजा और व्रत करने से गंभीर पापों से मुक्ति मिलने की मान्यता है.
कथा के अनुसार, प्राचीन काल में तारकासुर नाम के एक शक्तिशाली दैत्य ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की. प्रसन्न होकर महादेव ने उसे वरदान दिया कि उसका वध केवल शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकता है. वरदान प्राप्त कर दैत्य ने तीनों लोकों में उत्पात मचाना शुरू कर दिया. उस समय माता सती ने आत्म त्याग कर लिया था और भोलेनाथ भी वैराग्य में लीन थे. उनकी कोई संतान भी नहीं थी.
तारकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे थे, जहां उन्होंने ब्रह्म देव को बताया कि तारकासुर का वध केवल शिव पुत्र ही कर सकता है. लेकिन समस्या यह थी कि वैरागी शिव को गृहस्थ जीवन में कैसे लाया जाए. इसके बाद देवताओं ने माता पार्वती (जो सती का अवतार थीं और शिव को पति रूप में पाने के लिए तप कर रही थीं) और शिव के विवाह की योजना बनाई. इसके लिए प्रेम के देवता कामदेव (मन्मथ) को भेजा गया. कामदेव ने शिव पर अपने पुष्प बाण चलाए, जिससे शिव में प्रेम की भावना जागृत हुई, लेकिन छल का पता चलने पर क्रोधित शिव ने अपनी तीसरी आंख खोल दी, जिससे कामदेव भस्म हो गए.
कामदेव की पत्नी रति और देवताओं के अनुरोध पर शिव ने कामदेव को बिना शरीर के जीवित कर दिया और माता पार्वती से विवाह के लिए सहमत हो गए. विवाह के पश्चात भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख से छह चिंगारियां उत्पन्न कीं. इन चिंगारियों को अग्नि देवता ने सरवण नदी के ठंडे जल में ले जाकर ठंडा किया, जिससे छह बच्चों का जन्म हुआ. इनमें पांच लड़कियां और एक लड़का था, जो भगवान कार्तिकेय थे. वे बड़े होकर एक बुद्धिमान और शक्तिशाली योद्धा बने.
उन्होंने तारकासुर के साथ भयंकर युद्ध किया और अंत में उसका वध कर दिया. तारकासुर की मृत्यु के बाद उसके शरीर से एक मोर प्रकट हुआ, जिसे कार्तिकेय ने अपना वाहन बनाया. इस विजय के बाद देवताओं ने कार्तिकेय को सेनापति घोषित किया. चूंकि तारकासुर का वध शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था, इसलिए इस दिन को स्कंद षष्ठी के रूप में मनाया जाता है.
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