भारत में शक्ति उपासना का अस्तित्व बहुत पुराने समय से है. पुरातात्विक साक्ष्य भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं. मोहनजोदड़ो की खुदाई में सात परतों में बसे नगरों के प्रमाण मिले हैं, जिनमें सबसे प्राचीन नगर लगभग 4000 ईसा पूर्व का माना जाता है. इन खुदाइयों में शिवलिंग, नंदी और स्वास्तिक जैसे प्रतीकों का मिलना इस बात का संकेत देता है कि उस समय भी शक्ति और तांत्रिक उपासना के तत्व मौजूद थे.
ऋग्वेद में शक्ति पूजा की परंपरा
भारतीय परंपरा में स्त्री को शक्ति और देवी का स्वरूप माना गया है. वैदिक साहित्य में जहां पुरुष ऋषियों का उल्लेख मिलता है, वहीं अनेक ऋषिकाओं का भी विस्तार से न सिर्फ नाम मिलता है, बल्कि उन्होंने कौन-कौन सी ऋचाएं बनाईं, यह भी देखने को मिलता है. ऋग्वेद में घोषा, अपाला, लोपामुद्रा, अदिति, इंद्राणी जैसी विदुषी महिलाओं का विस्तार से वर्णन मिलता है, जो मंत्र-दृष्टा और ब्रह्मविद्या में पारंगत थीं. इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में स्त्रियों को आध्यात्मिक और वैदिक कर्मकांडों में ऊंची पदवी हासिल थी.
पुराणों में देवी पूजा
वैदिक काल में अदिति को देवमाता कहा गया है, जबकि सरस्वती, वाणी, इड़ा, राका, इंद्राणी और रुद्राणी जैसी देवियों की उपासना भी होती रही है. देवी सूक्त इस बात का प्रमाण है कि देवी को सृष्टि की मूल शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया था. पौराणिक काल में शक्ति उपासना और अधिक फैली.
देवी भागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण और कालिका पुराण जैसे ग्रंथों में देवी के अलग-अलग रूपों और उनकी महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है. पौराणिक काल में जो सबसे अधिक प्रसिद्ध हुईं वह देवी दुर्गा हैं, जिन्होंने चंड-मुंड, रक्तबीज और शुंभ-निशुंभ जैसे असुरों का वध कर देवताओं की रक्षा की.
तांत्रिक परंपरा में शक्ति की उपासना
तांत्रिक परंपरा में भी शक्ति की उपासना को खास तवज्जो दी गई. रुद्रयामल तंत्र के अनुसार दस महाविद्याएं, 'काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला,' शक्ति के अलग-अलग स्वरूप हैं, जिनके साथ उनके भैरव भी जुड़े हुए हैं. शक्ति उपासना का प्रभाव केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं रहा. बौद्ध धर्म में भी तारा, वज्रयोगिनी और वसुधारा जैसी देवियों का जिक्र मिलता है. महायान परंपरा में तारा को करुणा और शक्ति का प्रतीक माना गया, जबकि अन्य शाखाओं में इसी शक्ति को अलग-अलग नामों से पूजा गया.
जैन परंपरा की देवियां
इसी तरह जैन धर्म में भी शक्ति उपासना का असर देखा जाता है. जैन परंपरा में हर एक तीर्थंकर के साथ एक यक्षिणी या शासन देवी का उल्लेख मिलता है, जैसे पद्मावती, चक्रेश्वरी और अंबिका, जो साधकों की रक्षा और मार्गदर्शन करती हैं. नाथ संप्रदाय में भी शक्ति का खास महत्व है. गोरखनाथ और मत्स्येंद्रनाथ की परंपरा में कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने की साधना को प्रमुख स्थान दिया गया है. इस परंपरा में शक्ति को ही सृष्टि की मूल प्रेरक ऊर्जा माना गया है.
इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि शक्ति उपासना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना की आधारशिला है. वैदिक काल से लेकर पौराणिक युग, तंत्र साधना और बौद्ध-जैन दर्शन तक, हर युग में शक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा के रूप में स्वीकार किया गया है. आज भी भारत के उत्तर से दक्षिण तक शक्ति उपासना का प्रभाव उतना ही व्यापक और जीवंत बना हुआ है.