दशहरे पर शस्त्र पूजन, रावण दहन के साथ शमी वृक्ष के पूजन की भी परंपरा है. शमी को विजय, न्याय और शुभता का प्रतीक माना गया है. इस वृक्ष का संबंध शनि ग्रह से भी है, ज्योतिष में जिन्हें कर्म, न्याय, अनुशासन और संघर्ष का कारक माना जाता है. मान्यता है कि दशहरे पर शमी के पेड़ की पूजा से जीवन की सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं. इस दिव्य वृक्ष की पूजा से धनधान्य की प्राप्ति और सुख-संपन्नता का वरदान मिलता है.
पांडवों से जुड़ी है शमी पूजन की परंपरा
महाभारत का एक प्रसिद्ध प्रसंग शमी वृक्ष के धार्मिक महत्व को विशेष रूप से दर्शाता है. पांडवों को जब एक वर्ष का अज्ञातवास बिताना था, तब उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र सुरक्षित रखने के लिए उन्हें एक शमी वृक्ष पर छिपा दिया था. विराट नगर में अज्ञातवास की अवधि पूरी होने के बाद अर्जुन ने इसी वृक्ष से अपने शस्त्र वापस प्राप्त किए और अपनी वीरता का परिचय दिया. इस प्रसंग को शमी वृक्ष के साथ विजय, शक्ति और संकट के समय धैर्य बनाए रखने से भी जोड़कर देखा जाता है. यही कारण है कि विजयादशमी पर शमी पूजन और शस्त्र पूजन की परंपरा कई क्षेत्रों में विशेष श्रद्धा के साथ निभाई जाती है.
शमी वृक्ष की पूजा का संदेश
शनि धैर्य, न्याय और परिश्रम का ग्रह है. विजयदशमी पर वृक्ष शमी की पूजा पांडवों की तरह सत्य के पथ पर चलते हुए धैर्य को बनाए रखने का संदेश देती है. उन्होंने कष्ट सहे, लेकिन कोई गलत रास्ता नहीं अपनाया. अन्ततः उन्हें विजय मिली. इसी तरह भगवान राम ने भी धैर्य के साथ सत्य के पथ पर चलते हुए रावण का वध किया. इससे हमें शिक्षा मिलती है कि सत्य का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए. फिर जीवन में चाहे जितने भी कष्ट क्यों न आ जाएं. जो लोग सत्य और न्याय के पथ पर चलते हैं एक दिन विजय उनकी ही होती है.
जब सोना बन गए शमी के पत्ते
राजा रघु बेहद दानवीर थे. महर्षि वरतंतु के शिष्य कौत्स ने गुरु दक्षिणा चुकाने के लिए राजा रघु से धन मांगा. राजा रघु ने कौत्स की मांग पूरी करने का वचन दिया और आवश्यक धन जुटाने का निश्चय किया. तब राजा रघु की दानशीलता से प्रसन्न होकर कुबेर महाराज ने स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा की थी. दशहरे के दिन कुबेर ने राजा रघु को स्वर्ण मुद्राएं देने के लिए शमी के पत्तों को सोने का बना दिया था. इस दिन शमी के पास दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है.