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पर्व-त्यौहार

Chaturmas 2021: तुलसी ने क्यों दिया था विष्णु को श्राप, बाद में कैसे हुआ दोनों का विवाह?

तुलसी ने क्यों दिया था विष्णु को श्राप?
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आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी तिथि मनाई जाती है. इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं. इसके बाद लगभग सभी शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं. 4 महीने बाद जब विष्णु योग निद्रा से जागते हैं, तब फिर से शुभ कार्य प्रारंभ होते हैं.

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विष्णु के योग निद्रा से जागते ही उनका तुलसी से विवाह कराया जाता है. ऐसा कहते हैं कि जो लोग तुलसी विवाह संपन्न कराते हैं, उनको वैवाहिक सुख मिलता है. भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय हैं. आइए आपको तुलसी-शालिग्राम के विवाह के पीछे की पूरी कहानी सुनाते हैं.

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हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, वृंदा नाम की एक कन्या का विवाह समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए जलंधर नामक राक्षस से कर दिया गया. वृंदा भगवान विष्णु की भक्त के साथ एक पतिव्रता स्त्री भी थी. इसी वजह से जलंधर और भी ज्यादा शक्तिशाली हो गया था.

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ऐसी मान्यताएं हैं कि भगवान शिव भी जलंधर को पराजित नहीं कर पा रहे थे. महादेव के अलावा तमाम देवताओं ने जलंधर का नाश करने का भरपूर प्रयत्न किया, लेकिन कोई कामयाब नहीं हुआ. इसके बाद सभी देवों ने मिलकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की. भगवान विष्णु ने जलंधर का भेष धारण किया और पतिव्रता स्त्री वृंदा की पवित्रता नष्ट कर दी.

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वृंदा की पवित्रता समाप्त होते ही जलंधर की ताकत खत्म हो गई और भगवान शिव ने जलंधर का वध कर दिया. वृंदा को जब भगवान विष्णु की माया का पता चला तो वह क्रोधित हो गई और उन्हें भगवान विष्णु को काला पत्थर बनने (शालिग्राम पत्थर) श्राप दे दिया.

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वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि वह भी एक दिन अपनी पत्नी से अलग हो जाएंगे. इसलिए कहा गया है कि राम के अवतार में भगवान माता सीता से अलग होते हैं. ये वृंदा के श्राप के कारण ही हुआ था.

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भगवान को पत्थर का होते देख सभी देवी-देवता में हाकाकार मच गया था. तब माता लक्ष्मी ने वृंदा से प्रार्थना की. इसके बाद वृंदा ने जगत कल्याण के लिए अपना श्राप वापस लिया और खुद जलंधर के साथ सती हो गई.

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फिर उनकी राख से एक पौधा निकला जिसे भगवान विष्णु ने तुलसी नाम दिया और खुद के एक रूप को पत्थर में समाहित करते हुए कहा कि आज से तुलसी के बिना मैं प्रसाद स्वीकार नहीं करूंगा. इस पत्थर को शालिग्राम के नाम से तुलसी के साथ ही पूजा जाएगा. इसी वजह से कार्तिक मास में तुलसी जी का शालिग्राम के साथ विवाह भी किया जाता है.

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जो लोग तुलसी विवाह संपन्न कराते हैं, उनको वैवाहिक सुख मिलता है. देवोत्थान एकादशी पर केवल तुलसी विवाह ही नहीं होता है, बल्कि इसके व्रत से विवाह में आ रही सारी रुकावटें भी दूर होने लगती हैं और शुभ विवाह का योग जल्दी ही बन जाता है.

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तुलसी को धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष महत्व दिया जाता है. तुलसी के पौधे का इस्तेमाल यज्ञ, हवन, पूजन, कर्मकांड, साधना और उपासना आदि में होता है. इसके अलावा तुलसी का इस्तेमाल पवित्र भोग, प्रसाद आदि में किया जाता है. भगवान के चरणामृत में भी तुलसी का उपयोग किया जाता है.