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मां भुवनेश्वरी चालीसा (Maa Bhuvaneshwari Chalisa)

मां भुवनेश्वरी चालीसा

मां भुवनेश्वरी चालीसा का पाठ धार्मिक मान्यता के अनुसार धन-संपदा, बुद्धि और मानसिक शांति से जुड़ा माना जाता है. श्रद्धा से इसका पाठ करने से आर्थिक परेशानियां दूर होने, विद्या और स्मरण शक्ति में वृद्धि तथा जीवन में सुख-समृद्धि आने की मान्यता है. विद्यार्थी और कलाकार भी इसके पाठ को लाभकारी मानते हैं.

मां भुवनेश्वरी चालीसा
मां भुवनेश्वरी चालीसा

॥ दोहा ॥

नमो नमो भुवनेश्वरी, जयति सच्चिदानन्द।
त्रिभुवन जननी अम्बिके, काटहु भव भय फन्द॥

॥ चौपाई ॥

जय जय श्री भुवनेश्वरी माता,सकल भुवन की हो विख्याता॥
चन्द्रवदन पर शोभित टीका,मुख पर तेज अमित अमिका॥
भाल विशाल मुकुट छवि छाजै,कर में कमल सुशोभित राजै॥
तन पर सुन्दर पीत वसन मां,राजहंस वाहन आसन माँ॥

 

तुम ही वैष्णवी, तुम ही रुद्राणी,तुम ही ब्रह्माणी महारानी॥
तुम ही आदिशक्ति जग-जननी,भक्त-जनों की हो दुःख-हरणी॥
तीन लोक का तुम्हीं रचैया,सबके प्राणों की तुम रखवैया॥
बीज मन्त्र है ह्रीं तुम्हारा,जपत है जो नर भव पारा॥

 

तुमने ही मधु-कैटभ मारे,तुमने ही महिषासुर संहारे॥
शुम्भ-निशुम्भ को तुमने पछाड़ा,रक्तबीज का रक्त निकारा॥
चौदह भुवन का तुम विस्तार,तुम ही हो सबका आधार॥
सकल सृष्टि तुम्हारी माया,तुम बिन कोई पार न पाया॥

 

तुम ही सूर्य-चन्द्र-नभ-तारे,तुम ही हो सबके रखवारे॥
अन्नपूर्णा बन अन्न देती हो,मात लक्ष्मी बन धन देती हो॥
महासरस्वती विद्या-दानी,विद्या-बुद्धि दो महारानी॥
तुमने ही रचना की सारी,यह सब है लीला तुम्हारी॥

 

ऋषि-मुनि तुमरा ध्यान लगावें,नारद-शारद शीश नवावें॥
योगी-गण सब योग साधते,तुम बिन सिद्धि कभी न पाते॥
जो भी तुम्हारी शरण में आया,तुमने उसका मान बढ़ाया॥
जिस पर हुई तुम्हारी दाया,उस पर दुःख की पड़ी न छाया॥

 

जो कोई माता तुम्हें पुकारे,तुम हो सदा उसी के सहारे॥
मैं हूं मां तुम्हारा ही बालक,तुम ही हो मेरी प्रतिपालक॥
मुझको शक्ति दो महारानी,जिससे करूं तुम्हारा गुणगानी॥
मैं हूं दीन, हीन, अज्ञानी,क्षमा करो मेरी हर नादानी॥

 

जो कोई पढ़े यह चालीसा,उस पर कृपा करें गौरीसा॥
प्रतिदिन इसे जो मन लाए पढ़ेगा,उसका सब दुःख-शोक मिटेगा॥
घर में सुख-समृद्धि आवेगी,मन में भक्ति-शक्ति जागेगी॥
बाल-बुद्धि विद्या बढ़ जावे,मान-यश जग में वह पावे॥

 

जो नारी इस पाठ को करती,सुख-सौभाग्य से गोद भरती॥
मैं हूं शरण तुम्हारी माता,तुम बिन कोई नहीं त्राता॥
कृपा-दृष्टि मुझ पर भी करना,भव-बंधन मेरे सब हरना॥
हे त्रिभुवन-जननी! हे जगदम्बे! नमो नमो हे मातु अवलम्बे॥

॥ दोहा ॥

यह चालीसा भक्ति युत, जो कोई नित गावै।
सुख-सम्पति सब जग भोगि, परम पद पावै॥

 

-----समाप्त-----

समाप्त

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