सोचिए... आपके घर में सगाई हुई है. फेसबुक पर तस्वीरें डाली गई हैं. इंस्टाग्राम पर रिश्तेदार बधाई दे रहे हैं. कमेंट बॉक्स में 'शुभकामनाएं', 'बधाई हो' और 'नई शुरुआत मुबारक' जैसे संदेशों की भरमार है. आप खुश हैं. लेकिन इसी भीड़ में एक और शख्स मौजूद है. न वो आपका रिश्तेदार है. न दोस्त. न शुभचिंतक. वो आपकी प्रोफाइल को देख रहा है. वो आपकी खुशियों पर नजर नहीं रख रहा... वो आपके बैंक खाते तक पहुंचने का रास्ता तलाश रहा है.
और फिर एक दिन आपका फोन बजता है. हैलो जीजाजी... पहचानो मैं कौन? उधर से एक लड़की की मीठी आवाज आती है. आप थोड़ा सोचते हैं. फिर सामने से जवाब आता है... अरे जीजाजी, मैं आपकी साली बोल रही हूं...' बस, यहीं से शुरू होता है ठगी का ऐसा खेल, जिसने सवाई माधोपुर पुलिस को भी हैरान कर दिया.
सवाई माधोपुर पुलिस के मुताबिक, पकड़े गए साइबर ठगी के आरोपी का तरीका बेहद अलग था. वो किसी को रैंडम कॉल नहीं करता था. पहले फेसबुक और इंस्टाग्राम पर घंटों लोगों की प्रोफाइल खंगालता. किसकी सगाई हुई है? किसकी शादी तय हुई है? किस घर में नया रिश्ता जुड़ा है? कौन किसका जीजा है? कौन किसका साला? कौन किसका रिश्तेदार? आरोपी सोशल मीडिया की तस्वीरों, टैग, कमेंट और बधाई संदेशों से पूरा फैमिली ट्री तैयार कर लेता था. यानि आप जो जानकारी खुशी-खुशी दुनिया को दिखा रहे थे, वही उसके लिए ठगी का ब्लूप्रिंट बन जाती थी.

फिर शुरू होती थी 'ऑपरेशन साली'
जानकारी जुटाने के बाद आरोपी किसी तरह मोबाइल नंबर हासिल करता. और फिर कॉल लगाता. लेकिन अपनी असली आवाज में नहीं. लड़की की आवाज में. फोन उठते ही सामने से आवाज आती-जीजाजी नमस्ते... मैं आपकी साली बोल रही हूं. अब सोचिए. सगाई अभी-अभी हुई है. नई रिश्तेदारियां बनी हैं. हर किसी को हर रिश्तेदार का चेहरा या आवाज याद भी नहीं होती. ऐसे में अचानक आई कॉल पर शक करने की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है.
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आरोपी भी यही चाहता था. वो आराम से बातें करता. घर-परिवार की बातें. सगाई की बातें. रिश्तेदारों की बातें. ऐसा लगता जैसे सचमुच कोई करीबी रिश्तेदार बात कर रहा हो. और जब भरोसा पूरी तरह बन जाता... तब आता था असली मुद्दा.
जीजाजी, एक छोटी-सी मदद चाहिए थी... कभी कोई बहाना. कभी जरूरी पेमेंट अटकने की कहानी. कभी किसी इमरजेंसी का ड्रामा. रकम भी इतनी नहीं कि सुनते ही शक हो जाए. बस इतनी कि सामने वाला सोचे- अरे, अपनी ही तो साली है... मदद कर देते हैं. और यहीं खेल खत्म. पैसे खाते में पहुंचते और आरोपी गायब. उधर पीड़ित को बाद में पता चलता कि जिस साली की मदद की थी, उसने तो कभी फोन ही नहीं किया था.
जब शिकायतें बढ़ीं तो खुलने लगी परतें
मामला तब सामने आया, जब साइबर हेल्पलाइन 1930 पर लगातार शिकायतें पहुंचने लगीं. लोगों की कहानी लगभग एक जैसी थी. किसी को रिश्तेदार बनकर कॉल आया. किसी को परिवार का सदस्य बताकर. और फिर पैसे ठग लिए गए. सवाई माधोपुर कोतवाली थाना पुलिस ने जांच शुरू की. बैंक खातों को खंगाला गया. संदिग्ध लेन-देन को ट्रैक किया गया. और धीरे-धीरे पुलिस उस नेटवर्क तक पहुंच गई, जो इस पूरे खेल को चला रहा था.
पहला आरोपी पकड़ा गया, फिर मिला मास्टरमाइंड
जांच के दौरान पुलिस ने पहले नरेंद्र सैनी नाम के आरोपी को गिरफ्तार किया. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. पूरे खेल का असली किरदार अभी बाहर था. नाम- गणेश उर्फ दिलखुश. उम्र- 24 साल. निवासी- बारां राजस्थान... पुलिस का कहना है कि यही वह शख्स था, जो सोशल मीडिया पर लोगों की जिंदगी में झांककर उनके रिश्तों को ठगी का हथियार बना रहा था. काफी तलाश के बाद पुलिस ने उसे बारां से गिरफ्तार कर लिया.
इस कहानी में सोचने वाली बात क्या है?
कहानी का अहम हिस्सा ये नहीं कि आरोपी लड़की की आवाज निकाल लेता था. ये भी नहीं कि उसने लोगों को फोन करके पैसे ठग लिए. सबसे सोचने वाली बात ये है कि उसने कोई बड़ी हैकिंग नहीं की. कोई सुपर कंप्यूटर नहीं चलाया. कोई हॉलीवुड स्टाइल साइबर अटैक नहीं किया. उसने सिर्फ वही जानकारी इस्तेमाल की... जो लोगों ने खुद सोशल मीडिया पर डाल रखी थी. यानी आपकी सगाई की फोटो. आपके रिश्तेदारों के नाम. आपकी फैमिली की तस्वीरें. आपके कमेंट बॉक्स में लिखी बातें. सब कुछ. इसलिए अगली बार जब फेसबुक या इंस्टाग्राम पर कोई निजी जानकारी पोस्ट करें... तो एक बार जरूर सोचिए.