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सवाल सीएम का... कांग्रेस की ‘केरलम स्टोरी’ और भाजपा के ‘मास्टर स्ट्रोक’

केरल में मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस हाईकमान ने वो जोखिम नहीं लिया, जो वह राजस्थान, मध्यप्रदेश, हिमाचल और कर्नाटक जैसे राज्यों में लेता आया था. जमीनी मांग वीडी सतीशन को लेकर थी, जिसके आगे पार्टी नेतृत्व नतमस्तक हुआ. और हाईकमांड के सबसे करीबी केसी वेणुगोपाल को मन मसोसकर नेतृत्व के फैसले का समर्थन करना पड़ा.

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वीडी सतीशन का केरल सीएम के रूप में चुना जाना परंपरागत फैसला है, लेकिन मौजूद प्रयोगवादी राजनीति में यह खास लगता है.
वीडी सतीशन का केरल सीएम के रूप में चुना जाना परंपरागत फैसला है, लेकिन मौजूद प्रयोगवादी राजनीति में यह खास लगता है.

भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने पिछले कुछ वर्षों में मुख्यमंत्री चुनने की प्रक्रिया को इतना रहस्यमय बना दिया है कि अब फैसले से ज्यादा चर्चा उस इंतजार की होने लगी है, जो फैसले से पहले करवाया जाता है. केरल में कांग्रेस नेतृत्व को वीडी सतीशन के नाम पर मुहर लगाने में 11 दिन लगे. भाजपा ने भी दिल्ली में रेखा गुप्ता के नाम का ऐलान करने में 11 दिन लगाए थे. 2017 के यूपी चुनाव नतीजों के बाद योगी आदित्यनाथ के नाम की घोषणा चुनाव नतीजों के 7 दिन बाद हुई थी. और उसी यूपी में मंत्रिमंडल विस्तार को एक सप्ताह होने आया, अभी तक मंत्रियों को विभाग नहीं दे पाए हैं.

लेकिन असली कहानी देरी की नहीं है. असली कहानी उन हालातों की है, जो फैसले के बाद पैदा होते हैं.

पिछले कुछ वर्षों में भाजपा और कांग्रेस हाईकमान के बीच ‘प्रयोग’ की रेस हो रही है. राजनीतिक पंडित जिस चेहरे को सबसे संभावित मुख्यमंत्री बताते हैं, हाईकमान उसी का पत्ता काटकर किसी और को आगे कर देता है. मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में भाजपा के सीएम सरप्राइज से कम नहीं थे. लेकिन, जब कांग्रेस ने राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और हिमाचल में अपने प्रयोग किए, तो बवाल मच गया.

दोनों पार्टियों के प्रयोगों के नतीजे अलग-अलग निकले. भाजपा के फैसले ‘मास्टर स्ट्रोक’ कहलाए, जबकि कांग्रेस के फैसले ‘कलह’ की वजह बन गए. कारण सिर्फ इतना नहीं कि भाजपा सत्ता में है और कांग्रेस विपक्ष में. फर्क दोनों के पॉलिटिकल स्ट्रक्चर और वैचारिक संस्कारों का भी है.

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केरल में कांग्रेस क्यों कलह के मूड में नहीं थी

दिलचस्प यह है कि वही कांग्रेस, जिसने दूसरे राज्यों में नेतृत्व चयन को खुला शक्ति संघर्ष बनने दिया, केरल पहुंचते-पहुंचते अचानक ट्रेडिशनल हो गई. वहां उसने वही रास्ता चुना, जिसे सबसे सुरक्षित माना जाता है- जो नेता जमीन पर सबसे मजबूत दिखे, उसे आगे कर दो.

वीडी सतीशन इस कसौटी पर फिट बैठते थे. विपक्ष के नेता के तौर पर उन्होंने LDF सरकार पर लगातार हमले किए. कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाया. चुनाव लड़ा, जीते और खुद को राज्यव्यापी चेहरा बनाया. कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री पद के दावेदार की लगभग हर पारंपरिक योग्यता उनके पक्ष में थी.

लेकिन कांग्रेस की राजनीति में एक योग्यता ऐसी भी है, जो बाकी सभी योग्यताओं पर भारी पड़ती है- आप हाईकमान, खासकर गांधी परिवार के कितने करीब हैं. कितने नेताओं को टिकट दिला सकते हैं. अपनी दावेदारी के समर्थन में कितने विधायक खड़े कर सकते हैं. और यदि बात न बने तो पार्टी को असहज करने की कितनी ताकत रखते हैं.

इसी योग्यता ने कभी अशोक गहलोत को सचिन पायलट पर भारी बनाया. कमलनाथ को ज्योतिरादित्य सिंधिया पर बढ़त दिलाई. केसी वेणुगोपाल भी इसी श्रेणी के ताकतवर नेता हैं. संगठन में उनकी पकड़ है, दिल्ली दरबार तक सीधी पहुंच है और टिकट वितरण में उनकी भूमिका निर्णायक मानी जाती है.

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फिर भी कांग्रेस ने अंततः सतीशन को चुना. क्योंकि पार्टी ने शायद यह समझ लिया कि केरल में ‘दिल्ली से संचालित मुख्यमंत्री’ का प्रयोग जोखिम भरा हो सकता है.

कांग्रेस नेतृत्व ने यह भी महसूस किया कि केसी वेणुगोपाल को मनाया जा सकता है, लेकिन यदि वीडी सतीशन नाराज हुए तो वे अलग राह पकड़ सकते हैं. भाजपा वैसे भी केरल में उसी तरह अवसर तलाश रही है, जैसे कभी असम में हिमंता बिस्वा सरमा और बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के रूप में तलाशे थे. उसे बस किसी बड़े स्थानीय चेहरे के असंतोष का इंतजार रहता है.

यानी, कांग्रेस ने यहां प्रयोग नहीं, प्रबंधन किया है.

कांग्रेस और भाजपा के हाईकमान में सबसे बड़ा फर्क क्या है?

सत्ता की ताकत- 

सत्ता अपने साथ एक मनोवैज्ञानिक ताकत भी लेकर आती है. भाजपा में यह पक्का हो चुका है कि चुनाव नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में जीता गया है, इसलिए मुख्यमंत्री वही तय करेंगे. वहां फैसले पर सवाल उठाने की गुंजाइश नहीं है. अब तो भाजपा में स्थिति उलटी हो गई है. यदि किसी नेता के पक्ष में बहुत ज्यादा हवा बनने लगे, तो मानो कि उसका पत्ता कटना तय है. भाजपा नेतृत्व इतना ताकतवर है कि वह किसी नेता के बारे में भरी सभा में कहता है कि ‘आप इन्हें वोट दीजिये, पार्टी ने इन्हें बड़ा नेता बनाने के बारे में सोचा है’. और बाद में पता चलता है कि वे सीएम बना दिए गए. बिहार में सम्राट चौधरी और छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय उदाहरण हैं.

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कांग्रेस में स्थिति उलटी है. पार्टी नेतृत्व लगातार कमजोर हुआ है. वह स्थानीय नेताओं को न बड़ा नैरेटिव दे पा रहा है और न अतिरिक्त वोट. कांग्रेस जहां भी चुनाव जीत रही है, वहां जीत का श्रेय स्थानीय नेतृत्व को ही जाता है. ऐसे में क्षेत्रीय नेता खुद को हाईकमान से कमतर नहीं मानते. वो अपनी दावेदारी को हक मानते हैं.

लचीलापन और ‘एडजस्टमेंट’ की क्षमता-

भाजपा नेतृत्व यदि किसी एक नेता को मुख्यमंत्री नहीं बनाता, तो बाकी दावेदारों को समायोजित करने की ताकत रखता है. सर्बानंद सोनोवाल और शिवराज सिंह चौहान जैसे नेताओं को केंद्र में मंत्री पद देकर संतुलन बना लिया गया.

कांग्रेस के पास अब ऐसे विकल्प सीमित हैं. एक समय था जब कांग्रेस कार्यसमिति यानी CWC खुद एक बड़ा पावर सेंटर मानी जाती थी. उसका सदस्य होना किसी मंत्री पद से कम नहीं समझा जाता था. लेकिन अब CWC होने, न होने के बराबर है. उससे ज्यादा ताकतवर वो मंडली है जो राहुल गांधी के करीबी दायरे में रहती है.

‘रिटर्न’ की गारंटी-

भाजपा में नेताओं को भरोसा है कि इस बार मौका नहीं मिला, तो भविष्य में कहीं और मिल जाएगा. मोदी-शाह मॉडल में ‘रिटर्न’ की संभावना बनी रहती है. कांग्रेस में इसके उलट भावना है- ‘अभी नहीं, तो कभी नहीं.’

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जैसे-जैसे कांग्रेस शासित राज्यों की संख्या घट रही है, वैसे-वैसे नेताओं की बेचैनी बढ़ रही है. मुख्यमंत्री पद अब सिर्फ सत्ता नहीं, राजनीतिक अस्तित्व का सवाल बनता जा रहा है. इसलिए वहां दावेदारियां अधिक आक्रामक और संघर्ष ज्यादा कड़वा हो जाता है.

शक्ति प्रदर्शन की गुंजाइश-

दोनों पार्टियों के भीतर शक्ति प्रदर्शन की गुंजाइश का पैमाना अलग अलग है. जाहिर तौर पर दबाव बनाने वाली राजनीति को भाजपा में अनुशासनहीनता माना जाता है. हां, संघ के भीतर पैठ बनाकर या किसी बड़े नेता के जरिए अपनी बात ऊपर तक पहुंचाकर दावेदार अपना काम बनाते रहे हैं. लेकिन, कांग्रेस में होर्डिंग की तादाद, और नेताओं के पीछे जमा होने वाली भीड़ से दावा पुख्ता होता आया है. कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता ये कहते नजर आएंगे कि यही तो हमारी पार्टी का लोकतंत्र है. सबको अपनी बात रखने की आजादी है. हम कोई भाजपा जैसे थोड़े ही हैं, जो दो लोगों के फैसले को सब पर थोप देती है. 

बगावत का स्कोप-

पिछले दस वर्षों में कई बड़े कांग्रेस नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में गए हैं. वहां जाकर उन्होंने भाजपा को कितना फायदा पहुंचाया, यह अलग बहस हो सकती है. लेकिन उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व, खासकर गांधी परिवार के फैसलों की खूब परतें खोलीं. ऐसे में कांग्रेस नेताओं के पास ‘ऑप्शन’ मौजूद है. भाजपा में जाने का रास्ता खुला है.

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लेकिन भाजपा नेताओं के पास ऐसा विकल्प नहीं है. वे जानते हैं कि कांग्रेस में जाकर भी राजनीतिक भविष्य बहुत स्पष्ट नहीं होगा. इसलिए भाजपा में असहमति अक्सर निजी नाराजगी तक सीमित रह जाती है.

केरल में इसका संकेत भी दिखा. वायनाड में सतीशन समर्थक कार्यकर्ताओं ने पोस्टर लगा दिए- ‘वायनाड को अमेठी बना दिया जाएगा.’ यानी संदेश साफ था कि यदि स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी हुई, तो राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है. क्या कोई कल्पना कर सकता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का कोई दावेदार पोस्टर लगवाकर कहे—‘बनारस को वायनाड बना देंगे’?

यही दोनों पार्टियों के राजनीतिक संस्कार का फर्क है.

केरल में कांग्रेस ने फिलहाल समझदारी दिखाई है

वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने फिलहाल व्यावहारिक फैसला लिया है. हालांकि इन 11 दिनों के घटनाक्रम ने भाजपा को यह जरूर दिखा दिया कि केरल कांग्रेस के भीतर दरारें मौजूद हैं.

आने वाले पांच वर्षों में मालाबार तट पर सत्ता संतुलन की राजनीति चलेगी. करीब 45 विधायक ऐसे माने जा रहे हैं, जो केसी वेणुगोपाल खेमे के प्रभाव से विधानसभा पहुंचे हैं. वे अपने नेता के मुख्यमंत्री न बन पाने से निराश जरूर होंगे. लेकिन उन्हें यह भरोसा भी होगा कि दिल्ली में बैठे केसी, तिरुवनंतपुरम में बैठे किसी मुख्यमंत्री से ज्यादा उनके काम आ सकते हैं.

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यानी, सतीशन बनाम वेणुगोपाल की लड़ाई का पहला राउंड पूरा हो चुका है. स्कोर फिलहाल 1-0 से सतीशन के पक्ष में है.

लेकिन असली मुकाबला अब शुरू होगा- मंत्रिमंडल गठन में. किस खेमे को कितने मंत्री मिलेंगे, कौन से विभाग मिलेंगे, संगठन में किसकी चलेगी. और जो असंतुष्ट बचेंगे, उनमें भाजपा अपने संभावित ‘क्लाइंट’ तलाशेगी, जबकि वाम दल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश करेंगे.

कुल मिलाकर, ‘केरलम स्टोरी’ का अगला पार्ट पहले से ज्यादा दिलचस्प होने वाला है.

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