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ममता का ‘अंतिम दांव’? चुनाव बाद भी जारी है बंगाल SIR की अनंत-कथा

बंगाल चुनाव खत्म हो गया, लेकिन SIR पर सियासी और कानूनी संग्राम जारी है. टीएमसी इसे वोटरों की ‘सफाई’ नहीं, लोकतंत्र की ‘छंटनी’ बता रही है, जबकि चुनाव आयोग नियमों का हवाला दे रहा है. ये लड़ाई जीतना टीएमसी के लिए सिर्फ नैरेटिव ही नहीं, अस्तित्व की खातिर भी जरूरी है.

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बंगाल चुनाव में पराजय के बाद ममता बनर्जी के लिए नैरेटिव की खातिर सुप्रीम कोर्ट की लड़ाई जीतना जरूरी हो गया है. (File Photo: PTI)
बंगाल चुनाव में पराजय के बाद ममता बनर्जी के लिए नैरेटिव की खातिर सुप्रीम कोर्ट की लड़ाई जीतना जरूरी हो गया है. (File Photo: PTI)

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 खत्म हो चुका है. नतीजे आ चुके हैं. बीजेपी पहली बार सत्ता में पहुंच चुकी है. शुभेंदू अधिकारी शपथ ले चुके हैं, और तृणमूल कांग्रेस 15 साल बाद विपक्ष में बैठने को मजबूर है. लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद भी एक सवाल खत्म नहीं हुआ- क्या वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रीविजन यानी SIR ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया?

अब यही सवाल कोर्ट, चुनाव आयोग और तृणमूल कांग्रेस के बीच सबसे बड़ा विवाद बन चुका है. तृणमूल  का आरोप है कि लाखों वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए और कई सीटों पर हटाए गए वोटरों की संख्या जीत के अंतर से भी ज्यादा थी. दूसरी तरफ चुनाव आयोग और बीजेपी इसे ‘सिस्टम की सफाई’ और ‘फर्जी वोटरों की पहचान’ बता रहे हैं. यानी चुनाव खत्म हो गया, लेकिन SIR की कहानी अब भी अदालत, आंकड़ों और राजनीति के बीच जारी है.

यह लड़ाई तृणमूल कांग्रेस के लिए अस्तित्व का संघर्ष बन गई है. क्योंकि, उनकी हार के बाद भले सांत्वना रखने के लिए राहुल गांधी और बाकी विपक्षी नेता उनके सुर में सुर मिला रहे हों. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान यही राहुल गांधी टीएमसी के ध्रुवीकरण और कुशासन को कोसते हुए ममता के सत्ता से बाहर होने की भविष्यवाणी कर रहे थे. ऐसे में ममता जानती हैं कि उन्हें अपने नैरेटिव को ताकत देनी तो कोर्ट की लड़ाई जीतनी होगी. उनकी डूबती नैया को कोर्ट का ही सहारा है.

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कोर्ट में टीएमसी ने क्या कहा?

बंगाल SIR विवाद चुनाव के पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. ममता बनर्जी खुद एक बार पैरवी करने के लिए सर्वोच्च अदालत में आ चुकी है. सोमवार को हुई सुनवाई में टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कोर्ट में बतौर अपनी पार्टी के वकील कहा कि कई विधानसभा सीटों पर हटाए गए वोटरों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी.

सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि जब तक ‘बहुत बड़ी संख्या’ में वोटरों को बाहर किए जाने का मामला साबित न हो, तब तक चुनाव परिणामों में हस्तक्षेप करना मुश्किल होगा. लेकिन अब कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर चुनाव परिणामों पर असर का मुद्दा उठाना है तो उसके लिए अलग याचिका दाखिल करनी होगी.

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि चुनाव परिणाम और वोट डिलीशन से जुड़े सवाल ‘इंडिपेंडेंट IA’ यानी अलग आवेदन का विषय हैं. इसका मतलब साफ है- कोर्ट ने अभी SIR को अवैध नहीं कहा, लेकिन यह दरवाजा भी बंद नहीं किया कि अगर पर्याप्त आंकड़े सामने आएं तो मामले की अलग से सुनवाई हो सकती है.

चुनाव आयोग का बचाव

चुनाव आयोग की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि अगर किसी उम्मीदवार या दल को लगता है कि वोटर डिलीशन से चुनाव प्रभावित हुआ है तो उसका रास्ता ‘इलेक्शन पिटीशन’ है, न कि सीधे पूरे चुनाव को चुनौती देना.

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आयोग का तर्क है कि SIR प्रक्रिया कानून के तहत हुई. जिन वोटरों के नाम हटे, उन्हें नोटिस दिया गया. अपील का मौका मिला. यानी आयोग यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि यह कोई अचानक हुई राजनीतिक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया थी.

बीजेपी भी लगातार यही लाइन ले रही है. पार्टी नेताओं का कहना है कि बंगाल में वर्षों से ‘फर्जी वोटिंग नेटवर्क’ था और SIR ने उसी को खत्म किया. बीजेपी प्रवक्ताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा कि चुनावी हार को SIR पर थोपना टीएमसी की राजनीतिक रणनीति है.

आंकड़ों की राजनीति: क्या सचमुच फर्क पड़ा?

यहीं से असली लड़ाई शुरू होती है. क्योंकि राजनीति में आरोप से ज्यादा असर आंकड़े डालते हैं. मीडिया रिपोर्टों में चुनाव आयोग के डेटा का विश्लेषण सामने आया. उसमें कई सीटों पर वोट डिलीशन और जीत के अंतर की तुलना की गई. कुछ सीटों पर हटाए गए वोटरों की संख्या जीत के मार्जिन से कई गुना ज्यादा थी. यही टीएमसी का सबसे बड़ा हथियार बन गया.

Economic Times की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 50 विधानसभा सीटों में ‘इनएलिजिबल’ या विवादित वोटरों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी. इनमें करीब 25 सीटें बीजेपी के खाते में गईं.

Times of India की एक रिपोर्ट में कहा गया कि 123 सीटों के मार्जिन का विश्लेषण किया गया, जिनमें 49 सीटें विशेष फोकस में थीं क्योंकि वहां मुकाबला बेहद करीबी था. यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं कि वोट हटे या नहीं. सवाल यह है कि क्या हटाए गए वोट इतने थे कि नतीजे बदल सकते थे?

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लेकिन क्या हर डिलीशन मतलब राजनीतिक साजिश है?

यहीं मामला जटिल हो जाता है. मान लीजिए किसी सीट पर जीत का अंतर 5,000 वोट था और 8,000 वोटर हटाए गए. इससे यह अपने आप साबित नहीं हो जाता कि चुनाव परिणाम बदल जाता. क्योंकि यह नहीं पता कि हटाए गए वोट किस पार्टी को देते हैं. 

यही चुनाव आयोग और बीजेपी का सबसे मजबूत तर्क है.

वे कहते हैं कि ‘डिलीटेड वोट’ को सीधे किसी पार्टी के वोट बैंक से जोड़ना सांख्यिकीय रूप से सही नहीं है. लेकिन टीएमसी का जवाब भी उतना ही राजनीतिक है. पार्टी का कहना है कि जिन इलाकों में मुस्लिम, दलित और बंगाली भाषी गरीब आबादी ज्यादा थी, वहीं बड़े पैमाने पर नाम हटे. इसलिए यह सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी.

मुस्लिम और बॉर्डर वाले इलाकों की चर्चा क्यों?

SIR विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा सीमावर्ती जिलों और मुस्लिम बहुल इलाकों की हुई. टीएमसी लगातार आरोप लगाती रही कि ‘घुसपैठिया’ और ‘फर्जी वोटर’ के नाम पर असल वोटरों को हटाया गया. दूसरी तरफ बीजेपी ने यही मुद्दा चुनावी अभियान में इस्तेमाल किया. यानी SIR सिर्फ चुनाव आयोग की तकनीकी प्रक्रिया नहीं रही. यह सीधे हिंदुत्व, नागरिकता, बांग्लादेश सीमा और पहचान की राजनीति से जुड़ गई.

The Guardian की रिपोर्ट में भी कहा गया कि करीब 27 लाख वोटरों के नाम हटाए गए और इसका असर अल्पसंख्यक इलाकों पर ज्यादा देखा गया. हालांकि चुनाव आयोग ने इस दावे को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया.

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क्या सिर्फ SIR से टीएमसी हारी?

यह शायद सबसे बड़ा सवाल है. राजनीतिक विश्लेषकों का बड़ा हिस्सा मानता है कि सिर्फ SIR को हार की वजह बताना अधूरा विश्लेषण होगा.

बीजेपी ने बंगाल में लंबे समय से संगठन खड़ा किया. केंद्र सरकार की योजनाओं, हिंदुत्व नैरेटिव, महिला वोटरों में पैठ और टीएमसी के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी का फायदा मिला.

Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने 294 में से 207 से ज्यादा सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया. टीएमसी 80 सीटों पर सिमट गई. इतनी बड़ी हार को सिर्फ वोटर डिलीशन से समझाना मुश्किल है.

लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि अगर 20-30 करीबी सीटों पर वोटर डिलीशन निर्णायक साबित हुआ हो, तो उसने सत्ता परिवर्तन की रफ्तार जरूर बढ़ाई होगी. यानी SIR शायद पूरी कहानी नहीं है, लेकिन कहानी का बड़ा अध्याय जरूर बन चुका है.

अब आगे क्या?

अब यह लड़ाई तीन जगह चलेगी- कचहरी, राजनीति और डेटा एनालिसिस. सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अलग याचिका दाखिल करने को कहा है. इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में सीट-दर-सीट चुनौती सामने आ सकती है.

अगर टीएमसी कुछ सीटों पर यह दिखा पाती है कि हटाए गए वोटरों की संख्या और चुनावी नतीजे में सीधा संबंध था, तो मामला और गंभीर हो सकता है.

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दूसरी तरफ चुनाव आयोग के सामने भी चुनौती है. उसे सिर्फ कानूनी नहीं, नैतिक भरोसा भी बहाल करना होगा. क्योंकि लोकतंत्र में वोटर लिस्ट पर भरोसा टूट जाए, तो चुनाव परिणाम भी विवाद में आ जाते हैं.

तो फिर SIR की असली विरासत क्या होगी?

बंगाल चुनाव 2026 की राजनीति में SIR अब सिर्फ एक प्रशासनिक शब्द नहीं रहा है. यह उस नए दौर का प्रतीक बन गया है जहां चुनाव सिर्फ रैलियों और वोटिंग मशीनों से नहीं लड़े जाते, बल्कि डेटा, दस्तावेज, पहचान और मतदाता सूची से भी तय होते हैं.

टीएमसी इसे वोटर को मताधिकार से वंचित करना बता रही है. बीजेपी इसे ‘डेमोक्रेटिक क्लीन-अप’ कह रही है. कोर्ट फिलहाल दोनों पक्षों को सुन रहा है.

लेकिन एक बात साफ है- बंगाल का चुनाव खत्म होने के बाद भी SIR की ‘अनंत कथा’ अभी खत्म नहीं हुई. बल्कि असली लड़ाई शायद अब शुरू हुई है. जो कि टीएमसी के लिए अस्तित्व की लड़ाई भी है.

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