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बंगाल के ‘निष्पक्ष’ बनाम ‘पक्षपाती’ अफसर, समझिए चीफ सेक्रेटरी मनोज अग्रवाल से जुड़ा विवाद

पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव आयुक्त मनोज अग्रवाल को सूबे का नया चीफ सेक्रेटरी बनाए जाने पर ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने कड़ा ऐतराज किया है. उनका आरोप है कि जिस अफसर ने राज्य में कथित रूप से पक्षपात करके SIR करवाया, उसे इतना अहम पद कैसे सौंपा जा सकता है. लेकिन, इस विवाद की जड़ें राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन की गहराई तक जाती हैं.

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बंगाल के नवनियुक्त चीफ सेक्रेटरी मनोज अग्रवाल विवादों में है. ममता बनर्जी उन पर कई आरोप लगा रही हैं.
बंगाल के नवनियुक्त चीफ सेक्रेटरी मनोज अग्रवाल विवादों में है. ममता बनर्जी उन पर कई आरोप लगा रही हैं.

आईएएस अफसर मनोज अग्रवाल को पश्चिम बंगाल का चीफ सेक्रेटरी बनाए जाने पर बवाल मचा हुआ है. वे राज्य चुनाव आयोग के सीईओ रहते SIR के इंचार्ज रहे हैं. और इसी वजह से ममता बनर्जी ने ‘पक्षपाती’ कह रही हैं. लेकिन, बंगाल में अफसरशाही से जुड़े विवाद को समझना है तो अग्रवाल से पहले टीएमसी सरकार में आखिरी चीफ सेक्रेटरी रहे दुष्यंत नरियाला की ओर रुख करना होगा. 

डेढ़ महीना पहले ही सुप्रीम कोर्ट में उनकी उस समय कड़ी खिंचाई हुई थी, जब मालदा में SIR से जुड़े न्यायिक अधिकारियों को भीड़ द्वारा घेर लिए जाने के मामले की सुनवाई चल रही थी. अदालत को बताया गया कि जिस वक्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक जज ने हालात संभालने के लिए नरियाला से संपर्क करना चाहा, उनका फोन बंद मिला. कोर्ट ने इसे प्रशासनिक संवेदनहीनता माना और राज्य मशीनरी की जवाबदेही पर तीखे सवाल उठाए.

बंगाल चुनाव नतीजे आने के बाद वहां की सियासी तस्वीर बदल गई. अपने अफसरों के बल पर खुद की ‘दबंग’ छवि गढ़ने वाली ममता बनर्जी अब खुद पीड़ित बताने का कोई मौका नहीं छोड़ रही हैं. टीएमसी का आरोप है कि मनोज अग्रवाल ने बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया. पार्टी नेताओं ने उनकी नियुक्ति को ‘लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जे की रणनीति’ तक बताया. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिस अधिकारी पर आज टीएमसी सवाल उठा रही है, उसी मनोज अग्रवाल को पिछले साल पश्चिम बंगाल का CEO यानी मुख्य निर्वाचन अधिकारी बनाए जाने के लिए नाम भी ममता सरकार की ओर से ही भेजा गया था. यही वह राजनीतिक विडंबना है, जो इस पूरे विवाद को और ज्यादा दिलचस्प बनाती है.

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बंगाल की अफसरशाही में ‘हमारे’ और ‘उनके’ अफसर

पश्चिम बंगाल में अफसरशाही हमेशा से सत्ता का विस्तार मानी जाती रही है. खासकर ममता बनर्जी के शासनकाल में कई ऐसे मौके आए, जब उन्होंने सीधे तौर पर अधिकारियों के बचाव में मोर्चा संभाला.

2021 में चीफ सेक्रेटरी रहे अलापन बंधोपाध्याय वाला एपिसोड याद कीजिये. एक साइक्लोन को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बुलाई गई आपात बैठक में अलापन नहीं पहुंचे. इस नाफरमानी के लिए उन्हें ममता सरकार से दोबारा केंद्रीय नियुक्त पर नॉर्थ ब्लॉक भेजने के लिए कहा. ममता अड़ गईं. नहीं भेजा. अलापन रिटायर हुए, तो उन्हें ममता ने अपना चीफ एडवाइजर बना लिया.

आरजी कार हॉस्पिटल रेप और मर्डर केस में कोलकाता पुलिस कमिश्नर रहे विनीत गोयल की विवादित भूमिका का बचाव करके भी ममता ने अदालतों से किरकिरी झेली थी. गोयल ने हत्याकांड की पीड़िता का नाम उजागर कर दिया था, और जांच में लापरवाही बरती थी. प्रदर्शनकारी उन्हें हटाने की मांग कर रहे थे, जबकि ममता उनके बचाव में अड़ी रहीं. इसी तरह एक और कोलकाता पुलिस कमिश्नर रहे राजीव कुमार को जब सीबीआई ने सारदा और रोजवैली घोटाले में गिरफ्तार किया तो ममता धरने पर बैठ गई थीं.

अफसरों को लेकर केंद्र और राज्य के बीच कई टकराव हुए, तो कभी पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई के खिलाफ ममता सड़क पर उतरती दिखीं. बंगाल की राजनीति में यह धारणा मजबूत रही कि प्रशासनिक ढांचा सिर्फ शासन नहीं चलाता, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव भी नियंत्रित करता है. इसी वजह से राज्य में अफसरों की पोस्टिंग को हमेशा राजनीतिक चश्मे से देखा गया. कौन अफसर ‘विश्वसनीय’ है, कौन ‘दिल्ली के करीब’ है, कौन ‘नबन्ना लाइन’ का है और कौन ‘लूपलाइन’ में डाल दिया गया. यह सब बंगाल की नौकरशाही की अनकही भाषा का हिस्सा बन गया.

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अब जबकि सत्ता परिवर्तन के बाद प्रशासनिक ढांचे में फेरबदल शुरू हुआ है, तो वे अधिकारी जो ममता सरकार के दौर में हाशिये पर थे, अचानक अहम पदों पर दिखाई देने लगे हैं. टीएमसी इसे सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक ‘री-इंजीनियरिंग’ मान रही है.

कौन हैं मनोज अग्रवाल और क्यों बढ़ा विवाद

मनोज अग्रवाल लंबे समय तक पश्चिम बंगाल कैडर के अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल अधिकारी माने जाते रहे. लेकिन पिछले साल 31 मार्च को उन्हें राज्य का मुख्य निर्वाचन अधिकारी बनाया गया. इसके बाद बंगाल में SIR प्रक्रिया उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी और विवादित प्रशासनिक कवायद बन गई.

टीएमसी नेताओं का आरोप है कि SIR के दौरान भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया गया. पार्टी का कहना है कि मतदाता सूचियों की जांच और बूथ स्तर पर की गई कार्रवाई में चयनात्मकता दिखाई गई. टीएमसी सांसदों और प्रवक्ताओं ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि चुनाव आयोग का रवैया ‘निष्पक्ष’ नहीं दिखा.
मनोज अग्रवाल पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने SIR के दौरान भाजपा की शिकायतों पर तेज कार्रवाई की, जबकि टीएमसी की आपत्तियों को उतनी गंभीरता नहीं दी गई. इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कई मौकों पर टीएमसी नेताओं ने उन्हें ‘भाजपा लाइन’ पर काम करने वाला अधिकारी कहा.

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टीएमसी प्रवक्ताओं ने कहा कि ‘जिस अधिकारी ने चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया, उसे अब राज्य प्रशासन की सबसे बड़ी कुर्सी दे दी गई है.’ कुछ नेताओं ने इसे ‘रिवॉर्ड पोस्टिंग’ तक कहा.

सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास

इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू आखिर में सामने आता है. टीएमसी आज मनोज अग्रवाल पर चाहे जितने सवाल उठा रही हो, लेकिन उन्हें पश्चिम बंगाल का CEO बनाए जाने की प्रक्रिया खुद ममता सरकार की सिफारिश से ही शुरू हुई थी.

भारत में चुनाव आयोग किसी राज्य में मुख्य निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करने से पहले राज्य सरकार से अफसरों का पैनल मांगता है. राज्य सरकार अपने कैडर के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के नाम भेजती है. चुनाव आयोग उन्हीं नामों में से किसी एक का चयन करता है.

यानी अगर पिछले साल 31 मार्च को मनोज अग्रवाल को पश्चिम बंगाल का CEO बनाया गया, तो उनका नाम ममता सरकार द्वारा भेजे गए पैनल का हिस्सा था. दूसरे शब्दों में कहें, तो जिस अधिकारी को आज ‘भाजपा समर्थक’ कहकर निशाना बनाया जा रहा है, उसकी संस्थागत एंट्री खुद टीएमसी सरकार की अनुशंसा से हुई थी.

यही वजह है कि बंगाल की यह लड़ाई सिर्फ एक अफसर की पोस्टिंग की कहानी नहीं रह जाती. यह उस राजनीतिक व्यवस्था का आईना बन जाती है, जहां सत्ता बदलते ही ‘निष्पक्ष अफसर’ और ‘पक्षपाती अफसर’ की परिभाषाएं भी बदल जाती हैं. और शायद इसी वजह से बंगाल में चीफ सेक्रेटरी की कुर्सी सिर्फ प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक बन चुकी है.

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