डोनाल्ड ट्रंप के 'अमेरिका फर्स्ट' के नए दौर के लिए तैयार हो जाइए. नई रणनीति के लिए धैर्य और स्मार्ट नीति की जरूरत पड़ेगी क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता है. दूसरी बार सत्ता में आने के बाद ट्रंप की रणनीति पहले से भी ज्यादा अस्थिर और स्पष्ट तौर पर 'अमेरिका फर्स्ट' की होगी. इस बार उनका ध्यान केवल अमेरिकी हितों पर रहेगा, जो वैश्विक स्तर पर नए दबाव और तनाव पैदा कर सकता है.
ट्रंप का इनर सर्कल और मजबूत होगा
इस बार ट्रंप केवल वफादार लोगों को ही अपने आसपास रखेंगे जो उनकी नीति में किसी प्रकार की रुकावट नहीं डालेंगे. उन्होंने पहले से ही 'डीप स्टेट' यानी अंदरूनी संस्थानों पर कंट्रोल करने की योजना बनाई है, जिन पर उन्हें शक है कि 2016 में पहली बार चुने जाने पर उनके खिलाफ साजिश की थी. इस बार स्टेट, रक्षा और खुफिया विभाग के उच्च अधिकारी उन्हीं को चुना जाएगा, जो सलाह से ज्यादा आदेश मानने में विश्वास रखते हों.
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ट्रंप ने अपने समर्थकों और साथियों से सैकड़ों संभावित अधिकारियों की लिस्ट तैयार कर ली है, जो उनके 'अमेरिका फर्स्ट' एजेंडे का साथ देंगे. चुनावी नतीजे स्पष्ट होते ही ट्रंप ने अपने पहले महत्वपूर्ण नियुक्ति की घोषणा कर दी, जिसमें उनके अभियान प्रबंधक सूसी विल्स को व्हाइट हाउस चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में चुना गया. 'आइस मेडन' के नाम से मशहूर विल्स, ट्रंप की राजनीतिक वापसी के पीछे मुख्य कर्ता-धर्ता मानी जाती हैं.
अब ट्रंप प्रशासन में अहम पदों की होड़ शुरू हो गई है और इस बात पर चर्चा है कि कांग्रेस में रिपब्लिकन नेताओं को शामिल किया जाए या बिजनेसमैन और बाहरी नेताओं को. लेकिन एक बात तय है – सभी को डोनाल्ड ट्रंप जूनियर की सहमति चाहिए.
'अमेरिका फर्स्ट' और 'मेक इन इंडिया' का टकराव?
ट्रंप का रुख कई मुद्दों पर पहले से कड़ा होगा – जैसे अवैध आप्रवासन पर सख्ती, सभी आयातों पर ऊंचा टैरिफ, और यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए आर्थिक सहायता को रोकना. उन्होंने मुस्लिम बहुल देशों पर यात्रा प्रतिबंध लगाने की भी बात कही है.
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भारत के लिए इसका क्या मतलब है? सबसे पहले, यह समझना जरूरी है कि अमेरिकी नीति-निर्माता हर सुबह भारत के बारे में नहीं सोचते. ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच दोस्ताना संबंध हैं, लेकिन 'अमेरिका फर्स्ट' और 'मेक इन इंडिया' का मिलन थोड़ा टकराव ला सकता है. दोनों ही अपने-अपने देश में मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार बढ़ाना चाहते हैं, जो एक तरह से प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकता है.
भारत-अमेरिका रक्षा और टेक्नोलॉजी संबंध
क्या ट्रंप भारत-अमेरिका के बीच हाल के महत्वपूर्ण तकनीकी सहयोग को जो बाइडन जितना बढ़ावा देंगे? यह साझेदारी अंतरिक्ष, सेमीकंडक्टर, एआई, और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में शामिल है. लेकिन ट्रंप शायद उतने इच्छुक नहीं होंगे कि वे भारत को एडवांस तकनीक दें या अमेरिकी कंपनियों को भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करें.
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रक्षा के मामले में भारत और अमेरिका के संबंध मजबूत बने रह सकते हैं. ट्रंप ने भारत को हथियार बेचने में हमेशा रुचि दिखाई है. यह उनकी सरकार ही थी जिसने पहली बार भारत को ड्रोन बेचने की अनुमति दी थी. हाल ही में भारत ने 31 MQ-9B ड्रोन खरीदे हैं.
व्यापार और टैरिफ
ट्रंप ने चीन पर 60% से 100% और अन्य देशों पर 10-20% का आयात शुल्क लगाने की योजना बनाई है. वे भारत को 'टैरिफ किंग' कह चुके हैं, जिससे उनके भारत के साथ व्यापार समझौते में मुश्किलें आ सकती हैं. पहले भी उनके भारत दौरे से पहले एक व्यापार समझौता नहीं हो पाया था.
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धार्मिक स्वतंत्रता
भारत में ईसाई अल्पसंख्यकों की स्थिति पर भी ट्रंप प्रशासन का ध्यान जा सकता है, क्योंकि उनके राजनीतिक सहयोगियों में इवैंजेलिकल का प्रभाव है. ये मिशनरी भारत में स्वतंत्र रूप से काम करना चाहते हैं, जो बीजेपी के एजेंडे से मेल नहीं खाता. कांग्रेस के कुछ रिपब्लिकन सदस्य भी इस मुद्दे को उठा सकते हैं.
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की दिशा आने वाले समय में स्पष्ट होगी, जब उनकी कैबिनेट और उनकी प्राथमिकताएं सामने आएंगी. तब तक, ना तो ज्यादा उम्मीद करना सही है और ना ही निराश होना.