चुनाव तो पहले पश्चिम बंगाल में होना है, लेकिन SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण पर उत्तर प्रदेश में भी सियासी हलचल उतनी ही है. पश्चिम बंगाल में अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में करीब एक साल बाद 2027 में होंगे - लेकिन अखिलेश यादव अभी से ममता बनर्जी की राह पकड़ ली है.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गई हैं. कोर्ट जाकर अपनी दलीलें भी रख आई हैं. यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी समाजवादी पार्टी के भी वही रास्ता अख्तियार करने की बात कर रहे हैं.
पीटीआई के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में अंतिम वोटर लिस्ट 28 फरवरी तक जारी किए जाने की संभावना है. उत्तर प्रदेश में भी एसआईआर की प्रक्रिया आखिरी चरण में है, और रिपोर्ट के मुताबिक, वहां फाइनल वोटर लिस्ट 10 अप्रैल को प्रकाशित की जानी है.
पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में एक जैसी चिंता क्यों?
उत्तर प्रदेश में एसआईआर प्रक्रिया पर चिंता जताते हुए हाल ही में अखिलेश यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, एसआईआर के जरिए ही वे बिहार चुनाव जीतने में सफल हुए हैं... इसमें एसआईआर की अहम भूमिका रही है.
और, वैसे ही पश्चिम बंगाल को लेकर भी आशंका जाहिर की थी, बीजेपी पश्चिम बंगाल में भी वही करने की कोशिश कर रही है... इसलिए वहां की सरकार, और मुख्यमंत्री बार-बार कह रही हैं कि चुनाव आयोग बीजेपी का आयोग बन गया है.
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की सूत्रों के हवाले से आई एक रिपोर्ट से मालूम होता है कि यूपी में समाजवादी पार्टी की चिंता भी वही है, जो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की है. अलग अलग राज्यों में होते हुए भी दोनों ही राजनीतिक दल उन सीटों को लेकर चिंतित हैं, जहां हार जीत का अंतर 5000 से कम है. रिपोर्ट के मुताबिक, सपा और टीएमसी का मानना है कि पिछले यूपी और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में जहां भी जीत का फासला कम था, वहां 3,000-5,000 वोटों का बदलाव आने वाले चुनावों में जीत का समीकरण बदल सकता है - और ये बीजेपी के पक्ष में जा सकता है.
2021 के पश्चिम बंगाल और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों को ध्यान से देखें, और 2024 के लोकसभा चुनावों से उनकी तुलना करें, तो ऐसी सीटों की लंबी फेहरिस्त है जहां विधानसभा चुनावों में जीत का अंतर 5,000 वोट से कम था - लेकिन विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनावों के बीच रेस में आगे रहने वाली पार्टी बदल गई.
पश्चिम बंगाल में टीएमसी के डर की वजह
2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में 35 विधानसभा सीटें ऐसी थीं नतीजे 5000 से भी कम वोटों में तय हो गए थे. इन 35 सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने 22, और तृणमूल कांग्रेस 12 सीटें जीत पाई थी. 2021 में ममता बनर्जी अपनी सीट बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी से हार गई थीं, लेकिन टीएमसी को सत्ता दिलाने में सफल रहीं. पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से टीएमसी ने 215 सीटें जीत ली थी, जबकि बीजेपी के खाते में 77 सीटें ही आई थीं.
1. पश्चिम बंगाल के इन 35 विधानसभा क्षेत्रों में से 12 में लोकसभा चुनाव आते आते समीकरण बदल गए. विधानसभा चुनाव लीड करने वाली पार्टी लोकसभा चुनाव 2024 में पिछड़ चुकी थी. बीजेपी ने कम अंतर वाली 5 सीटें जो 2021 में जीती थी, 2024 के आम चुनाव में उन इलाकों में टीएमसी से पिछड़ी हुई पाई गई. और, टीएमसी भी ऐसी ही जीती हुई 6 सीटों पर बीजेपी से पिछड़ गई थी.
2. बीजेपी ने कम अंतर से 2021 में जीती हुई 16 सीटों पर 2024 में भी बढ़त बरकरार रखी, लेकिन टीएमसी ऐसे सिर्फ 6 सीटों पर ही खुद को आगे रखने में कामयाब हो पाई.
3. जिन 35 सीटों की बात हम कर रहे हैं, 2021 के विधानसभा चुनाव उनमें से 17 सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा वोट सीपीएम ने हासिल किए थे, और ऐसे ही 9 सीटों पर कांग्रेस की पोजीशन दर्ज हुई थी.
4. पश्चिम बंगाल की दिनहाटा सीट पर 2021 में जीत का सबसे कम अंतर दर्ज किया गया था. बीजेपी ने 57 वोटों से टीएमसी को हरा दिया था. पांच साल पहले यह सीट टीएमसी ने जीती थी, जब बीजेपी तीसरे पायदान तक ही पहुंच पाई थी - लेकिन बाद में हुए उपचुनाव में टीएमसी ने फिर से दिनहाटा अपने कब्जे में ले लिया.
5. एक और खास बात, 2021 के विधानसभा चुनावों में उन 35 सीटों पर जीत के अंतर का जो औसत 2,680 वोट था, लोकसभा चुनाव तक में यह औसत बढ़कर 13,367 वोट हो गया था.
समाजवादी पार्टी की चिंता भी टीएमसी जैसी ही
ममता बनर्जी की तरफ खुद भी एसआईआर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट जाने का संकेत दे चुके अखिलेश यादव का आरोप है, फॉर्म 7 के जरिए योजनाबद्ध तरीके से पीडीए और मुसलमानों के वोट कटवाए जा रहे हैं.
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 403 में से 255 सीटें जीती थी, जबकि समाजवादी पार्टी को 111 सीटें मिली थीं. 403 में 53 सीटें ऐसी थीं, जहां हार और जीत का फासला 5000 वोटों से कम था. ऐसी 53 विधानसभा सीटों में से बीजेपी के हिस्से में 27 आई थीं, जबकि समाजवादी पार्टी के हिस्से में 21. बीजेपी के सहयोगी दलों में अपना दल (सोनेलाल) ने 3, और निषाद पार्टी ने 1 सीट जीती थी. कांग्रेस को भी एक सीट पर ऐसी ही जीत मिली थी.
1. यूपी में जीत के कम मार्जिन वाली विधानसभा सीटें बीजेपी के लिए चिंता का कारण बन सकती हैं. 2022 के विधानसभा चुनावों के नतीजे और 2024 के आम चुनाव में उन्हीं इलाकों में डाले गए वोटों की तुलना करें, तो मालूम होता है कि समाजवादी पार्टी ने बीजेपी की जीती हुई 18 विधानसभा सीटों पर बढ़त बना ली थी. ऐसी 3 सीटों पर कांग्रेस और 2 सीटों पर चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी ने बीजेपी को पीछे छोड़ दिया था.
2. 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपना दल की जीती हुई 2 सीटों पर, और 2022 के चुनाव में निषाद पार्टी के हिस्से आई एक सीट पर बढ़त बना ली थी. कुल मिलाकर, 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने ऐसे 21 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की जो 2022 के विधानसभा चुनावों में एनडीए के खाते में दर्ज हुई थीं.
3. 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी महज 4 ऐसे विधानसभा क्षेत्रों में अपनी बढ़त बनाए रख सकी जिन पर 2022 में उसे जीत मिली थी, जबकि समाजवादी पार्टी ने 12 ऐसी सीटों पर बढ़त बरकरार रखी. बीजेपी के हाथों समाजवादी पार्टी सिर्फ 3 सीटें गंवाती नजर आई.
4. कम मार्जिन वाली 53 सीटों में से कुछ ऐसी जरूर थीं, जिन पर 2022 और 2024 के चुनावों में आगे रहने वाली पार्टी पिछड़ गई, और पीछे वाली आगे बढ़ गई - लेकिन ऐसा गठबंधनों के अंतर ही देखा गया था.
5. जीत और हार के औसत अंतर की बात करें, तो 53 सीटों पर 2022 विधानसभा चुनाव जीत का औसत अंतर 2,144 वोट था, जो 2024 लोकसभा चुनावों में बढ़कर 20,112 हो गए.