बिहार में नई सरकार के गठन की तैयारी शुरू हो चुकी है. 15 अप्रैल तक पूरी तस्वीर साफ होनी है. और उससे जुड़ी लगभग सभी चीजों पर 10 अप्रैल को दिल्ली में होने जा रही बैठक में फाइनल होना है. 10 अप्रैल को ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेंगे, और अब अपडेट यह है कि उसी दिन शाम को पटना लौट जाएंगे.
डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ही बिहार के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, यह बात लगभग पक्की बताई जा रही है. नीतीश कुमार अपनी तरफ से तो बार बार संकेत दे ही रहे थे, सूत्रों के हवाले से खबर मीडिया में भी छाई हुई है. अब अगर कुछ बाकी है, तो एनडीए की तरफ से आधिकारिक घोषणा होना भर ही है - सारी बातों के बावजूद पक्के तौर पर ऐसा दावा तो कोई नहीं कर सकता, क्योंकि सरप्राइज का स्कोप तो हमेशा ही बना रहता है.
अब अगर सम्राट चौधरी ही मुख्यमंत्री बनते हैं, तो एक सवाल हर किसी के मन में उठ रहा है. क्या नीतीश कुमार की खाली जगह सम्राट चौधरी भर पाएंगे - एक्सपर्ट भी यही सवाल पूछ रहे हैं क्योंकि सम्राट चौधरी ही नहीं, किसी के लिए भी नीतीश कुमार जैसा सर्वमान्य नेता बनना बहुत मुश्किल है.
बिहार के लिए कैसा होगा सम्राट चौधरी से नीतीश जैसी उम्मीद करना?
20 साल अपने आप में बहुत लंबा समय होता है. नीतीश कुमार 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, और अब कुर्सी छोड़ने जा रहे हैं. इस लंबी अवधि में, एक्सपर्ट की नजर में, नीतीश कुमार पूरा पॉलिटिकल पैकेज बन गए हैं - और सम्राट चौधरी के अलावा भी, और नेता मिलकर उस जगह को भरने की कोशिश करें, तो भी टास्क आसान नहीं होगा.
इंडिया टुडे टीवी पर, बिहार की हलचल पर अपनी राय देते हुए राजनीतिक विश्लेषक सज्जन कुमार कहते हैं, नीतीश कुमार की खाली की हुई जगह को भरना भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ा ही कठिन काम है. सज्जन कुमार इसे हर्क्युलियन टास्क बता रहे हैं.
सज्जन कुमार के अनुसार, स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के बावजूद नीतीश कुमार ऐसे नेता रहे हैं जिनसे हर वर्ग जुड़ाव महसूस करता था, और लोगों को उनका कोई विकल्प नहीं दिख रहा था. मतलब यह है कि नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक के जरिए एक ऐसा गहरा और व्यक्तिगत लीडरशिप का गैप बना दिया है, जिसे बीजेपी या सम्राट चौधरी जैसे नेताओं के लिए जल्दी भर पाना बेहद मुश्किल है.
सज्जन कुमार कहते हैं, मौजूदा एनडीए में कोई भी नेता उस लेवल का नजर नहीं आता जिसकी हर तबके में स्वीकार्यता हो, सामाजिक संतुलन के साथ जो लंबे समय के लिए भरोसा दिला सके, और ये सब गढ़ने में नीतीश कुमार को भी करीब दो दशक लग गए.
1. सेहत ठीक न होने के बावजूद नीतीश कुमार ऐसे नेता बने रहे, जिनसे हर जाति, हर समुदाय और हर तबके के लोग किसी न किसी तरह खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं - ये विशिष्ट व्यक्तिगत अपील हासिल करने में नीतीश कुमार को भी समय लगा है.
2. 2020 के बिहार चुनाव में बीजेपी ने जेडीयू को पछाड़ने के साथ ही सबसे कम सीटों पर समेट दिया था, लेकिन उसके बावजूद पार्टी को कोई ऐसा नेता नहीं मिला जो बिहार की जटिल सामाजिक संरचना, लोकप्रियता और विभिन्न वर्गों से जुड़ाव के मामले में नीतीश कुमार की बराबरी कर सके.
3. नीतीश कुमार के बाद जो वैक्यूम बनेगा उसे भर पाना आसान नहीं होगा, क्योंकि नीतीश कुमार बिहार के लोगों की नजर में जरूरत बन चुके हैं. रेस में सम्राट चौधरी भले सबसे आगे हों, लेकिन नीतीश की जगह ले पाना बहुत कठिन है.
4. नीतीश कुमार का मृदुभाषी होना, उनका करिश्माई व्यक्तित्व और आभामंडल, उन पर महिलाओं का भरोसा, महादलित समुदाय और अति पिछड़े वर्ग की उम्मीदें - ये सब ऐसी चीजें हैं जो नीतीश कुमार को अलग लेवल पर ले जाती हैं, जो किसी और के लिए वैसा ही कर पाना मुश्किल तो है ही.
5. सम्राट चौधरी की सबसे बड़ी ताकत उनका ओबीसी समुदाय से होना है. सम्राट चौधरी के पास अभी पूरा वक्त है, और वो बीजेपी को काफी आगे ले जा सकते हैं, लेकिन वक्त तो लगेगा ही. और, ये सब इस बात पर भी निर्भर करता है कि बीजेपी और जेडीयू कैसे मिलकर चीजों को आगे बढ़ाते हैं.
निशांत कुमार को तो सब कुछ साबित करना है
निशांत कुमार, अब नीतीश कुमार के बेटे से दो कदम आगे जाकर जेडीयू की सदस्यता भी ले चुके हैं. नीतीश कुमार के करीबी और सलाहकारों की कोशिश निशांत कुमार को भी नेता बना देने की है, लेकिन यह इतना आसान भी तो नहीं है.
नीतीश कुमार जिस परिवारवाद की राजनीति के अब तक विरोधी रहे, निशांत कुमार अब उसी राजनीति की उपज बन गए हैं. और, जेडीयू में परिवारवाद की राजनीति ऐसे दौर में जन्म लिया है, जब बिहार में परिवारवाद की राजनीति अपने निम्नतम स्तर तक पहुंच गई है.
तेजस्वी यादव और निशांत कुमार में फर्क भी बस इतना भर ही है कि एक विपक्ष में है, और दूसरे को सत्ता पक्ष का भरपूर सपोर्ट है. जेडीयू लीडरशिप का भी, और गठबंधन पार्टनर बीजेपी का भी.
निशांत कुमार को लेकर राजनीतिक विश्लेषक सज्जन कुमार अभी बहुत उत्साहित नहीं लगते. उनका मानना है कि निश्चित तौर पर निशांत कुमार को नीतीश कुमार का बेटा होने के नाते लोगों की सहानुभूति मिलेगी. लेकिन, सिर्फ नीतीश कुमार का बेटा होने की वजह से ही सब कुछ तो मिल नहीं जाएगा - निशांत कुमार को पहले अपनी काबिलियत साबित करनी होगी.
सज्जन कुमार का मानना है कि निशांत कुमार के होने से ग्राउंड पर बहुत कुछ होने वाला नहीं है, बल्कि लोगों की दिलचस्पी इस बात में होगी कि नीतीश कुमार ने जो चीजें शुरू की, जो पॉलिसी लागू की वे धरातल पर बाद में भी उतरते हैं या नहीं.
सम्राट की स्वीकार्यता का भी सवाल है
बीजेपी के लिए भी नीतीश कुमार की बनी बनाई सत्ता की राजनीतिक इमारत पर काबिज होना उतना ही मुश्किल है, जितना सम्राट चौधरी का नीतीश कुमार की जगह को भर पाना. अब तक का सफर बीजेपी ने नीतीश कुमार के साए में तय किया है. निश्चित तौर पर बीजेपी ने अच्छे सहयोगी की भूमिका निभाई है.
2020 में नीतीश कुमार के कमजोर हो जाने पर भी मुख्यमंत्री बनाए रखा. सज्जन कुमार की नजर में 2025 नीतीश कुमार के लिए बिहार के लोगों का 'फेयरवेल मैंडेट' था. मतलब, लोग मान चुके थे कि नीतीश कुमार के लिए 2025 विधानसभा का आखिरी चुनाव होने जा रहा है.
'25 से 30 फिर से नीतीश' - 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का ये नारा बार-बार याद भी दिलाया जा रहा है. फेयरवेल मैंडेट में भी लोगों की यही अपेक्षा है. आगे कुछ और हो न हो, यथास्थिति बनी रहे. नई सरकार को नीतीश कुमार की तरफ से मिलने वाले सुपरविजन की व्यवस्था भी इसीलिए दी जा रही है. 7, सर्कुलर रोड शिफ्ट होने के बाद 2030 तक 1, अणे मार्ग पर उनकी नजर बने रहने की बात इसीलिए की जा रही है.
मीडिया में आ रही खबरों पर नजर डालें, तो यही सब समझ में आता है. जेडीयू कार्यकर्ताओं और नेताओं की नाराजगी तो उसी दिन देखने को मिल गई थी, जब नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने जा रहे थे. बड़े नेताओं की तरफ से उनको समझाने की कोशिश हुई है, जिसमें निशांत कुमार को आगे किया जाना भी शामिल है.
लेकिन जेडीयू नेता अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं. मीडिया से बातचीत में ऐसे नेताओं का कहना है अगर नीतीश कुमार भी सम्राट चौधरी को सपोर्ट करेंगे, तो भी सवाल खत्म नहीं हो पाएंगे. फेयरवेल मैंडेट के बदले भी लोगों को नीतीश कुमार जैसा ही नेता चाहिए.
सम्राट चौधरी के कुर्सी पर बैठते ही कदम कदम पर नीतीश कुमार से तुलना होगी, जेडीयू नेताओं का ऐसा ही मानना है. जेडीयू नेताओं के मन में सवाल ये भी है कि क्या सम्राट चौधरी पुराने विवादों से पीछा छुड़ा पाएंगे? बीजेपी को भी अंदरूनी कलह से जूझना ही होगा. क्योंकि, सम्राट चौधरी भी घाट घाट का पानी पीते हुए ही बीजेपी में पहुंचे हैं - नीतीश कुमार को तो बीजेपी ने बर्दाश्त करना सीख लिया था, सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री के तौर पर स्वीकार करना अलग चैलेंज है.