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6 नागा युवकों की लाशें मिलने से मणिपुर में खुला खूनखराबे का नया चैप्टर, दिल्ली में 'चुभने वाली चुप्पी'

मणिपुर में कुकी और नागा समुदायों के बीच खूनखराबा एक महीने से चल रहा है. अगवा किए गए छह नागा युवकों की लाशें मिलने से बदले की आग एक बार फिर भड़क गई है. लेकिन, इस हिंसा में एक ऐसा ‘धार्मिक एंगल’ है, जिसके चलते कोई आवाज नहीं उठा रहा है. संघर्ष वाले इलाकों में महिलाओं के फ्रंटलाइन में आने से सुरक्षा बल भी संभलकर चल रहे हैं.

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मणिपुर के कुकी और नागा समुदाय आमने-सामने हैं. हत्याओं और अगवा किए जाने का दौर जारी है.
मणिपुर के कुकी और नागा समुदाय आमने-सामने हैं. हत्याओं और अगवा किए जाने का दौर जारी है.

13 मई को अगवा किए गए 6 नागा युवकों की लाशें मिल गई हैं. इस खबर के साथ मणिपुर के उत्तर पूर्वी तीन पहाड़ी जिलों सेनापति, कांगपोकपी और उखरुल में खूनखराबे का दौर फिर से शुरू हो गया. यहां फिर दो समुदाय आमने-सामने हैं. कुकी बनाम नागा. अपहरण, हत्याओं का दौर चल रहा है. राज्य में अब भी भाजपा की सरकार है, और मुख्यमंत्री एक मैतेई हैं. लेकिन सबसे ज्यादा हैरान और विचलित करने वाली है, वह है मणिपुर की हिंसा के इस दूसरे चक्र पर दिल्ली में 'चुभने वाली चुप्पी'. आखिर, इस बार की हिंसा में ऐसा क्या है, जो दिल्ली में इस पर कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा है. सरकार तो छोड़िए, विपक्ष को भी रुचि नहीं है.

साल 2023 में जब कुकी-मैतेई संघर्ष हुआ था, तब दिल्ली के सियासी गलियारों से लेकर संसद तक में भारी हंगामा हुआ था. सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए गए थे, बड़े नेताओं के दौरे हुए थे और टीवी चैनलों पर चौबीसों घंटे बहस चलती थी. मगर इस बार सब चुप हैं. इस चुप्पी का राज समझने के लिए इस ताजा संकट के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को गहराई से देखना होगा. 

मणिपुर पिछले तीन सालों से जातीय और सामाजिक उथल-पुथल के एक ऐसे दुष्चक्र में फंसा है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा. साल 2023 के मई महीने में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच भड़की हिंसा की यादें अभी देश के जेहन में ताजा ही थीं कि पिछले करीब एक महीने से राज्य के उत्तरी पहाड़ी जिलों में खूनखराबा, गोलीबारी और अपहरण का एक नया और भयावह दौर शुरू हो गया है. पुलिस, असम राइफल्स और भारतीय सेना लगातार स्थिति पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वहां कानून-व्यवस्था दम तोड़ चुकी है.

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कुकी-नागा समुदायों के बीच खूनखराबा क्यों हो रहा है?

मणिपुर की भौगोलिक बनावट को देखें तो घाटी में मुख्य रूप से मैतेई समुदाय रहता है, जबकि चारों तरफ की पहाड़ियों में कुकी और नागा जनजातियां रहती हैं. साल 2023 की हिंसा पूरी तरह से 'घाटी बनाम पहाड़ी' यानी मैतेई और कुकी समुदायों के बीच थी. उस संघर्ष का कारण कोर्ट का एक आदेश था, जिसमें मैतेई समुदाय को भी जनजाति का दर्जा दिए जाने की बात कही गई थी. उस समय नागा समुदाय काफी हद तक न्यूट्रल रहा था.

लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं. इस बार का सीधा टकराव कुकी और नागा समुदायों के बीच है. वह भी नागालैंड से सटे तीन उत्तरी जिलों सेनापति, कांगपोकपी और उखरुल में. जहां दोनों जनजातियों के अलग-अलग गांव बसे हैं. हिंसा का मुख्य कारण जमीन पर वर्चस्व, प्रशासनिक नियंत्रण और पुराना जातीय टकराव (Ethnic Rivalry) है. नागा संगठनों का आरोप है कि कुकी आर्म्ड नार्को ग्रुप उनके पारंपरिक इलाकों में अतिक्रमण कर रहे हैं. मई में चर्च से जुड़े तीन बेहद सम्मानित नागा नेताओं की अज्ञात बंदूकधारियों द्वारा की गई बेरहम हत्या ने बारूद के ढेर में चिंगारी का काम किया. इसके बाद बदले और रंजिश का एक ऐसा दौर शुरू हुआ जिसने आम नागरिकों को अपनी चपेट में ले लिया.

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बंदूक के साए में जिंदगी और 'ह्यूमन शील्ड' का खेल

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था 'एमनेस्टी इंटरनेशनल' (Amnesty International) और स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस हिंसक झड़प के बाद दोनों तरफ से 48 से अधिक निर्दोष नागरिकों का सामूहिक अपहरण कर उन्हें बंधक बना लिया गया. इन बंधकों में छोटे बच्चे, महिलाएं और ट्रेनिंग ले रहे युवा पादरी भी शामिल थे. हालांकि, स्थानीय संगठनों के दबाव के बाद कुछ बंधकों को रिहा किया गया है. दो दिन पहले ही 14 कुकी बंधकों को नागा उग्रवादी समूहों ने रिहा किया. लेकिन, अपहरण किए गए नागा युवकों की रिहाई न होने से गतिरोध खत्म नहीं हुआ. यूनाइटेड नागा काउंसिल (UNC) और कुकी संगठनों के बीच बातचीत अटकी रही. और लोग अपने ही घरों में बंदूक के साए में जीने को मजबूर रहे.

बुधवार को सुरक्षा बलों ने अगवा किए गए 6 नागा युवकों के शव बरामद किए. लाशें इम्फाल के जवाहर लाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस में पोस्टमार्टम के लिए लाई गईं. यह खबर जैसे ही हिंसा में झुलस रहे पहाड़ों तक पहुंची, फिर बवाल मच गया. सोशल मीडिया पर एक कुकी गांव को जलाए जाने के विजुअल वायरल हो रहे हैं. तो दूसरी ओर सेनापति में नागा पीपुल्स फ्रंट के ऑफिस को उपद्रवियों द्वारा तोड़फोड़ दिया गया है.

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सेना और सुरक्षा बलों की अपनी चुनौती है

मणिपुर के जातीय संघर्ष का सबसे चिंताजनक पहलू है पुलिस और सेना की स्थिति. चाहे मैतेई बनाम कुकी संघर्ष रहा हो, या अब कुकी बनाम नागा समुदाय के बीच हो रही हिंसा. सभी जातियों के अपने-अपने हथियारबंद ग्रुप्स सेना और पुलिस को अपना दुश्मन मानते रहे हैं. इन्हीं जातियों के कुछ उग्रवादी संगठन सीमापार म्यांमार में ठिकाना बनाए हुए हैं, और जब वे मणिपुर में आकर हिंसा करते हैं तो यह पहचान पाना कठिन होता है कि कोई स्थानीय है और कौन बाहरी. कुकी बनाम नागा संघर्ष में कई वीडियो ऐसे आए हैं, जहां देखा जा रहा है कि जनजातीय लोग सैनिकों से कह रहे हैं कि ये हमारा इलाका है, और हम सेना को नहीं आने देंगे. कई जगहों पर सैनिकों पर पेट्रोल बम भी फेंके गए हैं.

महिलाओं की ह्यूमन शील्ड

इस बार की हिंसा का एक और सबसे चिंताजनक और खौफनाक पहलू यह है कि दोनों समुदायों ने महिलाओं को 'फ्रंटलाइन' यानी संघर्ष के मोर्चे पर आगे कर दिया है. जब भी सुरक्षा बल या सेना किसी उग्रवादी संगठन या बंधक बनाने वाले समूह के खिलाफ कार्रवाई करने आगे बढ़ती है, तो सैकड़ों की संख्या में महिलाएं सड़कों को ब्लॉक कर देती हैं. उग्रवादी समूह इन महिलाओं का इस्तेमाल एक 'ह्यूमन शील्ड' के रूप में कर रहे हैं. यह रणनीति सिर्फ इसलिए बनाई गई है क्योंकि सुरक्षा बल महिलाओं पर बल प्रयोग करने से झिझकेंगे.

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राजनीतिक खामोशी के पीछे धार्मिक एंगल

अब सवाल उठता है कि इस मानवीय त्रासदी पर दिल्ली में कोई बवाल क्यों नहीं हो रहा है? इसका जवाब राजनीति की उस कड़वी और अवसरवादी हकीकत में छिपा है, जो केवल तभी जागती है जब नैरेटिव उनके फायदे का हो.

2023 की हिंसा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत आसानी से एक धार्मिक रंग दे दिया गया था. चूंकि मैतेई समुदाय मुख्य रूप से हिंदू है और कुकी समुदाय मुख्य रूप से ईसाई है, इसलिए नैरेटिव बनाना बेहद आसान था. विपक्ष और वैश्विक संगठनों ने इसे 'बहुसंख्यक हिंदुओं द्वारा अल्पसंख्यक ईसाइयों पर हमले' के रूप में पेश किया. इस नैरेटिव की वजह से राजनीतिक दलों को केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार पर 'सांप्रदायिक' होने का ठप्पा लगाने का सीधा मौका मिल गया था.

लेकिन यह बात कुकी-नागा हिंसा को लेकर नैरेटिव बनाने में फिट नहीं बैठती. कुकी समुदाय भी पूरी तरह से ईसाई है और नागा समुदाय भी ईसाई है. यानी इस बार का संघर्ष 'ईसाई बनाम ईसाई' है. इस लड़ाई में कोई हिंदू एंगल या बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक का मुद्दा ही नहीं है. दोनों ही पक्ष चर्च जाने वाले लोग हैं और दोनों ही जनजातियां हैं. जैसे, मैतेई-कुकी समुदाय के बीच संघर्ष का सदियों पुराना इतिहास है, वैसा ही खूनी अतीत कुकी और नागा जनजातियों की आपसी लड़ाई का है.

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भले ही दिल्ली में इस पर राजनीति न हो रही हो, लेकिन मणिपुर के आम नागरिक के लिए यह किसी नरक से कम नहीं है. मई 2023 से शुरू हुए इस पूरे चक्र में अब तक 200 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और 60,000 से अधिक लोग बेघर होकर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं. कुकी-मैतेई संघर्ष के बाद मणिपुर के मुख्यमंत्री को बदल दिया गया, लेकिन ताजा कुकी बनाम नागा संघर्ष को देखकर लगता है कि वहां हालात में कुछ नहीं बदला.

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