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बंगाल राष्ट्रपति शासन की ओर? ममता बनर्जी की ED पर 'कार्रवाई' से धारा 356 की चर्चा तेज़

पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का कैंपेन संभाल रही I-PAC कंपनी पर ईडी की रेड के बाद बीजेपी ही नहीं CPI(M) और कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की गिरफ्तारी की मांग की है. इसी के साथ राष्ट्रपति शासन की चर्चा तेज हो गई.

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ममता बनर्जी ने ईडी के रेड के विरोध में गुरुवार को प्रेस को संबंधित करते हुए.
ममता बनर्जी ने ईडी के रेड के विरोध में गुरुवार को प्रेस को संबंधित करते हुए.

पश्चिम बंगाल की राजनीति उबाल पर है. 8 जनवरी 2026 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) और इनकम टैक्‍स द्वारा इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC) के कोलकाता ऑफिस और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के घर पर छापा मारा गया. खबर थी कि ये संस्‍था हवाला से लेन-देन कर रही है. छापे की खबर सुनकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद मौके पर पहुंचीं और ED अधिकारियों से लोहा ले लिया. उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी. वे जब्त दस्तावेज और हार्ड डिस्क साथ ले गईं.

आरोप लगाया कि I-PAC पर छापा मारकर उनकी चुनावी रणनीति का भेद जानने की कोशिश की गई है. ममता बनर्जी की ED पर कार्रवाई ने विपक्षी दलों को हमलावर होने का मौका दे दिया है. भाजपा ने इसे संघीय एजेंसी में बाधा करार दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन की मांग उठाई.

यह घटना 2026 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुई है, जब TMC और भाजपा के बीच जंग चरम पर है. सवाल उठता है कि क्या बंगाल राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है? और क्या यह केंद्र की NDA सरकार के लिए माकूल मौका है कि वह अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाकर चुनाव कराए? 

ED रेड और ममता का हस्तक्षेप

ED की रेड एक फर्जी सरकारी नौकरियों के घोटाले से जुड़ी बताई जा रही है, जहां एक संगठित गिरोह ने लोगों को नौकरियां देने का झांसा देकर ठगा. जांच के दौरान ED ने कोल स्कैम से जुड़े फंड्स को I-PAC तक ट्रेस किया, जो 2022 में कथित रूप से TMC के गोवा चुनाव कैंपेन के लिए इस्तेमाल हुए. 

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IPAC के सह-संस्थापक प्रतीक जैन TMC के IT सेल हेड भी हैं, और ममता के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार भी. बिहार की जनसुराज पार्टी के फाउंडर प्रशांत किशोर ने ही इस संस्‍था की स्‍थापना की थी. और ममता का पिछला कैंपेन वे ही संभाल रहे थे.  ED का दावा है कि रेड के दौरान जब्‍त किए गए दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत ममता ने हथिया लिए.

जबकि ममता ने इसे राजनीतिक बदला करार दिया और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को 'नास्टी' और 'नॉटी होम मिनिस्टर' कहा. उन्होंने आरोप लगाया कि ED TMC के इंटरनल डेटा, कैंडिडेट लिस्ट और चुनावी स्ट्रैटेजी चुराने की कोशिश कर रही थी. ममता ने खुद फाइल्स और लैपटॉप ले लिए, जो वीडियो में कैद हो गया.

यह पहली बार नहीं है जब ममता केंद्रीय एजेंसियों से टकराई हैं. 2019 में CBI रेड के दौरान वह धरने पर बैठी थीं, और 2021 में चुनावी हिंसा के बाद राष्ट्रपति शासन की मांग उठी थी. लेकिन इस बार, चुनाव से ठीक पहले, यह घटना अधिक गंभीर लगती है. ED ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है, जहां IPAC और TMC ने भी पिटीशन फाइल की हैं. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्यमंत्री होने के नाते गिरफ्तारी से कोई संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिलती, और अगर ED साबित कर दे कि फाइल्स जांच से जुड़ी हैं, तो ममता पर बड़ी कार्रवाई हो सकती है.

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विपक्ष की मांग: गिरफ्तारी और राष्ट्रपति शासन

घटना के बाद विपक्ष ने ममता पर हमला तेज कर दिया. CPI(M) के मोहम्मद सलीम ने कहा कि ममता ने जैन को बचाया क्योंकि भ्रष्टाचार के सभी दस्तावेज उनके पास हैं. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि IPAC ने TMC के लिए धन उगाही की और चुनाव जीतने में साजिशपूर्ण मदद की. दोनों दलों ने ममता की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की. भाजपा ने इसे भ्रष्टाचार का बचाव बताया और पूछा कि अगर कुछ छिपाने को नहीं है, तो मुख्यमंत्री जांच स्थल पर फाइल्स क्यों ले गईं?  राष्ट्रपति शासन की मांग भी जोर पकड़ रही है.

बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि ममता ने संवैधानिक संकट पैदा किया है. यह मांग अनुच्छेद 356 पर आधारित है, जो राज्य में संवैधानिक मशीनरी के फेल होने पर केंद्र को राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति देता है. ऐतिहासिक रूप से, बंगाल में 1968, 1970 और 1971 में राष्ट्रपति शासन लगा चुका है, लेकिन 2011 में TMC की सत्ता आने के बाद से राज्य में कभी राष्ट्रपति शासन नहीं लगा है. 2021 में चुनावी हिंसा के बाद भाजपा ने मांग की थी, जो केंद्र ने नहीं मानी.

राष्ट्रपति शासन की संभावना और अनुच्छेद 356 और 365 की परिस्थितियां

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कानूनी और राजनीतिक पहलू क्या बंगाल राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है? वर्तमान स्थिति से लगता है कि हां, लेकिन यह आसान नहीं है. अनुच्छेद 356 के तहत, राज्यपाल की रिपोर्ट पर केंद्र राष्ट्रपति शासन लगा सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एसआर बोम्मई केस (1994) के फैसले ने इसे सीमित किया है.

इसमें कहा गया कि राष्ट्रपति शासन तभी लगाया जा सकता है जब राज्य में संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह टूट जाए, और केंद्र को संसद में बहुमत साबित करना पड़ता है.वर्तमान में, ममता का हस्तक्षेप जांच में बाधा माना जा सकता है, जो IPC की धारा 186 के तहत अपराध है.
 ED PMLA की धारा 67 के तहत मजबूत है, जो जांच अधिकारियों को व्यापक शक्तियां देती है. अगर ED साबित कर दे कि ममता ने सबूत हटाए, तो गिरफ्तारी संभव है. लेकिन राज्य पुलिस ने ED अधिकारियों पर ही FIR दर्ज की है, जो संघीय तनाव बढ़ा रही है.

संविधान के अनुच्छेद 365  के अनुसार यदि कोई राज्य सरकार केंद्र द्वारा दिए गए किसी विशिष्ट निर्देश का पालन करने में विफल रहती है (जिन मामलों पर संघ का अधिकार क्षेत्र है), तो राष्ट्रपति यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है.
यह अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने का एक अतिरिक्त और ठोस आधार प्रदान करता है.

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पर राजनीतिक रूप से, बंगाल में TMC की मजबूत पकड़ है. 2021 में 213 सीटें जीतीं, और 2024 लोकसभा में 29 सीटों पर पार्टी ने कब्जा जमाया है. लेकिन ED-CBI जांचों से TMC नेता जैसे अभिषेक बनर्जी प्रभावित हैं. अगर ममता गिरफ्तार होती हैं, तो अराजकता फैल सकती है, जो राष्ट्रपति शासन का आधार बन सकती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह मुश्किल है. 

ममता बनर्जी सरकार पर कब कब लटकी बर्खास्तगी की तलवार

ममता बनर्जी की सरकार पर कई बार बर्खास्तगी तलवार लटकी पर वो बच गईं. कई ऐसी घटनाएं हैं  जो अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन का औचित्य साबित करते हैं. 

-2021 चुनावों के बाद हुई हिंसा में सैकड़ों मौतें हुईं, जिसमें भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया. सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी जांच की मांग की.
- सन्देशखाली कांड में महिलाओं पर अत्याचार और भूमि हड़पने के आरोपों पर सरकार की निष्क्रियता स्पष्ट रही है.

-कोयला घोटाला, नौकरी घोटाला और शारदा चिट फंड जैसे मामलों में टीएमसी नेता शामिल रहे हैं. खुद कई मंत्रियों को दबाव के चलते ममता ने बर्खास्त किया.

- ईडी-सीबीआई जांचों में अभिषेक बनर्जी जैसे शीर्ष नेताओं पर आरोप है. आईपैक रेड में ममता का हस्तक्षेप जांच में बाधा बहुत बड़ा आधार है. इसके चलते राज्य में संवैधानिक संकट पैदा हुआ है. इसके पहले भी संदेशखाली मामले में जांच करने पहुंची ईडी की टीम पर हमला हुआ . अधिकारियों को जान बचाना मुश्किल पड गया था.

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- बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा की टीम पर हमला में राज्य सरकार की बहुत किरकिरी हुई थी.

NDA के लिए माकूल मौका? फायदे और जोखिम

क्या यह NDA सरकार के लिए राष्ट्रपति शासन लगाकर चुनाव कराने का अच्छा मौका है? राजनीतिक गणित से लगता है कि हां, लेकिन जोखिम भरा है. 

चुनावी लाभ: 2026 चुनावों में भाजपा TMC को कमजोर कर सकती है. राष्ट्रपति शासन से केंद्रीय सुरक्षा बलों के तहत निष्पक्ष चुनाव हो सकता है, जहां भाजपा को हिंसा के आरोप से राहत मिलेगी. 2021 में पोस्ट-पोल वायलेंस ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया.

 CPI(M) और कांग्रेस की मांग NDA को समर्थन देती है. INDIA गठबंधन में दरार पड़ सकती है, क्योंकि कांग्रेस बंगाल में TMC विरोधी है.ED जांचों से TMC की छवि खराब हो रही है. राष्ट्रपति शासन से केंद्र भ्रष्टाचार मुक्त बंगाल का नैरेटिव बना सकता है. 

केंद्र की एनडीए सरकार के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अभी भी इस मुद्दे को लेकर शांत है. बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगते ही विपक्षी दल एक सुर में केंद्र को तानाशाह बोलने में देर नहीं लगाएंगे.
 दूसरी तरफ ममता की गिरफ्तारी या राष्ट्रपति शासन से TMC को सहानुभूति मिल सकती है, जैसे 2021 में मिली. ममता ने तब केंद्र की साजिश का नैरेटिव बना दिया था. ऐसा नरेटिव एक बार फिर ममता तैयार कर रही हैं.

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सुप्रीम कोर्ट भी हस्तक्षेप कर सकता है. बोम्मई केस से राष्ट्रपति शासन की समीक्षा होती है. विपक्षी राज्य इसे लोकतंत्र पर हमला कहेंगे.

एक दौर वो भी था जब छोटे -छोटे कारणों पर बर्खास्त हो गईं सरकारें

एसआर बोमई केस (1994) में फैसला आने के पहले तक छोटे और तुच्छ मामलों में राज्य सरकारें बर्खास्त होती रही हैं. पंजाब में 1951 में संविधान लागू होने के महज 17 महीने बाद पहली बार इस्तेमाल किया गया. मुख्यमंत्री गोपीचंद भार्गव के इस्तीफे के बाद आंतरिक कलह के कारण लगाया गया. कोई बड़ा संवैधानिक संकट नहीं था, सिर्फ कांग्रेस के अंदरूनी विवाद. यह सबसे छोटा और शुरुआती दुरुपयोग माना जाता है.

1959 में केरल में पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार (ई.एम.एस. नंबूदरीपाद) को बर्खास्त किया.  कारण सिर्फ इतना  था कि शिक्षा सुधार बिल पर विरोध प्रदर्शन और हिंसा.कर्नाटक में आंतरिक कलह के चलते 1990 में सरकार बर्खास्त कर दी गई.इंदिरा गांधी ने 1966 से 1977 तक 39 बार सरकारों को गिरा दिया.1980 में इंदिरा गांधी ने अपनी वापसी के  बाद 9 विपक्षी सरकारें एक साथ हटाईं. सरकारिया आयोग का कहना है कि 75 बर्खास्तगी के मामलों में से 52 बार इस अधिनियम का दुरुपयोग पाया गया.

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