7 अक्टूबर 2023 की सुबह. इजरायल में हमास का हमला. कुछ ही घंटों के भीतर नई दिल्ली से बयान आया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायल के साथ एकजुटता जताई. उसके बाद फोन पर बात हुई. दूसरी तरफ थे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू. संदेश साफ था कि आतंकवाद के खिलाफ भारत इजरायल के साथ है. यह दृश्य आज के रिश्तों की तस्वीर है. दोनों देशों का एक-दूसरे को खुला समर्थन. सार्वजनिक संवाद. रणनीतिक भरोसा. लेकिन, ऐसा हमेशा नहीं था.
कहानी शुरू होती है 17 सितंबर 1950 से. जब भारत ने इजरायल को मान्यता दी. और मान्यता देकर डिप्लोमैटिक दरवाजा बंद कर दिया. दोनों देशों में एक दूसरे के दूतावास नहीं खोले गए. औपचारिक रिश्ते बनाने से भी किनारा किया गया. करीब 42 साल तक दोनों देशों के रिश्ते जैसे फ्रीज रहे. अब सवाल उठता है कि इजरायल से ये दूरी क्यों रखी गई? उस दौर में भारत को नई नई आजादी मिली थी. विदेश नीति नैतिक आधार पर खड़ी की जा रही थी. उपनिवेशवाद का विरोध. आत्मनिर्णय का समर्थन.
इजरायल के मामले में भारत के भीतर वही चूरण बिका जो इस्लामिक दुनिया ने बेचा. भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के बंटवारे के प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया. बाद में उसने फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन को मान्यता दी. यासर अराफात दिल्ली आते. गले मिलते. तस्वीरें बनतीं. बावजूद इसके कि पीएलओ से जुड़े आतंकी दुनिया में इजरायली नागरिकों की हत्या करते. अराफात खुद सशस्त्र विद्रोह के पैरोकार थे, लेकिन अहिंसक भारत ने इस दोस्ती को निभाया.
दरअसल, भारत खुद को अरब दुनिया का दोस्त दिखाना चाहता था. तेल की जरूरत थी. खाड़ी में भारतीयों के लिए रोजगार की संभावनाएं थीं. सोचा गया कि अगर इजरायल से दूरी रखी जाएगी तो अरब देश भारत के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे. खासकर कश्मीर पर.
दूरी से क्या मिला?
समय बीतता गया. 1950 के दशक से 80 के दशक तक. कश्मीर का सवाल संयुक्त राष्ट्र में उठता रहा. पाकिस्तान लगातार अभियान चलाता रहा. इस्लामिक सहयोग संगठन यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन में पाकिस्तान का असर मजबूत रहा. दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश होने के बावजूद भारत को वहां जगह नहीं मिली. अरब देशों ने भारत के खिलाफ मोर्चा नहीं खोला. पर उन्होंने पाकिस्तान को भी पूरी तरह अलग नहीं किया. बल्कि, कहीं न कहीं सपोर्ट ही किया.
पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कई बार कह चुके हैं कि भारत ने फिलिस्तीन पर स्पष्ट समर्थन दिया, लेकिन बदले में कश्मीर पर वैसा ठोस समर्थन नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी. यानी दूरी रखकर कोई बड़ा कूटनीतिक बोनस नहीं मिला.
हमसे क्या मिस हुआ?
भारत दुनिया में निर्गुट देशों का नेतृत्व कर रहा था, वहीं इधर इजरायल एक सिक्योरिटी नेशन के रूप में तेजी से आगे बढ़ रहा था. उसने रक्षा तकनीक में बड़ी छलांग लगाई. 1967 और 1973 में अरब देशों से युद्ध लड़कर उसने अपनी ताकत को साबित किया भी. उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद दुनिया में सक्रिय थी. जिसने इजरायल की रक्षा में ट्रंप कार्ड का रोल प्ले किया. भारत को डिफेंस टेक्नोलॉजी और इंटेलिजेंस में कमजोरी को काफी खामियाजा भुगतना पड़ा. हमने अकेले ही चुनौतियां झेलीं.
1962 में चीन से युद्ध. 1965 और 1971 में पाकिस्तान से युद्ध. इन तीनों मौकों पर इजरायल ने चुपचाप मदद की. हथियार और गोला बारूद भेजे. यानी रिश्ते जमे हुए थे. पर इजरायल का एकतरफा भरोसा कायम रहा. फिर 1980 का दशक आया. पंजाब में आतंकवाद. कश्मीर में उग्रवाद. भारत को आधुनिक निगरानी तकनीक और खुफिया सहयोग की जरूरत थी. अगर उस समय औपचारिक रक्षा सहयोग होता, तो तस्वीर अलग हो सकती थी.
रणनीतिक विश्लेषक सी राजा मोहन लिखते हैं कि भारत ने पश्चिम एशिया को लंबे समय तक वैचारिक नजर से देखा. जबकि उसे व्यावहारिक संतुलन पहले बनाना चाहिए था.
1992 में दरवाजा खुला
शीत युद्ध खत्म हुआ. सोवियत संघ टूट गया. अब दुनिया दो हिस्सों में नहीं बंटी थी. शक्ति संतुलन अमेरिका की तरफ झुक गया था. डिफेंस सप्लाय के लिए भारत रूस के अलावा दुनिया के दूसरे स्रोतों की तरफ देख रहा था. भारत ने इजरायल संबंधों वाली फाइल पर जमी धूल झाड़ी. जनवरी 1992 में आखिरकार दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए. दरवाजा खुलते ही रिश्ते तेजी से बढ़े. रक्षा सौदे हुए. कृषि और जल प्रबंधन में सहयोग शुरू हुआ. जिसमें इजरायल के पास महारत हासिल है.
फिर आया 1999 का करगिल युद्ध. रिश्तों की अजमाइश वाले इस मोड़ पर इजरायल ने फिर दिखाया कि उसके पास भारत को ऑफर करने के लिए क्या क्या है. उसके ड्रोन और लेजर गाइडेड सिस्टम ने ऊंचाई वाले मोर्चों पर भारतीय सेना को बढ़त दी. इसके साथ ही साफ हो गया कि यह साझेदारी भारत के लिए कितनी उपयोगी है.
सोचिए. अगर 1970 के दशक में ही ड्रोन तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी सहयोग शुरू हो जाता. अगर आतंकवाद विरोधी प्रशिक्षण पहले मिलता. तो शायद 80 और 90 के दशक की कुछ चुनौतियां अलग ढंग से संभाली जा सकती थीं. 42 साल की दूरी ने समय छीन लिया.
फिर आया 2017
जुलाई 2017 में पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री इजरायल गया. पीएम नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू समुद्र किनारे साथ टहलते दिखे. तस्वीरें ऐतिहासिक साझेदारी का हिस्सा गईं. यह सिर्फ फोटो अपॉर्चुनिटी नहीं थी. यह संकेत था कि अब भारत इस रिश्ते को छुपाकर नहीं रखेगा. रक्षा, साइबर सिक्योरिटी, स्टार्टअप, कृषि, वाटर मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी. हर क्षेत्र में समझौते हुए. और खास बात ये रही कि भारत ने फिलिस्तीन के समर्थन की अपनी नीति भी जारी रखी. यानी संतुलन कायम रहा.
आज की तस्वीर
अक्टूबर 2023 की वह फोन कॉल कोई औपचारिकता या शिष्टाचारवश ही नहीं थी. वह चार दशकों की दूरी और तीन दशकों की निकटता की कहानी का नतीजा थी. आज भारत इजरायल से एडवांस डिफेंस सिस्टम्स ले रहा है. जॉइंट रिसर्च हो रही है. खुफिया सहयोग खुलकर होता है. इजरायल भारत को एशिया में एक स्थिर और बड़ा साझेदार मानता है. भारत इजरायल को तकनीक और सुरक्षा के मामले में भरोसेमंद सहयोगी मानता है. मीडिया में खबरे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जब बुधवार को अपना दो दिवसीय इजरायल दौरा शुरू करेंगे तब दोनों देशों के बीच का डिफेंस कोऑपरेशन नई करवट लेगा. मल्टी बिलियन डॉलर डिफेंस डील होने की खबर है. एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन टेक्नोलॉजी और मिसाइलें खरीदी जाएंगी. भारत इजरायल का सबसे बड़ा रक्षा खरीदार है. 2020 से 2024 के बीच इजरायली डिफेंस एक्सपोर्ट का 34 फीसदी हिस्सा भारत का था.
अब दोनों के लिए विन-विन परिस्थितियां
ऐसा नहीं है कि भारत-इजरायल संबंधों का फायदा सिर्फ हमें ही मिल रहा है. या सिर्फ हमारी ही जरूरतें पूरी हो रही हैं. इजरायल को भारत के रूप में एक बड़ा ग्लोबल पार्टनर मिला है. डेढ़ अरब की आबादी वाला एक लोकतांत्रिक देश. डिप्लोमैटिक सर्कल में जिसकी आवाज को दुनिया अनसुना नहीं कर पाती है. हमास के आतंवाद के मुद्दे पर भारत ने इजरायल का खुलकर समर्थन किया. ऐसे समय में भी जब दुनिया के कई देश हिचकिचा रहे थे. भारत ने इजरायल में हुए आतंकी हमले को लेकर जो स्टैंड लिया, उसने दुनिया को दिशा दी. इजरायल इसे हमेशा याद रखेगा. डिप्लोमैसी के बाद यदि डिफेंस सेक्टर की बात की जाए तो अब ‘मेक इन इंडिया’ के तहत इजरायल के साथ मिलकर भारत में एडवासं डिफेंस सिस्टम बनाने जा रहा है. इसकी शुरुआत अडानी कॉर्पोरेशन के हैदराबाद प्लांट में हो चुकी है, जहां इजरायली हेरमेस 900 एलबित सिस्टम पर आधारित भारतीय ड्रोन दृष्टि 10 स्टारलाइनर ड्रोन का निर्माण किया जा रहा है.
42 साल का सबक
1950 से 1992 तक की दूरी पूरी तरह गलत नहीं थी. उस समय के अपने तर्क थे. तेल की जरूरत थी. शीत युद्ध की सीमाएं थीं. घरेलू राजनीति के दबाव थे. पर पीछे मुड़कर देखें तो यह साफ दिखता है कि भारत संतुलन पहले भी बना सकता था. अरब देशों से रिश्ते भी रहते. और इजरायल से खुला सहयोग भी होता. आज जब दोनों देश खुले मंच पर एक दूसरे के साथ खड़े हैं, तब 42 साल की दूरी एक ऐतिहासिक विराम जैसी लगती है.
उस विराम ने हमें सिखाया कि विदेश नीति में भावनाएं और सिद्धांत जरूरी हैं. पर रणनीतिक हितों को ज्यादा देर तक रोका नहीं जा सकता. कहानी का अंत 1992 पर नहीं हुआ. वह 2017 में नई ऊंचाई पर पहुंची. और 2023 में उसने मजबूती का सार्वजनिक रूप दिखाया. भारत और इजरायल की यह दोस्ती अब छुपी हुई लाइन नहीं है. यह खुली साझेदारी है. बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी इजरायल में सिर्फ डील साइन ही नहीं करेंगे, बल्कि वे वहां की संसद को भी संबोधित करेंगे. पीएम मोदी का भाषण दो देशों के संबंधों की व्याख्या तो करेगा ही. साथ ही वह गाजा में अमन की उम्मीद भी जगाएगा. इजरायल में भारतीय नेतृत्व की इस मौजूदगी को किसी बोर्ड ऑफ पीस से कम नहीं समझा जाना चाहिए.