भारत में वामपंथी दलों का पतन सबक है सभी राजनीतिक दलों के लिए, कि उन्हें क्या नहीं करना चाहिए. लेफ्ट पार्टियों ने अपनी विचारधारा के दम पर कभी कांग्रेस विरोधी ध्रुव के रूप में खुद को स्थापित किया था. फिर भाजपा की सांप्रदायिकता के नाम पर अपनी आइडियोलॉजी से समझौता करते हुए कांग्रेस को समर्थन देने की गलती की. अब कहा जा रहा है कि कांग्रेस देश में नया वामदल बन गया है. और लेफ्ट पार्टियां हाशिये पर पहुंच गई हैं और अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं. लेफ्ट पार्टियों के सामने आज का संकट सिर्फ सीटों का नहीं है. यह पहचान का संकट है. एजेंडे का संकट है. और नेतृत्व का संकट तो है ही.
आजादी के बाद शुरुआती दशकों में वामपंथी दलों की राजनीति कांग्रेस विरोध के गर्भ से ही निकली. 1960 और 70 के दशक में सीपीआई और फिर सीपीएम ने कांग्रेस को पूंजीपतियों की पार्टी बताया. वैसे ही जैसे कांग्रेस अब भाजपा के बारे में कहती है. ‘सूट बूट की सरकार‘. फिर इंदिरा गांधी के दौर में जब कांग्रेस ने लेफ्ट की ओर झुकाव वाली नीतियां अपनाई गईं, तब भी लेफ्ट ने उसे 'आधी-अधूरी समाजवादी' राजनीति कहा. 1977 में जनता पार्टी सरकार के दौरान लेफ्ट ने कांग्रेस विरोधी पक्ष को और मजबूत किया. यही वह समय था जब वाम दलों ने खुद को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित किया.
पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में उनकी सरकारें बनीं. ट्रेड यूनियन, छात्र राजनीति, किसान आंदोलन. हर जगह लेफ्ट की मजबूत मौजूदगी थी. हिंदी पट्टी वाले राज्य यूपी, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी कई इलाकों पर लेफ्ट पार्टियों और उनके नेताओं का प्रभाव दिखता था. बंगाल में भूमि सुधार और पंचायत व्यवस्था ने उन्हें दशकों तक सत्ता में बनाए रखा. प्रकाश करात खुद कहते रहे कि लेफ्ट की ताकत उसकी वैचारिक स्पष्टता है.
90's की बड़ी भूल
1990 के दशक में भाजपा के उभार ने लेफ्ट को असमंजस में डाल दिया. मंडल बनाम कमंडल की राजनीति में लेफ्ट ने खुद को धर्मनिरपेक्षता का स्वाभाविक रक्षक मान लिया. भाजपा को मुख्य दुश्मन मानते हुए कांग्रेस के प्रति उनका नजरिया बदलने लगा. राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं कि लेफ्ट ने भाजपा विरोध को अपनी पूरी राजनीति का केंद्र बना लिया और वर्ग संघर्ष का सवाल पीछे छूट गया.
2004 में यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन देना इसी सोच का नतीजा था. लेफ्ट ने इसे 'कम नुकसान वाला विकल्प' बताया. लेकिन यहीं से लेफ्ट की वैचारिक जमीन खिसकने लगी. मनमोहन सिंह सरकार की आर्थिक नीतियों पर वे विरोध तो करते रहे, लेकिन सत्ता को गिराने का जोखिम नहीं उठाया. न्यूक्लियर डील के वक्त समर्थन वापस लिया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. सीताराम येचुरी तर्क दिया था कि उस समय भाजपा को रोकना जरूरी था. लेकिन आलोचकों का कहना है कि लेफ्ट ने तब तक कांग्रेस को वैचारिक मान्यता दे दी थी. और खुद उसकी जूनियर पार्टनर बन गई.
आज कई विश्लेषक कहते हैं कि कांग्रेस ने लेफ्ट का स्पेस कब्जा कर लिया. इतिहासकार रामचंद्र गुहा एक इंटरव्यू में कहते हैं कि भारत में लेफ्ट पॉलिटिक्स की जरूरत खत्म नहीं हुई, लेकिन उसका प्रतिनिधि चेहरा बदल गया है. लेफ्ट पार्टियों के बारे में वे कहते हैं कि उनकी बातों में भारत से ज्यादा दूसरे देशों के प्रति प्यार झलकता था. इसके नतीजे में राइट विंग, खासकर भाजपा को ये कहने का मौका मिला कि वह ज्यादा देशभक्त है. गुहा भारत में दक्षिणपंथ के उभार में भी लेफ्ट के नैरेटिव को दोषी मानते हैं.

बंगाल का ब्लंडर
पश्चिम बंगाल में इसका सबसे बड़ा नुकसान हुआ. 34 साल सत्ता में रहने के बाद जनता से दूर हुआ लेफ्ट विचारधारा से भी कट गया. सिंगूर और नंदीग्राम ने उस कटाव को उजागर कर दिया. ममता बनर्जी ने खुद को गरीबों और किसानों की नेता के रूप में पेश किया. और लेफ्ट, जो कभी जमीन की राजनीति करता था, सिर्फ प्रशासनिक होकर रह गया. 2012 में बंगाल में लेफ्ट की हार सिर्फ ममता की जीत नहीं थी. वह लेफ्ट की वैचारिक हार थी. जनता को लगा कि लेफ्ट और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं रहा.
इसके बाद जो हुआ, वह और भी दिलचस्प है. कांग्रेस धीरे-धीरे खुद को 'सॉफ्ट लेफ्ट' के रूप में पेश करने लगी. मनरेगा, खाद्य सुरक्षा कानून, सामाजिक न्याय की भाषा. ये सब कांग्रेस के एजेंडे बने. राहुल गांधी की राजनीति में असमानता, जाति और सोशल जस्टिस के सवाल केंद्र में आए. यही भाषा कभी लेफ्ट की पहचान थी.
आगामी बंगाल चुनाव में कांग्रेस का लेफ्ट से अलग होकर ममता बनर्जी के खिलाफ अकेले लड़ने का फैसला लेफ्ट के संकट को और गहरा करता है. यह साफ संदेश है कि कांग्रेस अब लेफ्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहती. कांग्रेस को लगता है कि उसका वोट बैंक अब खुद खड़ा हो सकता है. जबकि लेफ्ट उसे पीछे रोक रही है. उधर, कांग्रेस के बेरुखी के बाद लेफ्ट नेताओं ने बंगाल में दीगर पनाहगाह ढूंढने शुरू कर दिए हैं. सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम की बंगाल में बाबरी मस्जिद बनवा रहे जनता उन्नयन पार्टी प्रमुख हुमायूं कबीर से हुई मुलाकात को इसी नजरिये से देखा जा रहा है.
केरल का संकट
केरल में तस्वीर थोड़ी अलग है, लेकिन संकट वहां भी है. केरल लेफ्ट का आखिरी मजबूत किला है. पिनराई विजयन की सरकार ने प्रशासनिक दक्षता दिखाई है. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वैचारिक लेफ्ट की जीत है या सिर्फ एक कुशल मुख्यमंत्री की.
केरल में भी कांग्रेस मुख्य विपक्ष है. वहां लेफ्ट को हर चुनाव में यह तय करना पड़ता है कि कांग्रेस से कैसे लड़ें और भाजपा को कैसे रोकें. मार्क्सवादी इतिहासकार केएन पनिकर जैसे वामपंथी विचारक केरल में यह संभावना भी टटोलते हैं कि संघ परिवार को रोकने के लिए कांग्रेस और लेफ्ट को साथ आना चाहिए. हालांकि, स्थानीय लेफ्ट नेतृत्व मानता है कि इसका फायदा फिर कांग्रेस को मिलेगा और उसकी रही सही जमीन भी चली जाएगी.
नेतृत्व का संकट इस पूरी कहानी का अहम हिस्सा है. वाम खेमे के भीतर ही यह बात मानी जाती है कि लेफ्ट के पास आज ऐसा कोई राष्ट्रीय चेहरा नहीं है, जो युवाओं को आकर्षित कर सके. प्रकाश करात और येचुरी जैसे नेता पर्दे से हट चुके हैं, लेकिन लेफ्ट की राजनीति पुराने फ्रेम में ही फंसकर रह गई है. आज के पोलित ब्यूरो में जनाधार वाले नेताओं का टोटा साफ दिखाई देता है. वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ कहते हैं कि लेफ्ट ने राजनीति को चुनावी गणित तक सीमित कर दिया. उसने आंदोलन छोड़ दिए और गठबंधनों में उलझ गया.
छात्र राजनीति में भी लेफ्ट की पकड़ कमजोर हुई है. जेएनयू और हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी जैसे गढ़ों में भी अब वह संघर्ष की बजाय बयानबाजी तक सीमित दिखती है. मजदूर संगठनों का दायरा सिमटा है. असंगठित क्षेत्र में लेफ्ट की मौजूदगी लगभग न के बराबर है.
लेफ्ट की दुविधा
लेफ्ट की दिक्कत यह है कि वह कांग्रेस से दूरी भी नहीं बना पा रहा और पूरी तरह उसके साथ भी नहीं जा पा रहा. भाजपा को वह अपना मुख्य दुश्मन मानता है. लेकिन कांग्रेस से लड़ते हुए उसे डर लगता है कि वोट कटेंगे और फायदा भाजपा को होगा. यही दुविधा लेफ्ट को कमजोर कर रही है.
आज लेफ्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उसका दुश्मन कौन है. भाजपा या कांग्रेस. अगर भाजपा है, तो कांग्रेस से समझौता जायज लगता है. अगर कांग्रेस भी पूंजीवादी राजनीति का हिस्सा है, तो उससे लड़ना जरूरी है. लेकिन दोनों साथ नहीं हो सकते.
आज जब कहा जा रहा है कि कांग्रेस नया वामदल बन गई है, तो उसमें काफी हद तक सच्चाई है. कम से कम भाषा और एजेंडे के स्तर पर. लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस की राजनीति सत्ता केंद्रित है, जबकि लेफ्ट की राजनीति सैद्धांतिक. फर्क यहीं है. लेकिन जनता के लिए सिद्धांत नहीं, असर मायने रखता है. और इस कसौटी पर लेफ्ट पिछड़ गया है.
लेफ्ट भूल गया कि भाजपा विरोध जरूरी है, लेकिन अपनी राजनीति की कीमत पर नहीं. वर्ग संघर्ष, रोजगार, असमानता और श्रम के सवालों पर कभी वामपंथी नेता सड़कों पर होते थे. अब जब राहुल गांधी सड़क पर उतरते हैं तो डी राजा जैसे कॉमरेड तस्वीरों के कोने में नजर आते हैं. ये संकट सिर्फ लेफ्ट पार्टियों का है. क्योकि वे भले इतिहास बन जाएंगी, उनकी विचारधारा तो दूसरों के झंडे तले जिंदा रहेगी ही.