जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने के कुछ दिनों बाद सम्राट हिरोहितो ने टोक्यो के सरेंडर की घोषणा की थी, जिससे प्रशांत क्षेत्र में द्वितीय विश्व युद्ध का अंत हुआ था. युद्ध शुरू होने के महीनेभर बाद 2 अप्रैल को राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को धमकी दी कि अमेरिका उन्हें इतनी बुरी तरह मारने जा रहा है कि वे फिर से पाषाण युग में पहुंच जाएंगे, जिसके के वे हकदार हैं.
इस संबोधन के एक दिन बाद, ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ईरानी शहर करज में एक पुल पर किए गए हमले का वीडियो साझा किया, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि इससे पहले कि "सब कुछ खत्म हो जाए" ईरान को "समझौता कर लेना चाहिए. इससे कुछ घंटे पहले, अमेरिका-इजरायल के हमलों ने तेहरान के ऐतिहासिक पाश्चर संस्थान (Pasteur Institute) को निशाना बनाया, जो देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का एक सदी पुराना स्तंभ है. यह ईरान और पूरे मध्य पूर्व के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित अनुसंधान और सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में से एक था.
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जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के 'स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज' में अंतरराष्ट्रीय मामलों और मध्य-पूर्व अध्ययन के ईरानी-अमेरिकी प्रोफेसर, वली नस्र ने इस संस्थान को 'ईरान की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की एक मिसाल और आधुनिक ईरान का प्रतीक' बताया.
उन्होंने एक्स पर लिखा “इसे नष्ट करने का ईरान के इतिहास पर हमला करने और उसके आधुनिकीकरण व विकास के गौरव को मिटाने के अलावा कोई और मकसद नहीं हो सकता. यह ईरानियों को वापस पाषाण युग में धकेलने जैसा है.”
'आज़ादी में मदद’ से लेकर ‘पाषाण युग में भेजने’ तक
ट्रंप की यह धमकी संघर्ष के दौरान देश के नागरिक और आर्थिक बुनियादी ढांचे पर बढ़ते हमलों और सैन्य ठिकानों पर की जा रही निरंतर बमबारी के बीच आई है, जो युद्ध जारी रखने के तेहरान के संकल्प को कम करने में विफल रही है. हालांकि, सभ्यता पर हमला करने की उनकी ताजा धमकी ट्रंप के अपने मानकों के हिसाब से भी बहुत आगे निकल गई है.
यह जनवरी में ईरानी प्रदर्शनकारियों को इस्लामिक शासन से मुक्त होने की उनकी लड़ाई में समर्थन देने के ट्रंप के पिछले प्रस्ताव से बिल्कुल विपरीत है. यहां तक कि पश्चिम में रहने वाले ईरानी असंतुष्टों ने भी ट्रंप की आलोचना की है. एक पोस्ट में ब्रिटिश-ईरानी अभिनेत्री नाजनीन बोनियादी, जो लंबे समय से इस्लामिक गणराज्य के खिलाफ अभियान चला रही हैं, ने कहा- "ईरान को 'पाषाण युग' में भेजने की धमकियां अमानवीय हैं."
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ट्रंप की यह बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी इस बात को ज़ाहिर करती है कि वह उस 'जल्द जीत' को हासिल न कर पाने से कितने हताश हैं, जिसका भरोसा उन्हें इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दिलाया था. ईरान का मज़बूत इरादा, उसका डटकर मुकाबला करना, और युद्ध को अपनी सीमाओं से बाहर तक ले जाना, जिसमें खाड़ी क्षेत्र के पड़ोसी देशों पर जवाबी हमले शामिल हैं. साथ ही 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' को रोककर दुनिया भर में वित्तीय और ऊर्जा संकट पैदा कर देना. इन सबने ट्रंप को एक ऐसे संघर्ष में फंसा दिया है, जिससे वह किसी भी कीमत पर बाहर निकलना चाहते हैं.
अंत का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा
राष्ट्र के नाम अपने 'फूल्स डे' संबोधन से एक दिन पहले, ट्रंप ने वादा किया था कि वे किसी समझौते के बिना भी, चार से छह हफ़्तों के भीतर ईरान से अमेरिकी सेना को वापस बुला लेंगे. हालांकि अपने भाषण में उन्होंने इस बात की पुष्टि नहीं की, न ही उन्होंने इस बात का कोई संकेत दिया कि क्या वे युद्ध को जल्द से जल्द समाप्त करने के लिए ज़मीनी हमले के ज़रिए संघर्ष को और तेज़ करने का इरादा रखते हैं. असल में, उन्होंने कुछ भी नया नहीं कहा.
अपने 28 फरवरी के वीडियो में, ट्रंप ने वादा किया था कि अमेरिका "उनकी मिसाइलों को नष्ट कर देगा और उनके मिसाइल उद्योग को पूरी तरह जमींदोज कर देगा." लेकिन युद्ध के पांच हफ्तों के बाद भी, ईरान अपने खाड़ी पड़ोसियों और इजरायल की ओर रोजाना मिसाइलें दागने में सक्षम है.
ट्रंप और नेतन्याहू दोनों ने उस दिन यह संकेत दिया था कि वे ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहते हैं. ट्रंप का दावा है कि तेहरान में सत्ता पहले ही बदल चुकी है, और वे इसे "उचित" बताते हैं. असलियत यह है कि इस्लामी शासन न केवल मजबूती से कायम है, बल्कि अब यह अली खामेनेई के नेतृत्व वाले शासन की तुलना में कहीं अधिक कट्टर और समझौते के प्रति कम इच्छुक है. अली खामेनेई की युद्ध के पहले ही दिन हत्या कर दी गई थी.
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परमाणु खतरा
इस युद्ध का एक और मुख्य उद्देश्य ईरान की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता को रोकना था. इस देश के पास अभी भी लगभग 450 किलोग्राम 60 प्रतिशत एनरिच्ड यूरेनियम मौजूद है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसे इस्फ़हान में छिपाकर रखा गया है. 90 प्रतिशत एनरिचमेंट हासिल करने के बाद यह 10 परमाणु बम बनाने के लिए काफ़ी है. अपने भाषण में ट्रंप ने कहा था कि उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है, क्योंकि यह जमीन के काफी नीचे एक ऐसी जगह पर मौजूद है, जिस पर सैटेलाइट से नजर रखी जा रही है.
इससे इजरायल बहुत ज़्यादा घबरा जाएगा, अगर ट्रंप पीछे हट जाते हैं और ईरान के पास एनरिच्ड यूरेनियम का एक बड़ा जख़ीरा छोड़ जाते हैं, तो यह इज़रायल के लिए एक बुरे सपने जैसा हो सकता है. अली खामेनेई के बेटे, मोजतबा के नेतृत्व में ईरान का मौजूदा नेतृत्व बदला लेने के लिए कहीं ज़्यादा दृढ़ होगा और शायद बम बनाने की कोशिश भी कर सकता है.
विडंबना यह है कि इजरायली और अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के नेताओं की टारगेट कीलिंग ने ईरान के उन उदारवादी चेहरों को खत्म कर दिया है, जो परमाणु कार्यक्रम पर समझौता करने के लिए अधिक इच्छुक होते. ओमान, जिसने ट्रंप और नेतन्याहू द्वारा युद्ध शुरू करने के फैसले के समय ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता की थी, ने पुष्टि की है कि ईरान बड़े समझौते करने के लिए तैयार था. अमेरिका और इजरायल ने अब वह अवसर खो दिया है.
सहयोगियों को अलग-थलग करना
ईरान पर आक्रमण करने के ट्रंप के फैसले के कारण भले ही होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी हुई हो, लेकिन अब वे उम्मीद करते हैं कि दूसरे देश इसे संभालें. उन्होंने अपने भाषण में इस बात को दोहराते हुए कहा कि जो देश होर्मुज के रास्ते खाड़ी से तेल आयात करते हैं, उन्हें ईरान पर इस मार्ग को फिर से खोलने का दबाव बनाने में नेतृत्व करना चाहिए. इस दौरान ट्रंप ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि अमेरिका भी खाड़ी से कुछ तेल और उर्वरकों का आयात करता है, जो इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं.
इससे पहले, उन्होंने नाकेबंदी को लेकर ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर बमबारी करने की धमकी दी थी, लेकिन तेहरान द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि वह खाड़ी में उसी तरह की जवाबी कार्रवाई करेगा, उन्होंने अपनी धमकियां वापस ले लीं. ब्रिटेन होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन यह कार्य कठिन है क्योंकि अमेरिका इसका हिस्सा नहीं है.
ट्रंप अमेरिका के नाटो (NATO) सहयोगियों, विशेष रूप से यूरोपीय देशों से युद्ध में शामिल न होने के कारण नाखुश हैं. मंगलवार को, ट्रंप ने ब्रिटिश समाचार पत्र 'द टेलीग्राफ' को बताया कि वे सैन्य गठबंधन से अमेरिका को बाहर निकालने पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि यूरोपीय देश ईरान में अमेरिका का समर्थन नहीं कर रहे हैं. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने ऐसी धमकी दी है, लेकिन इसका समय महत्वपूर्ण है. ईरान संघर्ष का एक लाभार्थी रूस रहा है, जिसे यूरोप अपने लिए मुख्य खतरे के रूप में देखता है, खासकर यूक्रेन पर आक्रमण के बाद.
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ईरान में चल रहा युद्ध यूरोपीय जनता के बीच बिल्कुल भी लोकप्रिय नहीं है, और दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में भी यही हाल है. यूरोपीय नेताओं का तर्क है कि NATO एक रक्षात्मक गठबंधन है और वह ट्रंप के अपनी मर्ज़ी से छेड़े गए इस युद्ध में शामिल होने को सही नहीं ठहरा सकता. उन्होंने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने हवाई क्षेत्र या ठिकानों तक पहुंच देने से मना करके ट्रंप को और भी ज़्यादा नाराज़ कर दिया है.
पिछले कुछ ही दिनों में, फ्रांस, इटली और ऑस्ट्रिया ने अमेरिका के ऐसे अनुरोधों को ठुकरा दिया है. हालांकि ट्रंप के लिए कांग्रेस की मंज़ूरी के बिना अमेरिका को NATO से बाहर निकालना मुमकिन नहीं है. और कांग्रेस के इसके लिए राज़ी होने की संभावना भी कम ही है, फिर भी उनकी बार-बार दी जा रही धमकियों की वजह से यूरोप को इस संभावना के लिए तैयार होना पड़ रहा है.
ट्रंप और नेतन्याहू ने भले ही युद्ध शुरू कर दिया हो, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी अवधि तय करने की शक्ति ईरान के पास है. ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत करने से इनकार कर दिया है और ट्रंप के उन दावों को कड़ाई से खारिज कर दिया है कि तेहरान युद्धविराम चाहता है. ईरान किसी भी ऐसे युद्धविराम समझौते को लेकर सतर्क है जो भविष्य में अमेरिका और इजरायल को उस पर दोबारा हमला करने का मौका दे सके. ईरान पर आक्रमण करने के फैसले के साथ ही, ट्रंप ने इस्लामिक गणराज्य को अपने सैन्य सिद्धांत का सफलतापूर्वक परीक्षण करने का एक अवसर दे दिया है.
जिस तरह चीन ने एक साल पहले अमेरिका के खिलाफ 'महत्वपूर्ण खनिजों' (Critical Minerals) के रणनीतिक महत्व को एक हथियार के रूप में पहचाना था, उसी तरह ईरान ने 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को अपना सबसे मारक हथियार बना लिया है. ईरान ने इस संघर्ष के दौरान खाड़ी देशों की कमजोरी को भी उजागर कर दिया है, बावजूद इसके या शायद इसी वजह से कि उनकी धरती पर अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं. खाड़ी देशों के खिलाफ ईरान के जवाबी हमलों ने न केवल उनकी अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि 'टैक्स-फ्री हेवन' और सुरक्षित छुट्टियों के गंतव्य के रूप में उनकी प्रतिष्ठा को भी धूमिल किया है, विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में.
उनकी रणनीति और तैयारी
ईरान दशकों से इस युद्ध की तैयारी कर रहा है, पिछले साल इजरायल के साथ हुए 12 दिनों के संघर्ष और अमेरिकी बमबारी के बाद, वहां के नेताओं ने सैन्य निर्णय लेने की प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण कर दिया था. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि यदि उनका केंद्रीय नेतृत्व खत्म भी हो जाए, तब भी सेना काम करती रहे. इसी योजना ने ईरान को टिके रहने और जवाबी कार्रवाई करने में मदद की. ईरान ने वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान तक अमेरिकी सैन्य अभियानों का बारीकी से अध्ययन किया और उनसे मिले सबक को अपने सैन्य सिद्धांतों में शामिल किया.
ईरान को 'पाषाण युग' में पहुंचाने की ट्रंप की धमकी से शासन के घुटने टेकने की संभावना कम ही है, ईरान की संसद के अध्यक्ष, मोहम्मद बकेर कलीबाफ ने चेतावनी दी है कि ईरान तब तक जवाबी कार्रवाई जारी रखेगा जब तक दुश्मन को अपनी आक्रामकता पर वास्तव में पछतावा न हो जाए. इससे संकेत मिलता है कि ईरान किसी भी धमकी के आगे झुककर युद्धविराम समझौते के लिए तैयार नहीं है.
कलीबाफ ने यह भी संकेत दिया कि ईरान इस युद्ध के परिणाम को किस रूप में देखता है. उन्होंने कहा, "हमारा मानना है कि यह युद्ध कई क्षेत्रीय संबंधों को बदल देगा, और हम उन स्थितियों में वापस नहीं लौटेंगे जो युद्ध से पहले थीं. हम क्षेत्र के उन देशों के साथ स्थायी सुरक्षा समझौते करने के लिए तैयार हैं जो आपसी गारंटी दे सकें और निवेशकों के लिए एक स्थिर और टिकाऊ सुरक्षा वातावरण बना सकें."
सवाल यह है कि क्या ट्रंप, नेतन्याहू और खाड़ी देशों के नेता इन शर्तों पर ईरान के साथ समझौता करने के लिए सहमत होंगे? इसकी संभावना बहुत कम है, जिसका अर्थ है कि यह युद्ध इतनी जल्दी समाप्त नहीं होने वाला है, जैसा कि ट्रंप ने अमेरिकियों से वादा किया है.
(नरेश कौशिक BBC और एसोसिएटेड प्रेस के पूर्व संपादक हैं, वे लंदन में रहते हैं)