राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को भारतीय राजनीति का सबसे मजबूत चुनावी गठबंधन मानने के पर्याप्त आधार हैं. केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व में सरकार है और सहयोगी दल सत्ता में हिस्सेदार हैं. लेकिन गठबंधन की मजबूती का असली परीक्षण तब होता है, जब उसके घटक दल उन मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र आवाज उठाने लगें, जिन्हें बीजेपी अपने राजनीतिक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती है.
मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर उठे विवाद पर केंद्रीय मंत्री और एनडीए के महत्वपूर्ण सहयोगी चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और तेलुगुदेशम नेता का बयान इसी लिहाज से सबका ध्यान खींचा है. चिराग पासवान ने कहा कि अगर चुनाव आयोग को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो मुख्य चुनाव आयुक्त को जनता के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. उनका कहना था कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के मन में संदेह पैदा होना चिंताजनक है और आयोग को अपनी बात जनता के सामने रखनी चाहिए.
यह कोई सरकार विरोधी बयान नहीं है. चिराग पासवान ने न तो एनडीए से दूरी बनाने की बात कही है और न ही चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोपों को स्वीकार किया है. लेकिन सत्ता पक्ष के एक प्रमुख सहयोगी का यह कहना कि संवैधानिक संस्था को जनता के संदेह दूर करने चाहिए, अपने आप में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है.
इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में एनडीए के सहयोगियों के बीच एक और मुद्दे पर अलग-अलग सुर सुनाई दिए हैं.समान नागरिक संहिता यानि यूसीसी मुद्दे पर दबे स्वर में ही सही पर एनडीए सहयोगियों ने अपनी बातें रखीं थीं.
दरअसल गृह मंत्री अमित शाह ने 2029 से पहले बीजेपी-एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने की बात कही. इसके बाद जेडीयू और दूसरे सहयोगी दलों ने तत्काल समर्थन की मुद्रा नहीं अपनाई. चिराग पासवान ने कहा कि पहले यूसीसी का मसौदा सामने आना चाहिए, उसके प्रावधानों को समझने के बाद ही पार्टी अपना रुख तय करेगी. ऐसी ही कुछ बातें जेडीयू और तेलुगुदेशम की तरफ से भी आईं थीं. उपेंद्र कुशवाहा ने भी कहा था कि औपचारिक प्रस्ताव आने पर उनकी पार्टी यूसीसी पर चर्चा करेगी और फैसला लेगी.
इन बयानों को अलग-अलग घटनाएं मानकर छोड़ देना आसान है. लेकिन इन्हें एक साथ रखकर देखें तो एनडीए की राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव दिखाई देता है.सहयोगी दल अब बीजेपी के एजेंडे के हर मुद्दे पर स्वतः सहमति जताने के बजाय अपनी राजनीतिक जमीन के हिसाब से प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
यह फर्क छोटा है, लेकिन गठबंधन राजनीति में महत्वपूर्ण है. बीजेपी लंबे समय से एनडीए की सबसे बड़ी और प्रभावशाली पार्टी रही है. गठबंधन के भीतर उसका राजनीतिक वजन बाकी सहयोगियों से कहीं अधिक है. यही कारण है कि कई बार एनडीए को सहयोगियों का गठबंधन कम और बीजेपी के नेतृत्व वाला विस्तृत राजनीतिक मंच अधिक माना जाता रहा है. लेकिन गठबंधन राजनीति में संख्या जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही महत्वपूर्ण होती है सहयोगियों की निर्भरता और उनकी अपनी राजनीतिक जरूरत.
चिराग पासवान के लिए बिहार की राजनीति महत्वपूर्ण है. उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति का आधार भी बिहार के सामाजिक समीकरणों से जुड़ा है. जेडीयू की अपनी अलग राजनीतिक पहचान और सामाजिक आधार है. ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का कोई एजेंडा जब उनके राज्य या उनके सामाजिक आधार को प्रभावित कर सकता है तो उनके लिए बिना सवाल किए समर्थन करना आसान नहीं होगा.
यही कारण है कि यूसीसी पर सहयोगियों की सावधानी को महज विरोध नहीं कहा जा सकता. यह उनके अपने मतदाताओं के प्रति राजनीतिक जवाबदेही भी हो सकती है.
सीईसी विवाद में चिराग का बयान भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है. चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता का सवाल किसी एक पार्टी का सवाल नहीं है. सत्ता पक्ष के सहयोगी के रूप में चिराग के लिए यह कहना कि जनता के मन में संदेह नहीं रहना चाहिए, उनके अपने राजनीतिक हित से भी जुड़ा हो सकता है. खासकर तब, जब एनडीए के सहयोगी दल आने वाले चुनावों में अपनी अलग पहचान और राजनीतिक स्पेस बनाए रखना चाहते हों.
लेकिन क्या इसे बीजेपी के कमजोर होने का लक्षण कहा जा सकता है? किसी गठबंधन में सहयोगियों का अपनी बात रखना अपने आप में नेतृत्व की कमजोरी का प्रमाण नहीं होता. लोकतांत्रिक गठबंधन में मतभेद स्वाभाविक हैं. बल्कि कई बार सहयोगियों की स्वतंत्र आवाज गठबंधन को अधिक व्यापक सामाजिक आधार देती है. समस्या तब शुरू होती है जब मतभेद लगातार बढ़ें, प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से अलग रास्ता अपनाने लगें और सीटों तथा सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर टकराव सामने आने लगे.
फिलहाल ऐसा निर्णायक संकेत दिखाई नहीं दे रहा है. बल्कि इसके उलट एनडीए के भीतर से एकता की अपील भी सामने आई है. बिहार में एनडीए के नेताओं ने सहयोगियों के बीच एकजुटता बनाए रखने पर जोर दिया है. उत्तर प्रदेश में भी एनडीए की सहयोगी अनुप्रिया पटेल ने गठबंधन में किसी दरार की अटकलों को खारिज किया है. इसलिए मौजूदा स्थिति को एनडीए में दरार कहना अतिशयोक्ति होगी. लेकिन इसे सहयोगियों की बढ़ती मुखरता जरूर कहा जा सकता है. और राजनीति में यही मुखरता भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत बन सकती है.
बीजेपी के लिए चुनौती यह नहीं है कि चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा या तेलुगुदेशम ने इस एक मुद्दे पर सवाल क्यों उठाया. चुनौती यह है कि क्या आने वाले समय में उसके सहयोगी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए लगातार स्वतंत्र रुख अपनाएंगे?
यदि बीजेपी का राजनीतिक प्रभुत्व मजबूत रहता है तो सहयोगी शायद अपनी सीमित असहमति के बावजूद गठबंधन में बने रहेंगे. लेकिन अगर राज्यों में बीजेपी की राजनीतिक ताकत कमजोर होती है या सहयोगियों की अपनी चुनावी उपयोगिता बढ़ती है, तो यही छोटे-छोटे मतभेद अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक सौदेबाजी में बदल सकते हैं.
बिहार इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण है. यहां बीजेपी को जेडीयू, एलजेपी (रामविलास), आरएलएम और अन्य सहयोगियों की जरूरत है. हर सहयोगी का अपना सामाजिक आधार है. इसलिए किसी भी सहयोगी को पूरी तरह बीजेपी की छाया में रहने की राजनीतिक मजबूरी पहले जैसी नहीं हो सकती. यही गठबंधन राजनीति का स्वाभाविक नियम है.जिसकी जरूरत बढ़ती है, उसकी आवाज भी बढ़ती है.
इसलिए सीईसी विवाद और यूसीसी पर सहयोगियों के बयान को बीजेपी के लिए तत्काल खतरे के रूप में देखना सही नहीं होगा. लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना भी राजनीतिक भूल होगी.एनडीए की असली ताकत केवल बीजेपी की संख्या में नहीं, बल्कि उसके सहयोगियों के साथ बने भरोसे में है. यदि सहयोगियों को लगता है कि उनकी राय सुनी जा रही है, तो असहमति भी गठबंधन के भीतर रह सकती है. लेकिन अगर उन्हें लगता है कि बड़े फैसले पहले हो रहे हैं और सहयोगियों से सिर्फ समर्थन की अपेक्षा की जा रही है, तो छोटे मतभेद धीरे-धीरे बड़े राजनीतिक सवाल बन सकते हैं.
फिलहाल चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा या तेलुगुदेशम के बयान विद्रोह नहीं हैं. ये गठबंधन छोड़ने की घोषणा भी नहीं हैं. लेकिन ये यह जरूर बताते हैं कि एनडीए के सहयोगी अब केवल साथ चलने की बात नहीं कर रहे, वे यह भी पूछ रहे हैं कि साथ चलते हुए उनकी अपनी राजनीतिक आवाज कितनी सुनी जाएगी. और यही सवाल बीजेपी के लिए भविष्य की गठबंधन राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सवाल हो सकता है. एनडीए में असंतोष अभी धीमा है, सीमित है और नियंत्रित है. लेकिन राजनीति में अक्सर बड़ी दरारें शोर से नहीं, छोटी-छोटी असहमतियों से शुरू होती हैं.