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बिहार में मांस-मछली खुले में बेचने पर रोक, हाइजीन की चिंता या कुछ और?

बिहार सरकार ने रमजान के महीने में राज्य में मांस-मछली की खुली बिक्री पर रोक लगाने का फैसला किया है. सरकार का कहना है कि इसका इरादा केवल साफ-सफाई और हाईजीन है. इसके साथ ही बच्चों पर गलत प्रभाव न पड़ने का भी तर्क दिया गया है.

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बिहार में खुले में मांस-मछली की बिक्री को रोकने में राज्य सरकार कितनी सफल होगी?
बिहार में खुले में मांस-मछली की बिक्री को रोकने में राज्य सरकार कितनी सफल होगी?

बिहार सरकार ने पिछले हफ्ते शहरी क्षेत्रों में खुले में और बिना लाइसेंस वाली मांस-मछली की दुकानों से बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी. उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने इसे राज्य विधान परिषद में शहरों को स्वच्छ बनाने की दिशा में एक कदम बताया था. पर इस मामले में सरकार की गंभीरता को इससे समझा जा सकता है कि उपमुख्यमंत्री ने रविवार को कहा कि शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों या भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों के पास खुले में मांस की बिक्री की अनुमति नहीं दी जाएगी. उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक सद्भाव का हवाला देते हुए यह भी कहा कि बच्चों में हिंसक प्रवृत्तियों को रोकने के लिए ऐसा किया जा रहा है.

 केवल फैसला ले लेने भर से अगर साफ सफाई में सुधार हो सकता है तो यह जरूर किया जाना चाहिए.पर बिहार सरकार के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए यह असंभव ही लगता है. जिस राज्य में शराब बंदी के बावजूद देश में प्रति व्यक्ति सबसे अधिक अवैध शराब पी जा रही हो वहां कानूनी आदेशों का पालन किस तरह हो रहा है उसके बारे में कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है.

जाहिर है कि खुले में और बिना लाइसेंस वाली मांस-मछली बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा का कितना क्रियान्वयन हो पाएगा इसमें संदेह लग रहा है. बिहार सरकार बड़ी सफाई से यह बता रही है कि इस फैसले से मांस या मछली के सेवन पर रोक नहीं लगाया जा रहा है. दरअसल बिहार में गैर-शाकाहारी आहार काफी प्रचलित है, जहां सालाना करीब 4.2 लाख टन मांस और 9.59 लाख टन से ज्यादा मछली का उत्पादन होता है. प्रतिबंध केवल शहरी क्षेत्रों में बिना लाइसेंस वाली और खुले में जैसे सड़क किनारे, साप्ताहिक बाजार, सार्वजनिक मार्गों पर मांस-मछली की बिक्री पर लगाया गया है. इसके साथ ही अब बिक्री सिर्फ लाइसेंस प्राप्त दुकानों तक सीमित है, जहां स्वच्छता मानक जैसे उचित अपशिष्ट निपटान जरूरी हैं. दुकानों में परदे, टिंटेड ग्लास या अन्य बैरियर लगाने अनिवार्य हैं ताकि मांस राहगीरों को न दिखे.

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पर सबसे मुश्किल आएगी बिना लाइसेंस वाले विक्रेताओं को नगर निकाय से अनुमति लेने में. मौजूदा लाइसेंसधारियों को बूचड़खानों या अधिसूचित बाजारों में स्थानांतरित किया जा सकता है. जाहिर है कि कोई भी विक्रेता वहां जाना नहीं चाहता है. क्योंकि अकसर बूचड़खाने ऐसी जगह होते हैं जहां सामान्य लोगों जाना नहीं चाहते. इसके चलते मांस-मछली बेचने वालों की बिक्री प्रभावित होती है.एक बात और है कि बूचड़खानों का अस्तित्व कितने शहरों में बचा रहा गया है, यह भी देखना होगा. जिन शहरों में बूचड़खाने हैं वहां जितनी दुर्व्यस्था है उसे ठीक करने में ही प्रशासन के पसीने आ जाएंगे. 

 उल्लंघन करने वाले मांस विक्रेताओं को बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007 के तहत जुर्माना, सामान जब्ती और दुकान सीज करने जैसे दंड शामिल हैं. इसके साथ ही अधिकारियों को सभी दुकानों की जांच, लाइसेंस सत्यापन और अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं. जाहिर है कि इस आदेश के बाद राज्य में मांस बेचने वाले पर पुलिसिंग बढ़ने वाली है. 

उत्तर प्रदेश में 2017 में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद ऐसे ही आदेश जारी किए गए. तात्कालिक तौर पर ताबड़तोड़ एक्शन भी लिए गए. कुछ समय के लिए तो यूपी के शहरों में मांस की दुकानें मिलनी ही बंद हो गई थीं. यूपी सरकार का आदेश था कि बकरे और मुर्गे को बूचड़खानों में काटा जाएगा. पर कुछ महीनों बाद ही सब कुछ पुराने ढर्रे पर आ गया. राजनीतिक दबाव, भ्रष्टाचार और संसाधनों की कमी ने इस तरह के आदेश को निष्प्रभावी बना दिया. 

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बिहार का फैसला भी इसी राह पर जा सकता है. क्योंकि बिहार में ऐसे आदेशों का क्रियान्वयन और भी मुश्किल है. सरकार का दावा है कि यह किसी समुदाय को निशाना नहीं बना रही है पर रमजान के महीने में मांस की बिक्री प्रभावित होगी तो जाहिर एक समुदाय को दिक्कत होगी ही.आरजेडी के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने सोमवार को को कहा, कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार धीरे-धीरे कमजोर होने के साथ ही भाजपा बिहार में अपना एजेंडा लागू करने में धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है. बिहार में खुले में मांस की बिक्री पहले से ही प्रतिबंधित है. लेकिन भाजपा इसे हिंदुत्व का रंग दे रही है.

फिलहाल सबसे बड़ी बात यह है कि मछली- मुर्गा-बकरे का मांस बेचने वाले अधिकतर दुकानदार बहुत छोटी आय वाले होते हैं.अधिकतर रोज कमा कर अपनी रोजी रोटी जुटाने वाले लोग होते हैं. पूर्वी यूपी और बिहार के गांवों में मल्लाह समुदाय के लोग मछली बेचने का काम करते रहे हैं. इनमें बहुत से ऐसे परिवार हैं जो अपने सर पर मछली की टोकरी लेकर गलियों में घूमकर बेचते रहे हैं. या सड़क के किसी नुक्कड़ पर एक टोकरी में 10 से 20 मछली बेचकर अपना परिवार पालते हैं. जाहिर है कि ये लोग समाज में अति पिछड़ें हैं. इनमें से बहुत से लोग यह भी नहीं जानते होंगे कि इसका लाइसेंस कैसे बनेगा. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि कुछ दिनों के लिए इन्हें अपना काम काज छोड़ना होगा. हैरानी  की एक बात और है कि मछली बेचने वालों में अधिकतर बीजेपी के वोटर्स हैं.

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