जब-जब चीन भारत की ओर दोस्ती या सामान्य संबंधों की मुद्रा में दिखता है, इतिहास की एक पुरानी याद ताजा हो जाती है. छत्रपति शिवाजी महाराज और अफजल खान की मुलाकात का प्रसंग. अफजल खान बातचीत और समझौते का बहाना लेकर आया था, लेकिन उसके इरादे साफ नहीं थे. शिवाजी ने उस धोखे को पहचान लिया और तैयारी के साथ उसका सामना किया. आज भारत-चीन संबंधों में भी यही पैटर्न बार-बार दिखता है. नेहरू काल की हिंदी-चीनी भाई-भाई से लेकर हाल के वर्षों तक, चीन का रवैया अक्सर दोस्ताना बयानों के साथ सीमा पर दबाव बढ़ाने का रहा है. आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के हालिया बयान और उसके बाद विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया ने इस बात को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि चीन अपनी मनमानी से बाज नहीं आ रहा है.
आईटीबीपी प्रमुख ने अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमने-सामने की स्थिति जारी रहने की बात कही. यह जुलाई से चल रही तनावपूर्ण स्थिति की पहली आधिकारिक पुष्टि मानी जा रही है. उन्होंने चीन को भारत का सबसे कठिन और शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी बताया और नई शौर्य कमांडो टीमों, ड्रोन प्लाटून तथा आधुनिकीकरण की बात की. इसके कुछ घंटे बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जयसवाल ने कहा कि जब चीनी सेना तय गश्त के तौर-तरीकों से हटती है, तब सीमा क्षेत्रों में स्थिति बिगड़ती है. दोनों पक्ष मौजूदा कूटनीतिक और सैन्य तंत्रों का इस्तेमाल करते रहते हैं, और सीमा पर शांति द्विपक्षीय संबंधों के लिए आवश्यक है. मंत्रालय ने विशिष्ट विवरण रक्षा मंत्रालय पर छोड़ दिए. यह बयानबाजी नए सिरे से पुराने सवाल को उठाती है कि क्या चीन वाकई शांति चाहता है, या दोस्ती का मुखौटा लगाकर जमीनी हकीकत बदलने की कोशिश करता रहता है.
इतिहास में सवाल के जवाब
इतिहास इस सवाल का जवाब बार-बार देता रहा है. 1950 के दशक में नेहरू की सरकार ने चीन के साथ मित्रता का संकल्प लिया था, लेकिन 1962 के युद्ध ने उस भरोसे को तोड़ दिया. उसके बाद दशकों तक सीमा विवाद बना रहा. 2020 के गलवान संघर्ष ने फिर साबित किया कि बातचीत के बीच भी चीनी सेना पैटर्न से हटकर कदम उठा सकती है. पूर्वी लद्दाख में तनाव के बाद अब अरुणाचल में ताक्सिंग और आसपास के इलाकों में आमने-सामने की स्थिति जारी है. चीन एक ओर ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत के साथ खड़ा दिखता है, दूसरी ओर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दबाव बनाए रखता है. यह दोहरा रवैया ही धोखेबाज दोस्त की छवि को मजबूत करता है.
चीन की रणनीति में एक पैटर्न साफ दिखता है. वह बातचीत, आर्थिक सहयोग और बहुपक्षीय मंचों पर सामान्य संबंधों का संकेत देता है, लेकिन सीमा पर अपनी स्थिति मजबूत करने, बुनियादी ढांचा बनाने और गश्त के पुराने तौर-तरीकों से हटने से बाज नहीं आता. आईटीबीपी प्रमुख का बयान इसी वास्तविकता को रेखांकित करता है. विदेश मंत्रालय का जवाब भी यह स्वीकार करता है कि चीनी सेना के निर्धारित पैटर्न से हटने पर स्थिति बिगड़ती है. यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह समस्या के स्रोत को चीन की कार्रवाई से जोड़ती है। फिर भी, दोनों पक्षों के बीच मौजूदा तंत्रों पर निर्भरता का जिक्र यह संकेत देता है कि भारत पूर्ण टकराव नहीं चाहता, बल्कि नियंत्रित और जवाबदेह तरीके से स्थिति संभालना चाहता है.
इस स्थिति में भारत के लिए सबक शिवाजी के प्रसंग से मिलता है. शिवाजी ने अफजल खान के साथ मुलाकात से पहले तैयारी पूरी कर ली थी. आज भारत को भी सीमा पर अपनी तैयारी मजबूत रखनी होगी, जैसा कि आईटीबीपी ड्रोन, शौर्य कमांडो और भूमिगत बुनियादी ढांचे के जरिए कर रहा है. साथ ही, कूटनीतिक बातचीत जारी रखनी होगी, क्योंकि सीमा का अंतिम समाधान सैन्य टकराव से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक समझौते से ही संभव है. लेकिन भरोसा एकतरफा नहीं हो सकता. जब चीन गश्त के नियमों से हटता है, तो भारत को भी अपनी प्रतिक्रिया स्पष्ट और निर्णायक रखनी होगी.
सामान्य संबंध बनाने की कोशिश
नेहरू से मोदी तक, हर सरकार ने चीन के साथ सामान्य संबंध बनाने की कोशिश की है. व्यापार बढ़ा है, सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ है, लेकिन सीमा का मूल विवाद जस का तस बना हुआ है. हाल के बयानों से साफ है कि चीन अभी भी अपनी शर्तों पर स्थिति बदलने की कोशिश कर रहा है. भारत की जनता और नीति-निर्माता दोनों को इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा. दोस्ती के मुखौटे के पीछे छिपे इरादों को पहचानना और उसी के अनुरूप तैयारी रखना, यही वर्तमान जरूरत है.
चीन को चैन तब तक नहीं मिलेगा, जब तक वह भारत के साथ समान और पारदर्शी संबंधों की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाता. जब तक वह सीमा पर मनमानी करता रहेगा, तब तक शिवाजी और अफजल खान की याद ताजा होती रहेगी. भारत को दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए भी अपनी सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए तैयार रहना होगा. यह संतुलन ही दीर्घकालिक स्थिरता का रास्ता है.