वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र है. पहले वाराणसी लोक सभा सीट पर प्रधानमंत्री मोदी को समाजवादी पार्टी चैलेंज करने वाली थी, लेकिन अब ये बीड़ा उठाने का जिम्मेदारी कांग्रेस ने ले ही है.
समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार की घोषणा होने के 24 घंटे के भीतर ही सब कुछ बदल गया. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच चुनावी गठबंधन होने के बाद अखिलेश यादव ने वाराणसी सीट राहुल गांधी के हिस्से में छोड़ दी - और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार का नाम वापस लेना पड़ा. सुरेंद्र सिंह पटेल चुनाव लड़ने की खुशियां ठीक से मना भी नहीं पाये थे कि जल्दी जल्दी समेट लेने का फरमान आ गया.
अब कांग्रेस-सपा गठबंधन के वाराणसी लोक सभा सीट से उम्मीदवार पर फैसला कांग्रेस यानी राहुल गांधी को लेना है - देखना है कांग्रेस किसी नये चेहरे को आजमाती है या फिर पुराने सिपाही पर भी फिर से भरोसा जताकर मोर्चे पर तैनात कर देती है.
जब से नरेंद्र मोदी वाराणसी से बीजेपी उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं, कांग्रेस अजय राय को ही मोर्चे पर खड़ा कर देती है. कांग्रेस नेतृत्व ने अजय राय को अब उत्तर प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष भी बना दिया है. वैसे अजय राय 2009 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर भी वाराणसी लोक सभा सीट से चुनाव लड़ चुके हैं.
क्या अखिलेश यादव ने दबाव में वाराणसी सीट छोड़ी?
वाराणसी का नाम उन तीन सीटों में तो नहीं शामिल था, जिन्हें लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर पेच फंसा हुआ था. वे तीन नाम तो बलिया, बिजनौर और मुरादाबाद के रूप में ही सामने आये थे.
समाजवादी पार्टी की पहली सूची में भी वाराणसी का जिक्र नहीं था. जिस सूची में बदायूं से अखिलेश यादव ने उम्मीदवार बदला था, उसी में वाराणसी से सुरेंद्र सिंह पटेल का नाम घोषित कर दिया गया था. बदायूं से समाजवादी पार्टी ने पहले मुलायम परिवार के ही अक्षय यादव को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन बाद शिवपाल सिंह यादव को उम्मीदवार घोषित किया गया है.
सुरेंद्र सिंह पटेल यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में सेवापुरी विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे, और तभी ये दावा कर सुर्खियां बटोरी थी कि अगर सेवापुरी से प्रधानमंत्री मोदी भी चुनाव लड़ें तो वो हरा देंगे. हालांकि, ये दावा उनका बड़बोलापन ही साबित हुआ, वो बीजेपी के नीलरतन सिंह पटेल से ही चुनाव हार गये.
सुरेंद्र सिंह पटेल को एक बार फिर झटका तब लगा जब सपा-कांग्रेस गठबंधन के तहत वाराणसी सीट के कांग्रेस के हिस्से में चले जाने की बात मालूम हुई, और वो भी तब जबकि उनको प्रत्याशी घोषित किये अभी 24 घंटे भी नहीं हुए थे.
जब समाजवादी पार्टी ने वाराणसी सीट के लिए उम्मीदवार की घोषणा की तब भी ये माना जा रहा था कि अखिलेश यादव ने कांग्रेस पर दबाव बढ़ाने के लिए ये कदम उठाया है. कांग्रेस की तो 2014 से ही वाराणसी सीट में दिलचस्पी रही है, लेकिन इतनी शिद्दत से रही होगी, ऐसा नहीं लगता था.
2019 में समाजवादी पार्टी की शालिनी यादव करीब दो लाख वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहीं. शालिनी यादव कांग्रेस के बड़े नेता और 1984 में सासंद रहे श्यामलाल यादव की बहू हैं. पेशे से फैशन डिजाइनर और 2017 में वाराणसी के मेयर का चुनाव लड़ चुकीं शालिनी यादव अब तो समाजवादी पार्टी छोड़ कर मोदी की शरण में ही जा चुकी हैं.
2014 में तो समाजवादी पार्टी चौथे स्थान पर पहुंच गयी थी, लेकिन उससे पहले 2009 में अजय राय समाजवादी पार्टी के टिकट पर ही चुनाव लड़े थे, और तीसरे स्थान पर रहे. वाराणसी सीट पर बीजेपी का 1991 से ही कब्जा है, सिर्फ 2004 में कांग्रेस के राजेश मिश्रा बीजेपी के शंकर प्रसाद जायसवाल को हरा कर चुनाव जीत गये थे.
अखिलेश यादव के वाराणसी सीट छोड़ देने की एक वजह तो यही लगती है कि कांग्रेस के साथ वो दूसरी सीटों के लिए दबाव बना सकें. शहर में समाजवादी पार्टी के वोटर जरूर हैं, लेकिन कांग्रेस की तरह वाराणसी कभी समाजवादी पार्टी गढ़ नहीं रहा है.
ये कहना ठीक नहीं होगा कि अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के दबाव में वाराणसी सीट छोड़ी है, बल्कि बेहतर ये कहना होगा कि कांग्रेस पर दबाव बनाने के लिए समाजवादी पार्टी ने वाराणसी सीट पर वैसे ही दावा जताया था, जैसे बस या ट्रेन के जनरल बोगी में लोग सीटों पर रुमाल रख देते हैं - और कहीं और सीट मिल जाने पर उठा भी लेते हैं.
जिस सीट पर हार निश्चित हो, वहां कांग्रेस की दिलचस्पी क्यों है
ये समझने की कोशिश भी काफी दिलचस्प है कि जिस लोक सभा सीट पर बीजेपी उम्मीदवार के अलावा फिलहाल किसी के लिए भी चुनाव जीत पाना नामुकिन हो, उसमें राहुल गांधी की इतनी दिलचस्पी क्यों है?
2014 में अरविंद केजरीवाल ने भी वाराणसी में बीजेपी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को चुनौती दी थी, लेकिन करीब पौने चार लाख के भारी अंतर से हार का मुंह देखना पड़ा. उससे ठीक पहले 2013 में अरविंद केजरीवाल दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को उनके इलाके में शिकस्त दे चुके थे.
ये ठीक है कि वाराणसी भी कभी कांग्रेस का गढ़ रहा है. अमेठी और रायबरेली की तरह गांधी परिवार का गढ़ तो नहीं, लेकिन कमलपति त्रिपाठी के जमाने में कांग्रेस के लिए वाराणसी की भी अहमियत अमेठी और रायबरेली से कम नहीं हुआ करती थी.
1991 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान आईपीएस अधिकारी रहे श्रीशचंद्र दीक्षित भी बीजेपी के टिकट पर संसद पहुंचे और 2009 में मुरली मनोहर जोशी भी वाराणसी से सांसद बने - और ये सिलसिला अब भी जारी है.
दिसंबर, 2023 में ही, INDIA ब्लॉक की बैठक में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ वाराणसी सीट से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को चुनाव लड़ाने की सलाह दी थी. 2019 में तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के एक बयान के बाद उनके भी वाराणसी से चुनाव लड़ने की संभावना को लेकर खूब चर्चा रही.
कहा तो ये जा रहा है कि वाराणसी सीट कांग्रेस ने अजय राय के लिए लिया है, लेकिन ये भी नहीं भूलना चाहिये कि मौजूदा यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय वाराणसी सीट से लगातार पिछला तीन चुनाव हार चुके हैं, जिनमें 2014 और 2019 भी शामिल है - और कभी भी तीसरे स्थान से ऊपर नहीं उठ पाये.
चुनाव मैदान में जीतने के लिए ही नहीं लड़ने के लिए भी कूद पड़ने का खास महत्व होता है, लेकिन ये काम तो अजय राय 2014 में ही कर चुके हैं. ऐसा करने की जरूरत तो 2019 में भी नहीं थी.
खबर थी कि गठबंधन के तहत कांग्रेस अजय राय के लिए इस बार बलिया लोक सभा सीट मांग रही थी, लेकिन अखिलेश यादव नहीं माने - तो क्या कांग्रेस एक बार फिर अजय राय को ही वाराणसी से उम्मीदवार बनाने की सोच रही है? या राहुल गांधी के दिमाग में कोई और चेहरा भी घूम रहा है?
वैसे एक सहज सवाल और भी उठता है, आखिर वाराणसी सीट पर राहुल गांधी की खास दिलचस्पी क्यों हो सकती है - 2019 की तरह कोई नया स्लोगन गढ़ रखा है क्या?