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बशीर बद्र की ज़िंदगी के यादगार क़िस्से | Storybox with Jamshed

Jamshed Qamar Siddiqui narrates the stories of human relationships every week that take the listener on a rollercoaster of emotions, love, and laughter. Stories are written by Jamshed and by his fellow writers that talk about the various colors of life conflicts from father-son relationships to love triangle. Stories that let you be someone else for some time to see this world from a different angle.

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Jamshed
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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

स्टोरीबॉक्स में आज कहानी उस करिश्माई शायर की ... जिसकी काबिलियत, जिसकी ज़िंदगी ऐसी थी कि वो जिस क्लास में पढ़ता था... उस क्लास के कोर्स की किताब में उसी की गज़ल शामिल थी। हज़ारों बेशकीमती अशार के मालिक... नौजवानों को मुहब्बत की ज़बान समझाने वाले... उर्दू अदब में आसान ज़बान में सबसे बड़े शेर कहने वाले... ये है कहानी डॉ बशीर बद्र की....

इसी कहानी को YOUTUBE पर देखें 



कभी सात रंगों का फूल हूं कभी धूप हूं कभी धूल हूं
   मैं तमाम कपड़े बदल चुका तेरे मौसमों की बरात में

बशीर बद्र के शेर इंसानी ज़िंदगी के कुछ खास लम्हों को खूबसूरती से बयान करते हैं कि लगता है कि इस सिचुएशन पर इससे बेहतर शेर कहा ही नही गया... अब देखिए... बिछड़ने पर... क्या इससे खूबसूरत, और इस कदर आसान शेर आपने पहले कभी सुना... शेर है कि

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ये एक पेड़ है... आ इस से मिल के रो लें हम
यहां से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं

या शादीशुदा ज़िंदगी में शौहर-बीवी के नाज़ुक लम्हें को देखिए कैसे बयान किया है.. कि शौहर काम पर जा रहा है.. और बीवी दरवाज़ा बंद करते हुए उसे देख रही है... वो पलट कर देखता है और तब शेर होता है –मैं घर से जब चला तो किवाड़ों की ओट में – नर्गिस के फूल चांद की बाहों मे छुप गए

और किसी की बेवफ़ाई पर क्या पिछले सौ सालों में इससे बेहतर शेर कहा गया... कि

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी उसकी
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता...

बशीर बद्र की कहानी शुरु होती है आज़ादी से पहले के हिंदुस्तान... और उस वक्त के फ़ैज़ाबाद से... वहां एक साहब थे सैय्यद मुहम्मद नज़ीर... पुलिस डिपार्टमेंट में एसिस्टेंट अकाउंटेंट थे... उनकी पत्नी थीं आलिया... साल 1935 में नज़ीर साहब के घर बेटा पैदा हुआ जिसका नाम रखा गया बशीर... वक्त गुज़रा... बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ... शुरुआती पढ़ाई-लिखाई हुई... बाद में नज़ीर साहब का ट्रांसफर हुआ तो वो इटावा आ गए, फैमिली के साथ... लिहाज़ा बशीर साहब जब दसवीं का इम्तिहान दिया तो वो यूपी के इटावा में थे... वो पढ़ाई-लिखाई में बहुत अच्छे थे… आगे भी पढ़ना चाहते थे लेकिन तभी उनकी ज़िंदगी की पहला मुश्किल वक्त आया... जब उनके वालिद साहब का इंतकाल हो गया... नियम ये था कि उनके वालिद की नौकरी उन्हें मिल जाएगी… वो चाहते थे और पढ़ना लेकिन घर संभालना था… जिम्मेदारियाँ कंधे पर आ गई थीं… तो उन्होंने 85 रुपये की नौकरी कबूल कर ली… उस ज़माने में दसवीं पास होना बड़ी बात थी और इस पर नौकरियां मिल जाती थीं। तसव्वुर कीजिए उर्दू शायरी सा सबसे करिश्माई शायर... पुलिस की खाकी वर्दी में थाने जा रहा है, हाथ में डंडा लिया हुआ है। देखिए ज़िंदगी जो है बड़ी खड़ूस टीचर की तरह होती है… ये आप से वही किताब मांगती है जिसका काम नहीं कर के लाए होते... बशीर बद्र कभी पुलिस की नौकरी नहीं करना चाहते थे लेकिन... हालात ऐसे थे कि उन्हें बनना पड़ा… ज़िंदगी आपसे वो करवा लेने की ताकत रखती है.... जो आपके ज़हन में कतरा बराबर ख्याल नहीं होता... बहरहाल... बशीर साहब नौकरी करने लगे, शादी हो गई… तीन बच्चे हुए… वो नौकरी कर तो रहे थे लेकिन मन में आगे पढ़ने की चाह थी… 15 साल गुज़र गए… इस दौरान वो शेर कह रहे थे...  और उन्हीं दिनों का वो नोमाइंदा शेर है....

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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए...

ये शेर बशीर बद्र की मकबूलियत से पहले मकबूल हुआ... जब लोग उन्हें नहीं जानते थे... तब भी लोग ये शेर जानते थे... और ये बात दो मौकों पर साबित हुई… पहला तो वो कि उस ज़माने में एक फिल्मी मैगज़ीन आती थी – स्टार एंड स्टाइल… उस मैगज़ीन के एक पन्ने पर... मीना कुमारी की तस्वीर छपी... उस समय मीना कुमारी बहुत स्टार थीं... तो तस्वीर में वो एक कागज़ पर कलम से एक शेर लिखते हुए पोज़ कर रही हैं... और वो शेर है एक नामालूम शायर का.... वही उजाले अपनी यादों के....

हालाकि वो पहली बार नहीं छपे थे... इससे पहले भी जब वो सांतवी क्लास में थे तो निगारउस वक्त की एक बड़ी मैगज़ीन थी उसमें उनकी गज़ल छप चुकी थी... लेकिन तरह की मकबूलिय ये बड़ी बात थी। अपने इसी शेर उजाले अपनी यादों के... इससे उनकी दूसरी मुलाकात सीतापुर में हुई...

असल में उन दिनों ये सीतापुर में पोस्टेड थे... तो हुआ यूं कि वहां एक मवेशियों का मेला लगता है… आज भी लगता है… नोमाइश वगैरह भी होती है… तो एक रोज़ बशीर साहब मेले में पहुंचे तो घूमते-घूमते अचानक उनकी नज़र पड़ी... कोने में बैठे एक सुरमा बेचने वाले पर... अच्छा उस सुरमे वाले ने अपनी जो छोटी सी दुकान थी... यानि ऐसे ही.. स्टूल पर बैठा था और ज़मीन पर चादर बिछाकर उस पर सुरमई की शीशियाँ रखे थे… उसने अपने ठीक पीछे एक बैनर बांध रखा था और उस पर यही शेर लिखा था… उजाले अपनी यादों के... अच्छा... बाई दा वे... ये किस्सा खुद बशीर बद्र का सुनाया हुआ है...

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तो ख़ैर, जब उन्होंने देखा तो उन्हें तफरीह सूझी... बशीर साहब तफरीह बहुत पसंद करते थे... अभी आगे बताऊंगा उनके किस्से… तो ये साहब पहुंचे उसी के सुरमे वाले के पास… बोले आदाब...

वो आदमी जिसने ख़िज़ाब लगा रखा था दाढ़ी लाल थी... उसने जवाब में आदाब कहा.. ये बोले हुज़ूर आप सुरमा बेच रहे हैं.... ये तो ठीक है... लेकिन ये बताइये कि आपने पीछे.. ये इतना ख़राब सा शेर क्यों लगा रखा हैउसने इन्हें ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, बेटा, तुम्हारी नज़र साफ नहीं है, तुम्हें सुरमे की ज़रूरत है... लगाओ और फिर पढ़ो.. जाओ यहां सेये मुस्कुराकर चले आए... और यही वो वक्त था जब उन्होंने तय किया बस अब ये पुलिस की नौकरी और नहीं करनी... अब वो आगे पढ़ेंगे...

तेरे
हाथ से मेरे होंठ तक - वही इंतज़ार की प्यास है
मेरी नाम की जो शराब थी - कहीं रास्ते में छलक गयी


बशीर साहब ने पुलिस की नौकरी छोड़ी और दोबारा पढ़ाई शुरु कर दी... अलीगढ़ यूनिवर्सिटी आए... बीए किया... एमए किया.. हालांकि उनका वो शेर उनसे पहले यूनिवर्सिटी आ गया था। और फिर धीरे-धीरे मुशायरे पढ़ते हुए.. वो मशहूर हुए... इसमें सबसे ज़रूरी मुशायरा वो है जो आल इंडिया रेडियो ने करवाया था... जहां ये गलती से रेडियो के दफ्तर पहुंच गए... जो हज़रतगंज मे है... लेकिन वो हो रहा था रवींद्रालय ऑडिटोरियम में... जो लखनऊ में चारबाग रेलवे स्टेशन के सामने हैं। उस मुशायरे में इन्हें पहचान मिली... और फिर वहां से उन्होंने पलट कर नहीं देखा... वो शेर है ना...

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

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बशीर साहब अब बाकायदा मुशायरों को चुनने लगे थे कि किस वाले में जा पाएंगे और किसमें क्योंकि इतने मुशायरों में बुलाया जाने लगा था... एक किस्सा उन्होंने बड़ा मशहूर है कि एक बार बशीर बद्र अपने दो साथी शायरों के साथ.. यानि ये तीन लोग एक मुशायरे से लौट रहे थे... रेलवे स्टेशन पहुंचे... टिकट इंतज़ारी का था... वेटिंग था... कंफर्म हुआ नहीं... तो तय ये हुआ कि भई टीटी को पकड़ा जाए और उसे कुछ ले देकर रिक्वेस्ट की जाए कि सीट दिला दे... बशीर बद्र बोले, "फायदा कुछ नहीं है, जिस कदर भीड़ है टीटी मना कर देगा" पहले शायर बोले, "अरे ऐसे कैसे मना कर देगा" बात तो कर के देखते हैं... आने दो मैं बात करता हूं" इत्तिफाक से टीटी उधर से आता दिखाई दिया... तो शायर साहब बोले, "अरे भाई साहब... वो हम लोग रात के बहुत जगे हुए हैं... एक सीट का इंतज़ाम अगर आप कर दें तो... बड़ी इनायत होगी" औऱ ये कहते हुए उन्होंने टीटी के हाथ में पांच सौ का नोट पकड़ा दिया.... टीटी नोट वापस करते हुए बोला, "अरे सर सीट है ही नहीं, होती तो मैं कर देता... भीड़ देख रहे हैं" अब दूसरे शायर जो थे, वो और तेज़ कदमों से बढ़े और जाते हुए टीटी को फिर पकड़ा....  अरे सुनिये तो... ये ज़रा.. बात सुनिए… भाई कोशिश करेंगे तो क्या नहीं हो सकता मतलब मैं कह रहा था कि एक सीट अगर..." कहते हुए उन्होंने पांच-पांच सौ के दो नोट टीटी के हाथ में रखे... टीटी ने चौंक कर देखा... तो थोड़ा बुरा लगा उसे... हज़ार रुपय लौटाते हुए बोला, "अरे भई, सीट है नहीं तो कहां से दे दूं... आप लोग समझ ही नहीं रहे… ये पकड़िए… छोड़ि" कहकर वो आगे जाने लगा बशीर साहब को पता नहीं क्या सूझा... अबकी वो टीटी के पीछे भागे... और जाकर उसे रोका... अब ये दोनों शायर हैरान की क्या बशीर साहब पंद्रह सौ देंगे... अव्वल तो उस वक्त के हिसाब से ये बड़ी रकम है... और जो हालात थे उस वक्त ये भी लगता था कि पंद्रह सौ होंगे उनके पास... बशीर साहब ने दौड़ते हुए अपना बटुआ निकाला... और नोट निकालकर टीटी के पास पहुंचे... "भाई साहब एक मिनट सुनि तो ये आप रख लीजिए" कहते हुए उन्होंने एक नोट टीटी के हाथ में रखा टीटी ने हाथ देखा... तो उसमें बीस रुपये का नोट था... उसे गुस्सा आ गया बोला "आपको पता है आपसे साथ के दो लोगों को मैंने पांच सौ और हज़ार में भी सीट नहीं दी और आप बीस रुपये थमा रहें हैं" बशीर बद्र मुस्कुरा कर बोले, "ये बीस रुपए सीट के लिए नहीं दे रहा, ये बस इसलिए है कि आप मना कर सकें... भई दोनों दोस्तों ने कोशिश की... मैं करता तो ये लोग सुनाते मुझे... पैसे यूं भी आपको लौटाने ही थेतो बीस रुपये भी वही काम करेंगे, जो हज़ार रुपये करेंगे... है कि नहीं"

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बशीर बद्र की शायरी बोझिल फिलॉसफी से आज़ाद थी. वो रोज़मर्रा के उन तजुर्बों पर शेर कहते थे जिन्हें ठहरकर कभी हमने महसूस नहीं किया – जैसे ये शेर देखिए कि

आंखों में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा - कश्ती के मुसाफ़िर ने समंदर नहीं देखा
महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें - जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा


बहुत ही मज़ेदार जवाब देते थे और फौरन.. बिना देरी के.. जैसे ये किस्सा उनका बड़ा मशहूर है कि एक मुशायरा हो रहा था दुबई में... रजिंदर सिंह बेदी निज़ामत कर रहे थे... यानि वो जो एक शख्स होता है जो शायर के बारे में थोड़ा बताकर उसे मंच पर बुलाता है... तो साहब मुशायरों में आखिरी में कौन पढ़ेगा इस पर बड़ी नज़र रखी जाती है.. क्योंकि आखिरी में वो पढ़ता है जिसे उस्ताद माना जाता है... जो जितना बड़ा शायर वो उतनी आखिर में पढ़ता है... तो अब हुआ यूं कि दुबई वाले मुशायरे में राजिंदर सिंह बेदी ने देखा कि आखिर में दो ही शायर बचे हैं एक तो ये – बशीर साहब और दूसरे एक और बड़े शायर... अब वो बेचारे घबराएं कि किसको बुलाएं... जिसको बुलाएंगे वो नाराज़ हो जाएगा... कि मुझे छोटा समझ लिया... तो बेचारे गोलमोल बात करते हुए बात संभालने लगे कि.. भई देखिए, ऐसा है कि अब जो दो लोग बचे हैं ये दोनों मेरी दो आंखों की तरह हैं... दोनों ही मुझे मेरी आंखों की तरह बारबरी से प्यारे हैं... अब किसे पहले बुलाऊं और किसे बाद में फैसला नहीं कर पा रहा- बशीर बद्र समझ गए.. अब देखिए शरीफ आदमी कौन होता है… बशीर साहब खुद अपनी जगह से उठे और माइक की तरफ बढ़ गए.. लेकिन जाते-जाते एक मज़ेदार फिक्रा उछाला बोले.. भई दोनों आपकी दो आंखो की तरह है... पर अफसोस कि आप की एक आंख में रौशनी कुछ कम हैठहाका गूंज गया... ये लहजा था उनका।

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लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुशबू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तेरी आवाज़ चूम लूं

लेकिन इस कहानी की एक ट्रैजेडी है.... असल में पिछले कुछ 12-15 सालों से बशीर साहब अक्यूट डिमेंशिया में थे... उनकी यादों पर एक धुंध बिछ गई थी। वो घर पर ही थे और उनकी याददाश्त एक तरह से खो चुकी थी… जिस शायर के अशआर लाखों लोगों को याद थे, वो शायर अपने शेर, अपनी यादों से दूर हो गया। लेकिन हां, एक शेर था जिसका पहला मिसरा जब उनका बेटा तय्यब बद्र उनके सामने बोलता था... उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो… तो वो लड़खड़ाते लहजे में कहते थे – न जाने किस गली में… ज़िंदगी की शाम हो जाए...

सितारों को आंखों में महफूज़ रखना .. बहुत दूर तक रात ही रात होगी
मुसाफिर है हम भी मुसाफिर हो तुम भी... किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी

उजालों का ये आखिरी मुसाफ़िर ... 28 मई 2026 को इस दुनिया को छोड़कर चला गया।

आज जब हम उन्हें विदा कर रहे हैं तो ऐसा लगता है जैसे उर्दू शायरी के आँगन का एक पुराना दरख़्त गिर पड़ा हो। हालांकि उसकी जड़ें अब भी ज़मीन को जकड़े हैं और उसकी छाँव हमारे सर पर शफकत की तरह मौजूद है.... अलविदा बशीर बद्र

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