बंटवारे के तुरंत बाद जब पाकिस्तान ने कबालियों के भेस में जम्मू-कश्मीर पर हमला बोला तो उसकी कई कहानियां सामने निकलकर आईं. अक्टूबर 1947 का वो दौर जब देश आजादी के जश्न से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था और जम्मू-कश्मीर की सीमाएं सुलगने लगी थीं.
गिलगित से लेकर लखनपुर तक फैली करीब 550 किलोमीटर से लंबी पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए रियासत के पास कुल जमा 9,000 जवान थे. सैनिक इतनी दूरी में टुकड़ियों के रूप में बिखरे हुए थे. इन्हीं बिखरी सीमाओं पर ओवेन पट्टन नाम की एक चौकी थी, जहां 2 जम्मू-कश्मीर इन्फैंट्री के सूबेदार धन बहादुर सिंह की अगुआई में महज एक प्लाटून तैनात थी.
अक्टूबर के शुरुआती दिनों में जब पाकिस्तान समर्थित कबायलियों और सैनिकों ने हमला बोला, तो इस छोटी सी प्लाटून को चारों तरफ से घेर लिया गया. वापसी की कोई योजना अमल में आती, उससे पहले ही हमलावरों ने इस चौकी को अपने कब्जे में ले लिया. ओवेन पट्टन का गिरना महज एक चौकी का जाना नहीं था, बल्कि यह इस बात का पहला संकेत था कि दुश्मन केवल लूटपाट करने नहीं, बल्कि कश्मीर की जमीन पर कब्जा जमाने आया है.
कर्नल अजय कुमार रैना (Retd) की किताब ‘1947: The Battle of Badgam and Shalateng’ इसी तरह की अनदेखी, लेकिन ऐतिहासिक रूप से बेहद निर्णायक सैन्य लड़ाइयों की दास्तान बयां करती है. इस किताब को Aleph Book Company ने छापा है, जिसकी कीमत 499 रुपये है.
कमाल की बात ये है कि इस किताब में उस दौर में एक साथ चल रही बहुत सारी राजनीतिक और गैर-राजनीतिक चीज़ों पर ध्यान नहीं दिया है, बल्कि अपने मुद्दे पर अडिग रही है. यानी मामला मेरे हिसाब से टू द पॉइंट रहा है.
शुरुआती पन्ने पलटने के कुछ वक्त में ही ये किताब 1947 के उस दौर में ले जाती है जब देश के विभाजन के तुरंत बाद श्रीनगर को बचाने के लिए भारतीय सेना ने एक ऐतिहासिक एयरलिफ्ट अभियान शुरू किया था. कर्नल रैना ने इस किताब में खास तौर पर बड़गाम और शालतेंग की उन दो लड़ाइयों पर ध्यान केंद्रित किया है, जिन्होंने कश्मीर घाटी के भविष्य का रुख बदल दिया.
ये किताब किस्सानुमा नहीं है, लेकिन फैक्ट आधारित है. इसकी भाषा भी वैसी ही है, इसलिए मुझे लगता है कि जो इस मामले को डिटेल में जानना चाहते हैं उनके लिए बेहतर विकल्प है. इसका कारण भी है, क्यूंकि किताब को लिखने वाले कर्नल अजय कुमार रैना सैन्य इतिहासकार हैं और उनकी यह छाप पूरी किताब में साफ दिखाई देती है.
उन्होंने किसी काल्पनिक ड्रामे के बजाय आर्काइवल डाक्यूमेंट्स, सरकारी अभिलेखों और युद्ध में शामिल रहे लोगों के प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों को आधार बनाकर यह ताना-बाना बुना है. लिखने का तरीका भी तथ्यपरक है. वे केवल सैनिकों की बहादुरी का बखान नहीं करते, बल्कि उस समय की रणनीतिक गलतियों, संसाधनों की कमी और राजनीतिक अनिश्चितताओं को भी बेबाकी से रेखांकित करते हैं.
इस किताब को पढ़ने का एक कमाल और ज़रूरी कारण ये भी है कि इसके जरिए आप ऐसे कई गुमनाम हीरो को जान पाएंगे, जिनका ज़िक्र शायद ही आपने कभी सुना हो. फिर चाहे वो सूबेदार धन बहादुर सिंह की कहानी हो या फिर मेजर सोमनाथ शर्मा की शहादत हो.
कुल मिलाकर, ‘1947: The Battle of Badgam and Shalateng’ मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री में रुचि रखने वालों के लिए एक जरूरी और संग्रहणीय किताब है. यह हमें याद दिलाती है कि आज का भारत जिन सीमाओं की रक्षा कर रहा है, उनकी नींव 1947 के उन्हीं विषम परिस्थितियों में रखे गए अभूतपूर्व साहस से बनी थी.
किताब का नाम: 1947: The Battle of Badgam and Shalateng
प्रकाशक का नाम: Aleph Book Company
लेखक का नाम: कर्नल अजय रैना, शिव कुमार वर्मा के साथ
दाम: 499 रुपये