गुलामी की बेड़ियों में बंधी, भारत मां की आजादी का ख्वाब संजोने वाले क्रांतिकारियों के वो नारे, जिन्होंने अंग्रेज अधिकारियों को
देश छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया. आगे पढ़िए और देखिए ऐसे ही क्रांतिकारियों के लिखे और कहे हुए यादगार नारे.
भगत सिंह: जिंदगी तो अपने दम पर जी जाती है. दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं.
अशफाकुल्ला खान: फूट डालकर शासन करने की चाल का हम पर कोई असर नहीं होगा और हिंदुस्तान आजाद होकर रहेगा.
चंद्रशेखर आजाद:
तुम्हारा नाम क्या है?
मेरा नाम आजाद है
तुम्हारे पिता का क्या नाम है?
मेरे पिता का नाम
स्वाधीनता है.
तुम्हारा घर कहां है?
मेरा घर जेल खाना है.
महात्मा गांधी: मेरा धर्म सत्य और अंहिसा पर आधारित है, सत्य मेरा भगवान है और अंहिसा, उसे पाने का साधन.
लाला हरदयाल: पगड़ी अपनी संभालिए मीर. बस्ती नहीं, ये दिल्ली है.
लाला लाजपत राय: मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक एक कील का काम करेगी.
मदन लाल ढींगरा: मैं देशभक्त हूं, हत्यारा नहीं. अपनी मातृभूमि को विदेशी सत्ता से मुक्त कराने के लिए मैंने फिरंगी कर्जन
वायली को अपनी गोली का निशाना बनाया है.
राम प्रसाद बिस्मिल: सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है.
सरदार वल्लभ भाई पटेल: यह हर एक नागिरक की जिम्मेदारी है कि वह यह अनुभव करे कि उसका देश स्वतंत्र है और उसकी
स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्तव्य है.
सुभाष चंद्र बोस: तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा.