आजकल आपने कई बार देखा होगा कि घर में दो फ्रेंड्स या भाई-बहन एक ही कमरे में बैठे हैं, लेकिन आपस में बात करने के बजाय फोन पर मैसेज कर रहे हैं. कोई इंस्टाग्राम पर रील भेज रहा है, तो कोई व्हाट्सऐप पर अपनी बात कह रहा है. पहली नजर में ये आदत अजीब लग सकती है, लेकिन ये जेन जी का न्यू नॉर्मल हाँ और उनकी डेली लाइफ का हिस्सा बन चुका है. आखिर पास बैठे होने के बावजूद जेन जी आमने-सामने बात करने के बजाय फोन का सहारा क्यों लेती है?
मैसेज पर बात करना लगता है आसान
जेन जी बचपन से ही इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच बड़ी हुई है. उनके लिए फोन सिर्फ दूसरों से जुड़ने का जरिया नहीं, बल्कि डेली लाइफ का हिस्सा है. कई बार उन्हें आमने-सामने बैठकर बात करने के बजाय मैसेज करना ज्यादा आसान लगता है. इससे वे बिना अपनी जगह से उठे अपनी बात कह सकती हैं. इसका एक कारण आलस भी हो सकता है.
हर बात बोलकर बताना जरूरी नहीं
कई बार किसी फ्रेंड को कुछ फनी ये मस्त दिखाना हो, किसी की नकल उतारनी हो या कोई पर्सनल बात कहनी हो, तो मैसेज करना ज्यादा आसान लगता है. एक रील, मीम या छोटा सा मैसेज भी वो बात कह देता है, जिसे बोलकर समझाने में ज्यादा टाइम लग सकता है. इससे बातचीत भी चलती रहती है और हर बार बोलने की जरूरत भी नहीं पड़ती.
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आमने-सामने बात करने में झिझक
कुछ लोगों को अपनी फीलिंग्स सामने बैठकर बताने में झिझक होती है. ऐसे में मैसेज करना आसान लगता है, क्योंकि उन्हें तुरंत जवाब देने का प्रेशर नहीं होता. वे सोचकर अपनी बात लिख सकते हैं. हालांकि, ये आदत हर जेन जी में हो, ऐसा जरूरी नहीं है.
क्या इससे रिश्तों पर असर पड़ता है?
फोन के जरिए जुड़े रहना गलत नहीं है, लेकिन हर वक्त स्क्रीन पर बातचीत करने से आमने-सामने बात करने के मौके कम हो सकते हैं. कई बार सामने बैठा व्यक्ति भी अनदेखा महसूस कर सकता है. इसलिए जरूरी है कि फोन और आमने-सामने की बातचीत के बीच बैलेंस बना रहे. आखिर मैसेज पर हंसी-मजाक अपनी जगह है, लेकिन साथ बैठकर खुलकर बात करने का एक्सपीरियंस भी अलग होता है.