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सत्ता परिवर्तन से पहले सिद्धारमैया की चाल? जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट स्वीकार कर दिया ये संदेश

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पिछड़ा वर्ग आयोग की जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट स्वीकार कर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है. माना जा रहा है कि इस्तीफे से पहले उठाया गया यह कदम उनकी 'अहिंदा' राजनीति और सामाजिक न्याय की विरासत को मजबूत करने की कोशिश है, जबकि अगली सरकार के सामने एक मुश्किल राजनीतिक चुनौती खड़ी हो जाएगी.

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'अहिंदा' राजनीति को धार देने की कोशिश, नई सरकार के लिए छोड़ा बड़ा राजनीतिक सवाल. (File Photo: ITG)
'अहिंदा' राजनीति को धार देने की कोशिश, नई सरकार के लिए छोड़ा बड़ा राजनीतिक सवाल. (File Photo: ITG)

कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं के बीच मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने एक बड़ा दांव चला है. उन्होंने अपने संभावित इस्तीफे से ठीक पहले पिछड़ा वर्ग आयोग की जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट स्वीकार कर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. इस कदम को सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.

राज्य में बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच मुख्यमंत्री सिद्धारमैया द्वारा प्रक्रिया तेज किए जाने के बाद पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष मधुसूदन नायक ने रिपोर्ट सौंपी. माना जा रहा है कि यह फैसला सिद्धारमैया की राजनीतिक विरासत को सुरक्षित करने और अगली सरकार को एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील स्थिति में डालने की रणनीति का हिस्सा है.

सिद्धारमैया अपनी राजनीतिक विरासत को मजबूत करना चाहते हैं. जाति सर्वेक्षण लंबे समय से उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं का अहम हिस्सा रहा है. अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों का प्रतिनिधित्व करने वाले 'अहिंदा' नेता के तौर पर उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के सशक्तिकरण के इर्द-गिर्द तैयार की है.

माना जा रहा है कि पद छोड़ने से पहले रिपोर्ट स्वीकार करके सिद्धारमैया यह संदेश देना चाहते हैं कि अपने कार्यकाल के आखिरी दिन तक भी वे उन समुदायों के साथ खड़े रहे जो उनकी 'अहिंदा' राजनीति का मूल आधार हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सिद्धारमैया एक ऐसी विरासत छोड़ना चाहते हैं जो मसीहा के तौर पर उनकी छवि को मजबूत करे.

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रिपोर्ट स्वीकार करने के लिए चुना गया समय उन्हें राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे का श्रेय लेने का मौका देता है, जबकि इसके क्रियान्वयन का बोझ उनके उत्तराधिकारी पर आ जाता है. कर्नाटक में जाति सर्वेक्षण का सफर शुरू से ही विवादों में रहा है. इससे पहले जयप्रकाश हेगड़े द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट का भी जोरदार विरोध हुआ था.

खास तौर पर प्रभावशाली वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों की ओर से इस रिपोर्ट पर सवाल उठाए गए थे. इन समुदायों के नेताओं ने आरोप लगाया था कि सर्वेक्षण पुराना और अवैज्ञानिक है. इसमें विभिन्न समुदायों की जनसांख्यिकीय ताकत को गलत तरीके से पेश किया गया है. विपक्ष के नेता आर. अशोक ने भी सिद्धारमैया पर आरोप लगाया था.

उन्होंने कहा था कि वो अपनी सरकार की आंतरिक विफलताओं को छिपाने और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के साथ सत्ता साझा करने से बचने के लिए जाति जनगणना को राजनीतिक हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. विरोध बढ़ने के बाद सरकार ने मधुसूदन नायक आयोग का गठन किया और नया सर्वे कराने का फैसला लिया. 

आयोग ने सरकार द्वारा तय समय सीमा के भीतर रिपोर्ट तैयार कर सौंपी. हालांकि रिपोर्ट को स्वीकार कर लेना अपने आप में नीति नहीं बन जाता. इसे लागू करने के लिए कैबिनेट की मंजूरी जरूरी होगी और मंत्रिपरिषद को इस पर अंतिम फैसला लेना होगा. यहीं से सिद्धारमैया की इस रणनीति का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है.

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यदि नेतृत्व परिवर्तन होता है. डी.के. शिवकुमार मुख्यमंत्री बनते हैं, तो नई सरकार को तय करना होगा कि वह रिपोर्ट को स्वीकार करेगी, उसमें बदलाव करेगी या फिर उसे खारिज करेगी. यह फैसला आसान नहीं माना जा रहा क्योंकि कई लिंगायत और वोक्कालिगा नेता पहले ही इस सर्वेक्षण पर अपनी आपत्तियां जता चुके हैं.

रिपोर्ट को मंजूरी देने पर प्रभावशाली समुदायों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि इसमें देरी करने 'अहिंदा' समर्थकों की आलोचना झेलनी पड़ सकती है. यानी दोनों ही स्थितियों में अगली सरकार एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील स्थिति में फंस सकती है. रिपोर्ट स्वीकार करके सिद्धारमैया ने खुद को पिछड़े वर्गों के साथ जोड़ लिया है.

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