कर्नाटक में बड़ा सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है. सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. सियासी गलियारों में अब डीके शिवकुमार का नाम सीएम पद के लिए लगभग तय माना जा रहा है. कांग्रेस ने विधायक दल की बैठक बुलाई है, जिसमें दल के नेता के नाम का ऐलान किया जाएगा. अगर शिवकुमार के नाम पर मुहर लगती है तो यह कोई अचानक हुआ चमत्कार नहीं होगा.
दरअसल, कर्नाटक की सियासत में शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनना एक दशक लंबे कड़े राजनीतिक संघर्ष, रणनीतिक धैर्य और आंतरिक गुटबाजी को मात देने की एक लंबी कहानी होगी. कारण, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच का राजनीतिक मतभेद और वर्चस्व की जंग करीब एक दशक पुरानी है, जिसने कर्नाटक कांग्रेस की दशा और दिशा दोनों को तय किया है.
साल 2016 में जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अनौपचारिक तौर पर डीके शिवकुमार को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) अध्यक्ष बनाने का संकेत दिया था, उस समय पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा तेज थी. सूत्रों के मुताबिक शिवकुमार ने सोनिया गांधी से कहा था कि वह परिवार के साथ अमेरिका जा रहे हैं और एक महीने बाद लौटकर पद संभालेंगे. लेकिन जब वह वापस लौटे और दिल्ली पहुंचे, तब तक सिद्धारमैया ने पार्टी के भीतर उनके खिलाफ माहौल तैयार कर दिया था.
बताया जाता है कि कांग्रेस हाईकमान ने उस समय कर्नाटक के 16 मंत्रियों से राय ली थी. कैबिनेट मंत्री रोशन बेग को छोड़कर किसी ने खुलकर शिवकुमार का समर्थन नहीं किया. आखिरकार नेतृत्व परिवर्तन टल गया और जी परमेश्वर ही KPCC अध्यक्ष बने रहे. बाद में एक क्षेत्रीय टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में डीके शिवकुमार ने उस राजनीतिक झटके को याद करते हुए कहा था, 'मैं शतरंज खेलना चाहता था, लेकिन सिद्धारमैया ने फुटबॉल खेल दिया.' इस बयान ने दोनों नेताओं के बीच की अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया था.
हालांकि शिवकुमार को तब भी एहसास था कि 2018 में उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावना कम है. उन्होंने अपने करीबी लोगों से कहा था कि उनका असली मौका 2023 में आएगा. यही उनकी लंबी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था.
2013 से ही था सिद्धारमैया से मनमुटाव
सिद्धारमैया और शिवकुमार के रिश्तों में तनाव 2013 में ही दिखने लगा था. जब सिद्धारमैया पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब वह सरकार की साफ-सुथरी छवि बनाए रखना चाहते थे और कथित तौर पर अवैध खनन और जमीन मामलों को लेकर लगे आरोपों के कारण शिवकुमार को कैबिनेट में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन शिवकुमार ने हाईकमान पर दबाव बनाया और आखिरकार जनवरी 2014 में उन्हें मंत्री पद मिल गया.
2019 में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव और उपचुनावों में बड़ा झटका लगा. इसी दौरान डीके शिवकुमार मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार होकर दिल्ली की तिहाड़ जेल पहुंचे. उस समय सोनिया गांधी का तिहाड़ जेल जाकर उनसे मुलाकात करना कांग्रेस की ओर से बड़ा राजनीतिक संदेश माना गया. पार्टी सूत्रों के मुताबिक उसी दौरान शिवकुमार को KPCC अध्यक्ष बनाने का भरोसा दिया गया था.
संकटमोचक से 'पावर सेंटर' बनने तक का सफर
अक्टूबर 2019 में जमानत पर बाहर आने के बाद शिवकुमार के प्रति जनता और कार्यकर्ताओं में सहानुभूति की लहर दौड़ गई. 2 जुलाई 2020 को उन्होंने आधिकारिक तौर पर कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला. अगले तीन वर्षों में उन्होंने बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत किया और कांग्रेस को दोबारा सत्ता में लाने के लिए आक्रामक रणनीति अपनाई. उनकी मेहनत का नतीजा 2023 विधानसभा चुनाव में दिखा, जब कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की. इसके बाद हुए उपचुनावों में भी पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया.
हालांकि 2016 में हाशिए पर धकेले गए डीके शिवकुमार आज कर्नाटक कांग्रेस की राजनीति के सबसे मजबूत पावर सेंटर बन चुके हैं. उनकी यह यात्रा राजनीतिक धैर्य, रणनीतिक सोच और लगातार संघर्ष की कहानी मानी जा रही है.