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क्या 1988 की कहानी दोहराएगा US? जब हवा में उड़ा दिया था ईरान का प्लेन, मारे गए थे 290 यात्री

आज अमेरिका और ईरान एक फुल स्केल वॉर में हैं. दोनों देश अब एक दूसरे के नागरिक महत्व की संरचनाओं को टागरगेट बनाने जैसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुके हैं. ये सारे घटनाक्रम 80 के दशक की उस कहानी की याद दिलाती है, जब अमेरिका और ईरान कुछ ऐसे ही हालात में फंसे थे और दोनों के बीच तनातनी का कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ही था. उस वक्त अमेरिका ने ईरान के एक नागरिक विमान को उड़ा दिया था, जिसमें 290 लोगों की मौत हो गई थी.

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टैंकर युद्ध के दौरान 1988 में ईरान के एक यात्री विमान को ही अमेरिका ने उड़ा दिया था (File Photo - Getty)
टैंकर युद्ध के दौरान 1988 में ईरान के एक यात्री विमान को ही अमेरिका ने उड़ा दिया था (File Photo - Getty)

ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है. अब तक सिर्फ मिलिट्री और सामरिक महत्व की सरंचनाओं को निशाना बनाया जा रहा था. अब इस युद्ध में सीधे तौर पर आम लोगों से जुड़े सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर को टारगेट करने की बात की जा रही है. ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि, ट्रंप ने ईरान को  स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने की जो डेडलाइन दी थी, वो खत्म हो रही है. अमेरिका ने ईरान पर जबरदस्त हमले की धमकी दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका फिर से 1988 वाली कहानी दोहराएगा? 

आज जिस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अमेरिका ने ईरान को तबाह करने की धमकी दी है. फिर भी ईरान नहीं रुक रहा है और अमेरिका व यूरोपीय देशों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर रखा है. इसी कड़ी में अमेरिका और इजरायल ने  ईरान के मिलिट्री और तेल-गैस के महत्व वाले ठिकाने को छोड़कर अब सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की धमकी दी है. कुछ दिनों पहले तेहरान को करज से जोड़ने वाले पुल को उड़ा दिया गया था. इसके जवाब में ईरान ने भी ऐसे सिविल संरचनाओं को बर्बाद करने की धमकी दी है. वहीं अमेरिका भी ईरान को पूरी तरह से तबाह करने पर अड़ा हुआ है और उसकी डेडलाइन पूरी हो चुकी है.  

अमेरिका ने उड़ा दिया था ईारन का यात्री विमान
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर आज अमेरिका और ईरान के बीच जो कुछ चल रहा है.  ऐसे ही कुछ 80 के दशक में ही हुआ था. तब अमेरिका ने ईरान के एक नागरिक विमान को निशाना बनाया था. इस हमले में 290 लोगों की जान चली गई थी. चलिए जानते हैं ये घटना क्या थी और ऐसा कदम क्यों उठाया गया था.  

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जब ​​1980 में इराक के सद्दाम हुसैन ने ईरान पर आक्रमण किया, तो अमेरिका ने अपने हुसैन को मदद करने का फैसला किया. क्योंकि, इस्लामिक क्रांति और तेहरान बंधक संकट के बाद से ईरान और अमेरिका एक दूसरे के पक्के दुश्मन बन चुके थे.  

ईरान -इराक युद्ध आठ वर्षों तक चला. इस बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही को बाधित कर  दिया गया. तेल टैंकर दोनों पक्षों के निशाने पर आ गए. 1984 में, इराक ने कुछ ईरानी तेल टैंकरों पर हमला किया और ईरान ने फारस की खाड़ी में नौसैनिक माइंस बिछाकर और हथियाबंद स्पीडबोटों से इराकी, कुवैती और सऊदी टैंकरों पर हमला कर जवाबी कार्रवाई की.

ईरान के बारूदी सुरंग से उड़ गया था अमेरिकी युद्धपोत
 इस "टैंकर युद्ध" के दौरान, अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तटस्थ टैंकरों को सुरक्षित रूप से ले जाने के लिए युद्धपोत भेजे. 14 अप्रैल, 1988 को फारस की खाड़ी में सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात अमेरिका की नौसैनिक फ्रिगेट यूएसएस सैमुअल बी . रॉबर्ट्स एक ईरानी माइंस से टकराकर दो टुकड़े में टूट गया. इस घटना के लिए अमेरिका ने ईरान को दोषी ठहराया था.

अमेरिका ने ऑपरेशन 'प्रेइंग मैंटिस' के साथ जवाबी कार्रवाई की, जो एक बड़ा सैन्य अभियान था जिसके तहत ईरानी नौसेना के अधिकांश जहाजों को डुबो दिया गया. अमेरिकी नौसेना ने ईरान के दो निगरानी प्लेटफार्मों को भी नष्ट कर दिया था. 

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उस दौर में फारस की खाड़ी में अराजकता का माहौल बन गया था. हालात ऐसे हो गए कि 3 जुलाई 1988 को, एक अमेरिकी युद्धपोत से दागी गई गाइडेट मिसाइल क्रूजर ने गलती से ईरान एयर फ्लाइट 655 को मार गिराया - यह तेहरान से बंदर अब्बास होते हुए दुबई जा रहा एक यात्री विमान था. विमान में सवार सभी 290 लोग मारे गए. उस वक्तअमेरिका ने कहा कि एयरबस ए 300 को गलती से लड़ाकू विमान समझ लिया गया था.

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