आपने टीवी पर ऐसा विज्ञापन जरूर देखा होगा, जिसमें नाम तो इलायची, पानी या म्यूजिक का लिया जाता है. लेकिन ब्रांड देखते ही लोगों को किसी दूसरे प्रोडक्ट की याद आ जाती है. यही है 'सरोगेट विज्ञापन'. इसमें किसी ऐसे प्रोडक्ट या सर्विस का सीधे विज्ञापन नहीं किया जाता, जिस पर विज्ञापन की पाबंदी हो. इसके बजाय उसी ब्रांड नाम, लोगो या पहचान से जुड़े किसी दूसरे प्रोडक्ट का प्रचार किया जाता है.
हाल ही में सरोगेट विज्ञापन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है. महाराष्ट्र FDA ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को विमल से जुड़े विज्ञापनों को लेकर नोटिस जारी किया है. अथॉरिटी का आरोप है कि इलायची के नाम पर किए जा रहे प्रमोशन से प्रतिबंधित पान मसाला की ब्रांड पहचान को बढ़ावा मिल सकता है.
आखिर सरोगेट विज्ञापन होता क्या है?
इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए. मान लीजिए किसी कंपनी का ऐसा प्रोडक्ट है, जिसका टीवी या दूसरे माध्यमों पर सीधे विज्ञापन करना प्रतिबंधित है. कंपनी उसी ब्रांड नाम से कोई दूसरा प्रोडक्ट बाजार में पेश करती है, जैसे इलायची, माउथ फ्रेशनर, सोडा या मिनरल वॉटर. फिर विज्ञापन में इसी दूसरे प्रोडक्ट का प्रचार किया जाता है.
लेकिन विज्ञापन का अंदाज, पैकेजिंग, लोगो, रंग और ब्रांड नाम ऐसा होता है कि लोगों को तुरंत उस प्रतिबंधित प्रोडक्ट की याद आ जाती है.
शराब के मामले में भी ऐसा तरीका देखने को मिलता है. किसी शराब ब्रांड के नाम से पानी या सोडा का प्रचार किया जा सकता है. इसी तरह तंबाकू और पान मसाला से जुड़े ब्रांड इलायची या माउथ फ्रेशनर जैसे प्रोडक्ट के नाम से विज्ञापन करते नजर आ सकते हैं.
यानी सामने कुछ और दिख रहा है, लेकिन ब्रांड की पहचान किसी और प्रोडक्ट की याद दिला रही है. इसी वजह से इसे 'सरोगेट' यानी अप्रत्यक्ष विज्ञापन कहा जाता है.
अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ का मामला क्यों आया?
विमल के विज्ञापनों में अजय देवगन लंबे समय से नजर आते रहे हैं. अप्रैल 2024 में टाइगर श्रॉफ भी शाहरुख खान और अजय देवगन के साथ विमल इलायची के विज्ञापन में दिखाई दिए थे. यह विज्ञापन पान मसाला से जुड़े ब्रांड को लेकर होने वाली सरोगेट एडवरटाइजिंग की बहस का हिस्सा बना.
इसके बाद मार्च 2025 में जयपुर के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को विमल से जुड़े कथित भ्रामक विज्ञापन को लेकर नोटिस भी जारी किया था.
अब अगस्त 2026 में महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई से यह मामला फिर सुर्खियों में है. FDA ने आरोप लगाया है कि विमल इलायची के विज्ञापन प्रतिबंधित पान मसाला की ब्रांड पहचान को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दे सकते हैं. इनसे जुड़े प्रचार को लेकर कलाकारों से जवाब मांगा गया है.
कंपनियां ऐसा विज्ञापन क्यों करती हैं?
इसका सबसे बड़ा कारण है ब्रांड को लोगों के दिमाग में बनाए रखना. अगर किसी प्रोडक्ट का सीधे विज्ञापन नहीं किया जा सकता, तो कंपनी उसी नाम से दूसरे प्रोडक्ट का प्रचार कर सकती है. इससे लोगों को ब्रांड का नाम, लोगो और उसकी पहचान बार-बार दिखाई देती रहती है.
उदाहरण के लिए, अगर किसी शराब ब्रांड के नाम और लोगो वाला मिनरल वॉटर टीवी पर दिखता है, तो दर्शक पानी के साथ-साथ उस ब्रांड को शराब से भी जोड़ सकते हैं. यही सरोगेट विज्ञापन की मूल रणनीति मानी जाती है.
क्या सरोगेट विज्ञापन गलत है?
यहीं से पूरी बहस शुरू होती है. आलोचकों का कहना है कि इस तरह के विज्ञापन नियमों में मौजूद कमियों का फायदा उठाकर प्रतिबंधित प्रोडक्ट को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दे सकते हैं.
दूसरी चिंता सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर है. तंबाकू या शराब जैसे उत्पादों की ब्रांडिंग अगर किसी दूसरे प्रोडक्ट के जरिए लगातार लोगों के सामने आती रहे, तो ब्रांड की पहचान मजबूत हो सकती है और उससे जुड़े इस्तेमाल को सामान्य मानने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है.
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एक और समस्या यह है कि आम ग्राहक के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि विज्ञापन वास्तव में किस चीज का प्रचार कर रहा है. सामने इलायची या माउथ फ्रेशनर दिखता है, लेकिन ब्रांड की पहचान किसी दूसरे प्रोडक्ट से जुड़ी हो सकती है.