कई बार आपने ऐसे लोगों को देखा होगा जो किसी भी बातचीत के दौरान अपनी जिंदगी का कोई न कोई किस्सा सुनाने लगते हैं. अगर कोई अपनी नौकरी की बात करे, तो वे अपने ऑफिस का अनुभव बताने लगते हैं. कोई बीमारी का जिक्र करे, तो वे अपने इलाज की कहानी शेयर कर देते हैं. ऐसे लोगों को देखकर कई बार लगता है कि वे हर बात को अपने ऊपर ले आते हैं या खुद को ज्यादा अहमियत देना चाहते हैं.
लेकिन मनोविज्ञान इस आदत को हमेशा निगेटिव नजर से नहीं देखता. दरअसल, साइकोलॉजी के अनुसार कई लोग अपनी सोच और भावनाओं को कहानियों के जरिए बेहतर तरीके से समझते और समझाते हैं. उनके लिए अनुभव सिर्फ यादें नहीं होते, बल्कि सोचने और दूसरों से जुड़ने का तरीका भी होते हैं.
कहानी सुनाकर समझाते हैं बातें
हर इंसान का सोचने का तरीका अलग होता है. कुछ लोग सीधे तथ्य और आंकड़ों में बात करते हैं, जबकि कुछ लोग किसी बात को अपने अनुभव से जोड़कर समझते हैं. ऐसे लोगों के लिए जिंदगी के छोटे-बड़े किस्से एक तरह का उदाहरण होते हैं, जिनकी मदद से वे अपनी बात साफ तरीके से रख पाते हैं. यही वजह है कि बातचीत के दौरान उनके दिमाग में अक्सर कोई पुराना अनुभव या घटना तुरंत याद आ जाती है और वे उसे साझा कर देते हैं.
दूसरों से जुड़ने की कोशिश होती है
अगर कोई दोस्त कहता है कि उसका इंटरव्यू अच्छा नहीं गया, तो सामने वाला व्यक्ति अपना ऐसा ही अनुभव बताकर यह जताना चाहता है कि वह उसकी स्थिति को समझ सकता है. उसका मकसद बातचीत को अपने ऊपर लाना नहीं होता, बल्कि सामने वाले को यह महसूस कराना होता है कि वह अकेला नहीं है. साइकोलॉजी में इसे रिलेशनल कम्युनिकेशन यानी अनुभवों के जरिए जुड़ने का तरीका मानते हैं.
हर बार ध्यान खींचना मकसद नहीं होता
कई लोग मान लेते हैं कि जो व्यक्ति बार-बार अपनी कहानी सुनाता है, वह सिर्फ लोगों का ध्यान चाहता है. लेकिन ऐसा हर बार सही नहीं होता. कई बार यह केवल उसकी संवाद करने की आदत होती है. ऐसे लोग अपने अनुभवों को बातचीत का हिस्सा बनाकर सामने वाले की बात को बेहतर तरीके से समझने की कोशिश करते हैं. उनके लिए कहानी सुनाना बातचीत का स्वाभाविक तरीका होता है.
बचपन और माहौल का भी असर पड़ता है
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि यह आदत बचपन से डेवलप हो सकती है. जिन परिवारों में लोग अपना एक्सपीरियंस शेयर करके बातें करते हैं, वहां बड़े होने वाले बच्चों में भी यही तरीका विकसित हो जाता है. वे अपनी भावनाएं और विचार सीधे बताने की बजाय किसी घटना या कहानी के माध्यम से व्यक्त करना ज्यादा आसान समझते हैं.
कब बन सकती है परेशानी?
हालांकि हर बात पर अपनी कहानी सुनाना हमेशा सही नहीं होता. अगर कोई व्यक्ति सामने वाले की बात पूरी सुने बिना बार-बार अपनी ही कहानी शुरू कर देता है, तो इससे दूसरे लोगों को लग सकता है कि उनकी बात की कोई अहमियत नहीं है. अच्छी बातचीत वही मानी जाती है, जिसमें दोनों लोग एक-दूसरे को बराबर मौका दें. अपनी कहानी शेयर करना गलत नहीं है, लेकिन सामने वाले की बात ध्यान से सुनना भी उतना ही जरूरी है.
क्या कहती हैं साइकोलॉजिस्ट
साइकोलॉजिस्ट नंदिनी अग्रवाल के अनुसार हर बात पर अपनी जिंदगी के किस्से सुनाने वाले लोग जरूरी नहीं कि स्वार्थी हों या खुद को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हों. कई बार वे अपनी सोच को कहानियों के जरिए व्यवस्थित करते हैं और दूसरों से जुड़ने का यही उनका सबसे सहज तरीका होता है. इसलिए अगली बार अगर कोई व्यक्ति बातचीत के बीच अपना कोई एक्सपीरियंस शेयर करे, तो तुरंत यह मान लेने की जरूरत नहीं कि वह सिर्फ अपने बारे में ही बात करना चाहता है. हो सकता है, वह अपनी कहानी के जरिए सिर्फ यह बताना चाहता हो कि मैं तुम्हारी बात समझ सकता हूं, क्योंकि मैंने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया है.