रात के समय रेलवे स्टेशन पर आपने देखा होगा कि प्लेटफॉर्म के पास अंधेरे में कई छोटी-छोटी लाइट जलती रहती हैं. इनमें से कुछ लाइट ट्रैक के बिल्कुल पास या उन जगहों पर दिखाई देती हैं, जहां पटरियां एक-दूसरे से जुड़ती या अलग होती हैं. देखने में ये लाइट बहुत मामूली लगती हैं, लेकिन रेलवे के लिए इनका काम काफी अहम होता है. दरअसल, रेलवे ट्रैक पर ट्रेन को सिर्फ आगे-पीछे चलाना ही नहीं होता. स्टेशन और यार्ड में कई ट्रैक एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. यहां ट्रेन के डिब्बों को अलग किया जाता है, कोच जोड़े जाते हैं और ट्रेनों को एक ट्रैक से दूसरे ट्रैक पर भेजा जाता है. ऐसे में लोको पायलट और रेलवे स्टाफ को ट्रैक की स्थिति और सुरक्षित सीमा का पता होना जरूरी है. इसी काम में अलग-अलग तरह के इंडिकेटर और लाइट मदद करती हैं.
फाउलिंग मार्क क्या होता है?
रेलवे ट्रैक पर एक खास निशान होता है, जिसे फाउलिंग मार्क कहा जाता है. इसे आसान भाषा में आप सुरक्षित सीमा का निशान समझ सकते हैं. जहां दो पटरियां आपस में जुड़ती या एक-दूसरे को क्रॉस करती हैं, वहां एक निश्चित सीमा तय की जाती है. इस सीमा के आगे ट्रेन, इंजन या कोई कोच खड़ा करने से दूसरी लाइन पर चलने वाली ट्रेन के लिए जगह कम हो सकती है. मान लीजिए दो ट्रैक एक जगह पर आकर मिल रहे हैं. अगर एक ट्रेन को मिलने वाले हिस्से के बहुत करीब खड़ा कर दिया जाए, तो दूसरी लाइन से गुजर रही ट्रेन के रास्ते में उसका हिस्सा आ सकता है. इससे टक्कर का खतरा पैदा हो सकता है. इसीलिए फाउलिंग मार्क यह बताने में मदद करता है कि ट्रेन को कहां तक खड़ा किया जा सकता है और किस सीमा के आगे नहीं जाना चाहिए.
फिर रात में लाइट क्यों लगाई जाती है?
दिन में फाउलिंग मार्क या ट्रैक से जुड़े दूसरे निशान आसानी से दिखाई दे सकते हैं. लेकिन रात में स्थिति अलग होती है. स्टेशन के यार्ड में कई जगह अंधेरा रहता है और शंटिंग के दौरान इंजन बहुत धीमी गति से आगे-पीछे किए जाते हैं. ऐसे समय पर दिखाई देने वाला इंडिकेटर रेलवे स्टाफ के लिए काफी उपयोगी होता है. रोशनी से रात में उस जगह या उपकरण की पहचान आसानी से हो सकती है. रेलवे में पॉइंट इंडिकेटर और दूसरे शंटिंग/सिग्नलिंग इंडिकेटर भी होते हैं, जिनकी लाइट अलग-अलग परिस्थितियों में ट्रैक या पॉइंट की स्थिति बताने का काम कर सकती है.
पॉइंट इंडिकेटर का क्या काम है?
रेलवे में जहां एक ट्रैक दो दिशाओं में बंटता है, वहां पॉइंट्स लगाए जाते हैं. इन्हीं की मदद से ट्रेन को एक लाइन से दूसरी लाइन पर भेजा जाता है. उदाहरण के लिए, मान लीजिए एक ट्रेन मेन लाइन पर आ रही है और उसे स्टेशन की दूसरी लाइन पर भेजना है. पॉइंट बदलने पर ट्रेन का रास्ता दूसरी पटरी की तरफ हो जाता है. पॉइंट इंडिकेटर रेलवे स्टाफ और लोको पायलट को यह समझने में मदद कर सकता है कि पॉइंट किस स्थिति में है. रात के समय इसका संकेत लाइट के जरिए साफ दिखाई दे सकता है.
स्टेशन पर शंटिंग के दौरान और भी जरूरी
इन लाइट और इंडिकेटर की जरूरत खास तौर पर शंटिंग के दौरान पड़ती है. शंटिंग का मतलब है ट्रेन के इंजन या डिब्बों को यार्ड या स्टेशन में एक जगह से दूसरी जगह ले जाना. इस दौरान ट्रेन सामान्य रफ्तार से नहीं चल रही होती. इंजन को आगे-पीछे करके कोच जोड़े या अलग किए जा सकते हैं. ऐसे में रेलवे स्टाफ को ट्रैक, पॉइंट और सुरक्षित सीमा की जानकारी लगातार रखनी पड़ती है. यही वजह है कि स्टेशन के यार्ड में आपको दिन के मुकाबले रात में कई छोटी-छोटी लाइट ज्यादा महत्वपूर्ण नजर आ सकती हैं.
क्या ऐसी लाइट सिर्फ स्टेशन पर ही होती है?
इस तरह की हर लाइट केवल स्टेशन की सीमा के अंदर ही होती है. रेलवे में अलग-अलग तरह के सिग्नल, इंडिकेटर और ट्रैक उपकरण स्टेशन, यार्ड और अन्य रेल क्षेत्रों में भी लगाए जा सकते हैं. इनका सही काम उस जगह लगे उपकरण के प्रकार और रेलवे के सिग्नलिंग सिस्टम पर निर्भर करता है. रात में ट्रैक के किनारे जलती यह छोटी सी लाइट पहली नजर में सामान्य दिखाई देती है. लेकिन रेलवे में ट्रेनों की सुरक्षित आवाजाही के लिए ऐसे छोटे-छोटे संकेत बेहद महत्वपूर्ण होते हैं.
खासकर उन जगहों पर जहां कई ट्रैक आपस में जुड़ते हैं, ट्रेन की दिशा बदली जाती है या कोचों की शंटिंग होती है, वहां रेलवे कर्मचारियों को हर सीमा और पॉइंट की स्थिति का पता होना जरूरी है. इसलिए अगली बार रात में स्टेशन पर ट्रैक के पास ऐसी छोटी सी लाइट दिखाई दे, तो उसे सिर्फ एक बल्ब समझकर नजरअंदाज मत कीजिए. यह रेलवे के जटिल सिग्नलिंग और ऑपरेशन सिस्टम का एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है.