कई बार बड़े फल या सब्जी मंडियों में थोक व्यापारी आढ़तियों से डील करने का एक अलग तरीका अपनाते हैं. आढ़त पर थोक माल बेचने वाले पेटियों या क्विंटल में सौदा करते हैं. थोक सौदा करने के लिए अलग- अलग रेट पर डील फिक्स करने के लिए या फिर बारगेनिंग के लिए गमछा या कपड़े के नीचे हाथ मिलाया जाता है. अब सवाल उठता है कि कपड़े के नीचे हाथ मिलाने से कैसे सौदा तय होता है और यह प्रणाली क्या होती है?
फल-सब्जी और अनाज मंडियों में कपड़े या गमछे के नीचे हाथ मिलाकर दाम तय करने का यह तरीका एक पारंपरिक प्रथा है. इसे 'हत्था प्रणाली' या 'कमरपट्टा प्रथा' कहा जाता है. हालांकि, अब इस तरह से डील बहुत कम ही होती है. फिर भी कई मंडियों में यह तरीका अपनाया जाता है.
एक थोक सब्जी व्यापारी गुड्डु राइन ने बताय कि यह तरीका अब काफी पुराना हो गया है. किसी जमाने में बड़े से बड़े डील इसी तरीके से होते थे. व्यापारी और विक्रेता यानी आढ़ती अपने हाथों को एक कपड़े, तौलिए या गमछे के नीचे छिपा लेते हैं ताकि बाहर खड़े किसी अन्य व्यक्ति को उनके हाथों के इशारे दिखाई न दें. इसे हत्था कहा जाता है. इससे पूरी की पूरी गाड़ी सब्जी या फल की डील होती थी.
इसमें उंगलियों से माल के रेट का कोड यानी इशारा दिया जाता है. कपड़े के अंदर दोनों एक-दूसरे की उंगलियों को पकड़कर या दबाकर कीमत का मोल-भाव करते हैं. इसमें हर उंगली और पकड़ का एक खास मतलब होता है. हर जगह उंगलियों और हाथ पकड़ने के तरीके का एक खास नंबर होता है. जैसे एक उंगली पकड़ने का मतलब संख् में या 1, 10, 100, या 1000 रुपये हो सकता है. यह फसल और मंडी के मौजूदा रेट निर्भर करता है.
पूरी हथेली या पांचों उंगलियां दबना या पकड़ना का मतलब 5, 50, 500, या 5000 रुपये हो सकता है. उंगली को आधा दबाना यानी 50 या आधी रेट को दिखाता है. वहीं उंगलियों को बार-बार दबाने से भी रेट तय किए जाते हैं. अगर आढ़ती ने खरीदार की तीन उंगलियां दबाईं, तो इसका मतलब हुआ 300 या तीन हजार या तीन लाख रुपये.
अगर खरीदार को यह मंजूर नहीं है, तो वह कपड़े के अंदर ही उसकी उंगली छोड़कर अपनी तरफ से नया इशारा कर सकता है. जब दोनों एक ही संख्या यानी कीमत पर सहमत हो जाते हैं, तो हाथ दबाकर या हाथ मिलाकर कपड़े के अंदर ही सहमति दे दी जाती है और डील फाइनल हो जाती है.
डील फिक्स करने का यह तरीका पहले क्यों चलन में था? इस सवाल का जवाब भी काफी रोचक है. मंडी में कई खरीदार होते हैं. आढ़ती नहीं चाहता कि एक खरीदार को दिया गया भाव दूसरा खरीदार जान पाए. इससे वह अलग-अलग व्यापारियों से माल की गुणवत्ता के हिसाब से अलग-अलग दाम वसूल पाता है.
वहीं अगर किसी माल का दाम खुलेआम बोल दिया जाए, तो बाजार में अचानक तेजी या मंदी आ सकती है. इस सीक्रेट तरीके से बाजार में अचानक खलबली नहीं मचती. हालांकि यह सदियों पुरानी परंपरा है, लेकिन आधुनिक दौर में सरकार और मंडी समितियों ने इस तरह से डील करने की प्रथा पर रोक लगा दी है. अब मंडियों में खुली नीलामी या इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के माध्यम से थोक डील होती है.