16 अक्टूबर 1964 को चीन ने अपना पहला परमाणु बम टेस्ट किया था. इस परीक्षण के साथ ही चीन उन देशों की सूची में शामिल हो गया, जिनके पास परमाणु हथियार बनाने की क्षमता थी. अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रांस के बाद चीन ऐसा करने वाला दुनिया का पांचवां देश बना. चीन के इस कदम ने न सिर्फ अमेरिका की चिंता बढ़ाई, बल्कि सोवियत संघ के साथ उसके पहले से तनावपूर्ण रिश्तों पर भी असर डाला.
1964 में चीन का परमाणु परीक्षण दुनिया के लिए कोई बिल्कुल अप्रत्याशित घटना नहीं था. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को 1950 के दशक से ही संकेत मिल रहे थे कि चीन परमाणु बम बनाने की दिशा में काम कर रहा है. उस समय ऐसी आशंकाएं भी थीं कि सोवियत संघ के वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ इस काम में चीन की मदद कर सकते हैं.
हालांकि, चीन और सोवियत संघ के बीच बाद के वर्षों में वैचारिक और रणनीतिक मतभेद काफी बढ़ गए थे. दोनों देश कम्युनिस्ट विचारधारा को मानते थे, लेकिन दुनिया की राजनीति और अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर उनकी सोच अलग होने लगी थी.
ऐसे माहौल में चीन का परमाणु बम का सफल परीक्षण उसकी सैन्य ताकत में एक बड़ी बढ़ोतरी था. अब वह उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया था, जिनके पास परमाणु हथियार विकसित करने की क्षमता थी.
अमेरिका को क्यों सताने लगा परमाणु युद्ध का डर?
चीन के परमाणु परीक्षण से अमेरिका की चिंता सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ी कि एक और देश के पास परमाणु हथियार आ गए थे. उस समय चीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में काफी आक्रामक रुख अपना रहा था. वह पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध करता था और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में क्रांतिकारी आंदोलनों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा था.
खासतौर पर एशिया और अफ्रीका के नए स्वतंत्र देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने की चीन की कोशिशें अमेरिका के लिए चिंता का विषय थीं. अमेरिकी सरकार को डर था कि परमाणु ताकत हासिल करने के बाद चीन क्षेत्रीय संघर्षों में और ज्यादा प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है.
चीन का परमाणु परीक्षण ऐसे समय हुआ, जब वियतनाम में तनाव लगातार बढ़ रहा था. इससे करीब दो महीने पहले, अगस्त 1964 में, अमेरिकी कांग्रेस ने टोंकिन की खाड़ी से जुड़ा प्रस्ताव पारित किया था. इस प्रस्ताव ने राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन को वियतनाम में कम्युनिस्ट ताकतों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई बढ़ाने के लिए व्यापक अधिकार दिए थे. ऐसे माहौल में चीन के परमाणु परीक्षण ने दक्षिण-पूर्व एशिया में बड़े सैन्य टकराव और परमाणु संघर्ष की आशंका को और गंभीर बना दिया.
चीन की परमाणु ताकत से सोवियत संघ भी परेशान
चीन के परमाणु परीक्षण से सिर्फ अमेरिका ही नहीं, सोवियत संघ भी चिंतित था. इसकी एक बड़ी वजह दोनों देशों के बीच बढ़ता तनाव था. कम्युनिस्ट विचारधारा के बावजूद चीन और सोवियत संघ के बीच नेतृत्व, रणनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को लेकर गहरे मतभेद पैदा हो चुके थे.
चीन के परमाणु हथियारों से लैस होने का मतलब था कि सोवियत संघ के सामने अब एक नई परमाणु शक्ति मौजूद थी. दोनों देशों के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका भी थी. बाद में चीन की मध्यम दूरी की कुछ शुरुआती मिसाइलें सोवियत संघ की ओर निशाना साधे होने के कारण चर्चा में रहीं.
इस घटनाक्रम ने परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की कोशिशों को भी अहम बना दिया. दुनिया की बड़ी शक्तियों के सामने सवाल था कि आखिर कितने देशों को परमाणु हथियार बनाने की अनुमति या क्षमता मिलनी चाहिए और इस होड़ को कैसे रोका जाए.
परमाणु हथियारों की होड़ पर लगाम लगाने की कोशिश
चीन के परमाणु परीक्षण के बाद दुनिया में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की जरूरत और ज्यादा महसूस की जाने लगी. इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अमेरिका और सोवियत संघ ने 1968 में परमाणु हथियारों के अप्रसार की संधि यानी न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) पर हस्ताक्षर किए. इस संधि का मकसद परमाणु हथियारों के फैलाव को रोकना और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल को बढ़ावा देना था.
हालांकि, परमाणु हथियारों की होड़ खत्म नहीं हुई. चीन के परमाणु शक्ति बनने से शीत युद्ध की राजनीति और जटिल हो गई. अब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चल रही परमाणु प्रतिस्पर्धा में एक नई ताकत भी शामिल हो चुकी थी.