उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के प्रेमनगर थाना क्षेत्र में 16 फरवरी 2024 को हुए एक सड़क हादसे ने एक परिवार की जिंदगी पूरी तरह बदल दी. 18 वर्षीय क्षितिज की मौत अब सिर्फ एक हादसा नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसी कहानी बन चुकी है जो एक मां के संघर्ष और पुलिस जांच व्यवस्था पर उठते सवालों को सामने लाती है.
क्षितिज एक होनहार छात्र था. वह ग्रेजुएशन कर रहा था और साथ ही उत्तर प्रदेश पुलिस में भर्ती की तैयारी भी कर रहा था. 16 फरवरी की रात वह सड़क पार कर रहा था, तभी एक डंपर ने उसे कुचल दिया और मौके से फरार हो गया. इस हादसे में उसकी मौके पर ही मौत हो गई.
इस घटना की सबसे दर्दनाक बात यह थी कि अगले ही दिन यानी 17 फरवरी को उसकी परीक्षा थी. जिस दिन उसे परीक्षा देने जाना था, उसी दिन वह जिंदगी की जंग हार गया. परिवार में उसकी मां ललिता चौधरी और एक बहन हैं, जिनका सहारा अचानक छिन गया.
सड़क हादसे में बेटे की मौत
19 फरवरी को पुलिस ने इस मामले में मुकदमा दर्ज किया, लेकिन शुरुआत में जांच आगे बढ़ती नजर नहीं आई. पीड़ित मां का आरोप है कि 21 फरवरी को जांच अधिकारी ने उनसे बदतमीजी से कहा कि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है. इस बात ने ललिता चौधरी को अंदर तक झकझोर दिया और उन्होंने खुद अपने बेटे के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने का फैसला किया.
27 फरवरी से एक मां का संघर्ष शुरू हुआ. ललिता चौधरी ने खुद ही जांच की जिम्मेदारी उठाई और करीब दो महीनों तक लगातार मेहनत करती रहीं. वह रात-रात भर जागकर घटनास्थल और आसपास के इलाकों में जाती रहीं और सीसीटीवी फुटेज इकट्ठा करती रहीं.
उन्होंने हर छोटी-बड़ी जानकारी को जोड़ते हुए करीब 10 संदिग्ध वाहनों के नंबर चिन्हित किए. उनकी मेहनत इतनी गहरी थी कि उन्होंने एक संदिग्ध वाहन तक पहुंच बनाकर उसकी जानकारी पुलिस को भी दी. यह काम किसी पेशेवर जांच एजेंसी से कम नहीं था, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की.
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब पुलिस ने बिना परिवार को सूचित किए ही सितंबर 2025 में सुराग न मिलने का हवाला देते हुए फाइनल रिपोर्ट लगा दी. इसका मतलब यह हुआ कि आरोपी आज भी पुलिस की पकड़ से बाहर है और केस कागजों में बंद कर दिया गया.
मां को नहीं मिला संतोषजनक जवाब
ललिता चौधरी का आरोप है कि अगर उनके द्वारा जुटाए गए सबूतों पर गंभीरता से काम किया जाता, तो आरोपी तक पहुंचा जा सकता था. पिछले दो सालों से वह लगातार न्याय के लिए संघर्ष कर रही हैं. वह थानों से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक अपनी बात रख चुकी हैं, लेकिन अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला.
हाल ही में देहरादून में हुए दिव्यांशु केस के दौरान किसान नेता राकेश टिकैत की अगुवाई में आयोजित सभा में ललिता चौधरी भी शामिल हुईं. इस दौरान उनकी मध्यस्थता से उनकी मुलाकात देहरादून के एसएसपी परमेन्द्र डोभाल से हुई. एसएसपी परमेन्द्र डोभाल ने फोन पर बातचीत में बताया कि मामला संज्ञान में आने के बाद न्यायालय में पुनः जांच के लिए आवेदन किया गया है. उन्होंने कहा कि अदालत से अनुमति मिलने के बाद इस मामले की दोबारा जांच शुरू की जाएगी.
पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगाकर बंद किया केस
इस आश्वासन के बाद ललिता चौधरी को एक बार फिर उम्मीद जगी है कि उनके बेटे को न्याय मिलेगा और आरोपी सलाखों के पीछे जाएगा. यह मामला सिर्फ एक सड़क हादसे का नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि जब सिस्टम जवाब देने में विफल हो जाता है, तो एक साधारण मां भी असाधारण हिम्मत दिखाकर सच की तलाश में जुट जाती है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार जांच सही दिशा में आगे बढ़ेगी और दोषी तक पहुंचा जाएगा, या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा.