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मोदी के खिलाफ 3 'ट्रायल' सफल, 2019 में BJP के लिए महागठबंधन कितनी बड़ी चुनौती?

बीजेपी के खिलाफ 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष इन्हीं फार्मूले पर महागठबंधन बनाकर चुनावी समर में उतरता है, तो मोदी के लिए सत्ता बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा.

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विपक्षी दल के नेता एकजुट
विपक्षी दल के नेता एकजुट

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के 'विजय रथ' को रोकने के लिए विपक्षी दलों की ओर से अब तक तीन ट्रायल किए गए हैं. विपक्ष को इन तीनों ट्रायल फार्मूले से बीजेपी को मात और विपक्ष को जीत का मंत्र मिला. बीजेपी के खिलाफ 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष इन्हीं फार्मूले पर महागठबंधन बनाकर चुनावी समर में उतरता है, तो मोदी के लिए सत्ता बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा.

बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 'मोदी लहर' पर सवार होकर केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई थी. इसका नतीजा था कि देश से कांग्रेस का सफाया हो गया और राज्यों से क्षत्रप का. यूपी में बसपा और आरएलडी जीरो पर सिमट गई जबकि सपा अपने कुनबे तक.

वहीं, बिहार में आरजेडी और जेडीयू दहाई का आंकड़ा नहीं छू पाई. इसके अलावा हरियाणा में आईएनएलडी महज दो सीट ही जीत सकी थी. हालांकि क्षेत्रीय पार्टियों में ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और जयललिता ही अपना किला बचा सके थे. इसी का नतीजा है कि मोदी के खिलाफ विपक्षी दल एकजुट होकर अपना खोया हुआ वजूद पाना चाहते हैं.

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2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी से करारी मात खाने के बाद आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव, जेडीयू के मुखिया नीतीश कुमार और कांग्रेस आपसी मतभेद भुलाकर एक साथ आए. 2015 में तीनों दल महागठबंधन बनाकर विधानसभा चुनाव लड़े तो बीजेपी चारो खाने चित हो गई. विपक्ष को पहली बार मोदी को हराने का फॉर्मूला मिला. हालांकि बाद में नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होकर बीजेपी के साथ हाथ मिलाया और सरकार चला रहे हैं.

2. यूपी में सपा को बसपा का समर्थन

2014 लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी मोदी रथ पर सवार होकर सपा, बसपा, आरएलडी सहित विपक्षी दलों का पूरी तरह से सफाया कर दिया था. इसी का नतीजा था कि गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में बसपा ने सपा को समर्थन किया. इसका नतीजा रहा कि सीएम और डिप्टी सीएम अपनी-अपनी सीट नहीं बचा सके. इसके बाद कैराना में आरएलडी को सपा, बसपा, कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष का साथ मिला, तो बीजेपी को यहां भी हार का मुंह देखना पड़ा.

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस और जेडीएस अलग होकर चुनावी मैदान में उतरे थे. चुनावी नतीजे आए तो किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला. हालांकि बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन बहुमत से महज 7 सीटें दूर थी. ऐसे में बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस ने जेडीएस से हाथ मिला लिया. कांग्रेस दूसरे नंबर की पार्टी होते हुए भी तीसरे नंबर की जेडीएस को सत्ता की कुर्सी सौंप दी. इसी का नतीजा था कि बीजेपी सरकार बनाने से महरूम रह गई.

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