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बंगाल से केरल तक... क्या मौजूदा MLA बचा पाएंगे अपनी सीट? समझें चुनावी राज्यों का पूरा समीकरण

इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मौजूदा विधायक अपनी सीट बचा पाएंगे. एग्जिट पोल भले ही बड़े उलटफेर का संकेत दे रहे हों, लेकिन पिछले चुनावों का डेटा कुछ और कहानी कहता है. पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और असम में इनकंबेंसी का असर अलग-अलग रहा है.

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पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और असम में हुए चुनाव का परिणाम 4 मई को आएगा. (Photo: Bandeep Singh)
पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और असम में हुए चुनाव का परिणाम 4 मई को आएगा. (Photo: Bandeep Singh)

चुनावी नतीजों से पहले सबसे अहम सवाल यही है कि क्या मौजूदा विधायक इस बार भी अपनी सीटें बचा पाएंगे या फिर एंटी-इनकंबेंसी की लहर उन्हें बहा ले जाएगी. पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और असम के आंकड़े इस बहस को और दिलचस्प बना देते हैं. एग्जिट पोल के संकेतों ने पहले ही सियासी हलचल तेज कर दी है. 

केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बड़े उलटफेर की संभावना जताई जा रही है. कई पोल करने वालों ने बंगाल में बीजेपी को बढ़त दी है, तो केरल में सत्ता परिवर्तन की भविष्यवाणी भी की जा रही है. हालांकि, असम और तमिलनाडु में मौजूदा विधायकों के अपनी सीटें बचाने का अनुमान लगाया गया है.

ऐसे में सवाल उठता है कि इस संभावित उथल-पुथल का मौजूदा विधायकों की संभावनाओं पर क्या असर पड़ेगा. यदि विधानसभा स्तर के पिछले तीन चुनावों के डेटा पर नजर डालें, तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है. आम धारणा के उलट, कई मामलों में मौजूदा विधायकों को स्पष्ट बढ़त मिलती रही है.

election bengal

भले ही उनकी सरकारों को चुनौतियों का सामना करना पड़ा हो, लेकिन उनकी स्थिति मजबूत रही है. हालांकि, यह फायदा हर राज्य में समान नहीं है. पश्चिम बंगाल की बात करें तो यहां एंटी-इनकंबेंसी मौजूद जरूर है, लेकिन वह पूरी तरह निर्णायक नहीं रही है. साल 2011 के चुनाव में 42 फीसदी विधायक सीट बचाने में सफल रहे थे. 

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साल 2016 में यह आंकड़ा बढ़कर 72 फीसदी हो गया, जबकि साल 2021 में यह थोड़ा घटकर 63 फीसदी रह गया. इन तीनों चुनावों को मिलाकर देखें तो औसतन 61 फीसदी मौजूदा विधायक अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे. केरल का ट्रेंड इससे बिल्कुल अलग नजर आता है. यहां मौजूदा विधायकों की सफलता दर लगातार ऊंची रही है.

Elections Verdict

साल 2011 में 78 फीसदी, साल 2016 में 76 फीसदी और साल 2021 में 84 फीसदी विधायक दोबारा जीतकर आए. इस तरह औसतन 79 फीसदी की सफलता दर, जो इन चारों राज्यों में सबसे ज्यादा है. खास बात ये है कि केरल में हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन हो जाता है. इसके बावजूद विधायकों की पकड़ मजबूत बनी रहती है.

तमिलनाडु में मुकाबला ज्यादा संतुलित दिखाई देता है. साल 2011 में सिर्फ 38 फीसदी मौजूदा विधायक अपनी सीट बचा सके, जो मजबूत एंटी-इनकंबेंसी का संकेत था. साल 2016 में यह आंकड़ा बढ़कर 50 फीसदी हो गया और साल 2021 में 61 फीसदी तक पहुंच गया. हालांकि, कुल मिलाकर तस्वीर संतुलित ही रही. 

Elections Verdictपिछले तीन चुनावों में 179 मौजूदा विधायक जीते और 180 हार गए. यानी लगभग 50 फीसदी की सफलता दर. इससे साफ होता है कि यहां मौजूदा पद पर होना न तो बड़ा फायदा देता है और न ही नुकसान, बल्कि नतीजे बड़े राजनीतिक रुझानों पर निर्भर करते हैं. असम में मतदाताओं के व्यवहार में समय के साथ बड़ा बदलाव देखने को मिला है. 

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साल 2011 में करीब आधे विधायक अपनी सीट बचाने में सफल रहे थे. 2016 में आंकड़ा गिरकर 42 फीसदी पर आ गया. लेकिन 2021 में इसमें उछाल आया और 74 फीसदी विधायक दोबारा जीत गए. कुल मिलाकर 3 चुनावों में 54 फीसदी की औसत सफलता दर दिखाती है कि मौजूदा विधायकों को मध्यम स्तर का फायदा मिलता रहा है.

Elections Verdict

इन आंकड़ों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2026 में भी यही ट्रेंड दोहराया जाएगा या फिर एग्जिट पोल के संकेत सही साबित होंगे. 4 मई को आने वाले नतीजे इस सस्पेंस से पर्दा उठाएंगे और यह साफ हो जाएगा कि इनकंबेंसी इस बार कितनी भारी पड़ी.

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