राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर लिए हैं. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शाताब्दी वर्ष पर मुंबई में आयोजित व्याख्यानमाला में बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि संघ में किसी भी जाति का व्यक्ति सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है. उन्होंने कहा कि संघ प्रमुख बनने के लिए अनुसूचित जाति या जनजाति होना कोई बाधा नहीं है और ब्राह्मण होना कोई योग्यता नहीं है.
मोहन भागवत ने कहा कि जब संघ की शुरुआत हुई थी तो उस वक्त संघ में ब्राह्मणों की संख्या ज्यादा थी, लेकिन संगठन सभी जातियों के लिए काम करता है. संघ प्रमुख ने जोर देकर कहा कि संघ का सरसंघचालक कोई ब्राह्मण नहीं बन सकता, कोई क्षत्रिय नहीं बन सकता, कोई अन्य जाति का नहीं बन सकता, हां जो कोई भी बनेगा, वो हिन्दू ही होगा.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल के सफर में छह संघ प्रमुख हुए हैं. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार आरएसएस के पहले संघ सरसंघचालक थे. मौजूदा समय में मोहन भागवत संघ प्रमुख हैं. हेडगेवार से लेकर भागवत तक आरएसएस के जितने संघ प्रमुख रहे हैं, उनमें पांच ब्राह्मण समाज से रहे हैं और एक प्रो. राजेंद्र सिंह 'रज्जू भैया' राजपूत यानि ठाकुर समाज से रहे हैं. आइए जानते हैं संघ के कौन-कौन सरसंघचालक रहे हैं?
आरएसएस के पहले प्रमुख डॉ हेडगेवार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 27 सितंबर 1925 को दशहरा के दिन महाराष्ट्र के नागपुर में हुई. संघ के पहले सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार बने, जो नागपुर के एक ब्राह्मण परिवार से थे. संघ की स्थापना भले ही 1925 में हुई, लेकिन सरसंघचालक के रूप में हेडगेवार के नाम की घोषणा चार साल बाद 10 नवंबर, 1929 को की गई थी. वो 1940 तक संघ प्रमुख रहे.
डॉ. हेडगेवार, जो पहले कांग्रेस से जुड़े थे. उन्होंने कांग्रेस से अपना अलग रास्ता तय करने से पहले 1920 में नागपुर में आयोजित कांग्रेस के सम्मेलन में हिस्सा लिया था. 'जंगल सत्याग्रह' में भाग लेने के कारण डॉ. हेडगेवार को 1930 में जेल में डाल दिया गया था. उनके जेल में रहने के दौरान, डॉ. एलवी परांजपे कुछ समय के लिए आरएसएस के सरसंघचालक थे. जेल से लौटने के बाद हेडगेवार ने संघ की कमान संभाल ली और 1940 में उनका निधन हो गया.
गोलवलकर संघ के दूसरे प्रमुख बने
डॉ. हेडगेवार के बाद आरएसएस की कमान माधवराव सदाशिव गोलवलकर को मिली, जिन्हें 'गुरुजी' के नाम से जाना जाता था. गोलवलकर ने 34 साल की उम्र में संघ के सरसंघचालक का जिम्मा संभाला और वे मराठी करहाड़े ब्राह्मण परिवार से थे. उनका जन्म 19 फरवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक (नागपुर के पास) में हुआ था. गोलवलकर अपने जीवन के अंतिम समय तक संघ की विचारधारा के लिए समर्पित रहे.
गोलवलकर ने आरएसएस प्रमुख दायित्व संभालकर संघ का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार किया. उनकी दो मुख्य पुस्तकें वी एंड अवर नेशनहुड और बंच ऑफ थॉट्स ने संघ स्वयंसेवकों को बौद्धिक चिंतन का आधार दिया. महात्मा गांधी की हत्या के तत्काल बाद गृह मंत्री सरदार पटेल ने संघ पर बैन लगाया था. 1949 में आरएसएस ने खुद को सामाजिक, संस्कृति संगठन बताते हुए राजनीति से दूर रहने का वादा किया, तब उस पर लगा प्रतिबंध हटाया गया था.
गोलवलकर ने तीन दशकों तक आरएसएस को आकार देने और पहले प्रतिबंध के झटके से संगठन को उबारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. माधवराव सदाशिव गोलवलकर का निधन 1973 में हुआ, लेकिन उससे पहले उन्होंने चार पत्र लिखे थे और उनमें से एक में उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के नाम का उल्लेख किया था.
देवरस आरएसएस के तीसरे प्रमुख बने
माधवराव सदाशिव गोलवलकर ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में बालासाहेब देवरस का नाम घोषित किया था. देवरस का जन्म भी नागपुर के ब्राह्मण परिवार में हुआ. 11 दिसंबर 1915 को जन्मे बालासाहेब देवरस ने 1973 से 1993 तक RSS की अगुवाई की. आपातकाल के दौरान (1975-77) संघ का नेतृत्व किया. बालासाहेब देवरस के सामने आपातकाल पहली बड़ी चुनौती थी, जब संघ की सभी शाखाएं बंद कर दी गईं और उन्हें गिरफ्तार कर पूना (अब पुणे) की यरवदा सेंट्रल जेल भेज दिया गया.
देवरस ने इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर आपातकाल हटाने को राजी किया था और इसके बाद स्वयंसेवकों की रिहाई हुई. देवरस ने संघ को आधुनिक रूप दिया. उन्होंने संघ शाखाओं को चुनावी इकाइयों से जोड़. उन्होंने स्वयं को एक समाज सुधारक के रूप में स्थापित किया तथा जातिगत भेदभाव और छुआछूत का कड़ा विरोध किया. उन्होंने कहा, 'यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) गलत नहीं है तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है. हम सभी एक हैं और हिंदू हैं. संघ के आधार और प्रभाव को बढ़ाने के लिए पिछड़े वर्गों और वंचित लोगों को अपने साथ जोड़ा.
रज्जू भैया संघ के चौथे सरसंघचालक
बालासाहेब मधुकर दत्तात्रेय देवरस के बाद प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैय्या) संघ के चौथे सरसंघचालक बने. देवरस ने दशकों पुरानी परंपरा तोड़ते हुए ऐलान किया था कि प्रोफेसर राजेंद्र सिंह, जिन्हें रज्जू भैया के नाम से जाना जाता है, उनके उत्तराधिकारी होंगे. आरएसएस के इतिहास में यह पहली बार था कि किसी सरसंघचालक ने जीवित रहते हुए अपने उत्तराधिकारी की घोषणा की. राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया, 1994 से 2000 तक संघ के सरसंघचालक रहे.
रज्जू भैया आरएसएस प्रमुख बनने वाले पहले गैर-महाराष्ट्रियन और गैर-ब्राह्मण समुदाय से थे. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) का जन्म 29 जनवरी 1922 को यूपी बुलंदशहर जिले के शिकारपुर तहसील स्थित बनेल गांव में हुआ था. वो क्षत्रीय समुदाय (राजपूत) समाज से थे. उन्होंने अपने छह साल के कार्यकाल में हिंदी बेल्ट में संघ को काफी विस्तार मिला. खासतौर पर संघ की जड़ें उत्तर प्रदेश में खूब गहरी कीं और संगठन को मजबूत बनाया.
केएस सुदर्शन संघ के पांचवे सरसंघचालक
राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया के बाद आरएसएस की कमान केएस सुदर्शन को सौंपी गई. केएस सुदर्शन का पूरा नाम कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन था. छत्तीसगढ़ के रायपुर से आने वाले एस सुदर्शन ब्राह्मण समाज से थे और पेश से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर थे. सुदर्शन के नेतृत्व में समाज के ज्यादा से ज्यादा वर्ग आरएसएस से जुड़े. सुदर्शन ने मुस्लिमों तक पहुंच बनाई, उनके साथ बातचीत की और उन्हें आरएसएस मुख्यालय में आमंत्रित किया. मुसलमानों की तरह उन्होंने ईसाइयों के साथ भी बातचीत की.
संघ के मौजूदा प्रमुख मोहन भागवत
संघ के मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत ने साल 2009 में आरएएसएस की कमान संभाली थी. भागवत महाराष्ट्र के करहाड़े ब्राह्मण समुदाय से हैं, जो मराठी ब्राह्मणों का एक उपसमूह है. मोहन भागवत को संघ का आधुनिकीकरण करने वाले के रूप में देखा जाता है. उन्होंने आरएसएस का विस्तार किया. भागवत की कार्यकल में न सिर्फ ने ऊंचाई को छुआ, बल्कि बीजेपी ने अपने स्वर्णिक काल में प्रवेश किया.
भागव के सरसंघचालक बनने के बाद नेतृत्व और मार्गदर्शन में संघ का तेजी से विस्तार हुआ. संघ के सौ साल का सफर भागवत के कार्यकाल में पूरा हुआ है. पिछले 100 वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छह सरसंघचालकों या प्रमुखों में से प्रत्येक ने अनेक मुद्दों से निपटने में संगठन के दृष्टिकोण में परिवर्तन किए और बदलते समय के साथ तालमेल बनाए रखने का प्रयास किया.
आरएसएस का संगठनात्मक ढांचा
आरएसएस का संगठनात्मक ढांचे में सबसे अहम पद सरसंघचालक होता है. आरएसएस में यह सबसे ऊंचा पद है, जो संगठन को वैचारिक मार्गदर्शन देते हैं. सरसंघचालक के बाद संघ में सरकार्यवाह का पद होता है, जो संघ के रोजमर्रा के कार्यों के लिए जिम्मेदार दूसरे सबसे महत्वपूर्ण पद हैं, जिन्हें 3 साल में चुना जाता है. इसके बाद सह-सरकार्यवाह का पद होता है. संघ में छह सह-सरकार्यवाह होते हैं.
संघ में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था को अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा कहा जाता है. संघ ने अपने कामकाज को बेहतर तरीके से करने के भारत को 11 क्षेत्रों में विभाजित कर रखा है, जो कई प्रांतों का कवर करते हैं. प्रांत इकाई राज्य स्तर पर होती है, उसे प्रांतीय प्रचारक कहा जाता था, जिसे बदलकर राज्य प्रचारक करने की तैयारी है. संघ में विभाग, ज़िला, खंड, मंडल और स्थानीय स्तर का ढांचा है.
आरएसएस में शाखा सबसे छोटी और आधारभूत इकाई है, जो सुबह/ शाम खुले मैदान में लगती है. मुख्य शिक्षक व कार्यवाह शाखा का प्रबंधन करने का काम करते हैं. इसे संघ की नींव कहा जाता है, जहां स्वयंसेवक शारीरिक और बौद्धिक प्रशिक्षण लेते हैं. प्रचारक ऐसे पूर्णकालिक कार्यकर्ता होते हैं, जो अपना जीवन संघ को समर्पित करते हैं.