उत्तर प्रदेश की 11 राज्यसभा सीटों पर हो रहे चुनाव के लिए सपा और बीजेपी ने अपने-अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है. दोनों ही दलों ने राज्यसभा के जरिए 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए सियासी समीकरण साधने का दांव चला है, जिसके लिए बीजेपी ने सवर्ण और ओबीसी का संतुलन बनाया है तो सपा ने अपने कोर वोटबैंक के साथ-साथ गठबंधन के लिए आरएलडी को साधे रखने की कवायद की है. वहीं, यूपी में महज दो विधायकों वाली कांग्रेस सूबे से अपने किसी नेता को राज्यसभा भेजने की स्थिति में नहीं है, लेकिन 2024 के चुनाव मद्देनजर उसने दूसरे राज्यों से यूपी के नेताओं को भेजने का फैसला किया है और ब्राह्मण-मुस्लिम कार्ड खेला है.
बीजेपी ने सवर्ण-ओबीसी का बनाया संतुलन
बीजेपी ने यूपी की छह राज्यसभा सीटों पर उम्मीदवार के नामों को ऐलान किया है. सूबे में पिछड़ा वर्ग की आबादी सर्वाधिक है, जिसे देखते हुए बीजेपी ने सवर्ण और ओबीसी का दांव चला है. बीजेपी ने पिछड़ा वर्ग से सुरेंद्र सिंह नागर, बाबूराम निषाद और संगीता यादव को प्रत्याशी बनाया है जबकि सवर्ण वर्ग में ब्राह्मण समाज से लक्ष्मीकांत बाजपेयी, वैश्य से डा. राधामोहन दास अग्रवाल और क्षत्रीय समुदाय से डा. दर्शना सिंह को टिकट दिया गया है.
बीजेपी ने सूबे के जातीय समीकरण को साधने के साथ-साथ क्षेत्रीय संतुलन भी बनाने की कोशिश की है. पूर्वांचल से बुंदलेखंड और पश्चिमी यूपी तक का प्रतिनिधित्व दिया गया है. बाबूराम निषाद ओबीसी के अतिपिछड़ी जाति मल्लाह समुदाय से हैं और बुंदेलखंड के हमीरपुर से आते हैं. वर्तमान में पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम के अध्यक्ष हैं. सपा के राज्यसभा सदस्य विशंभर निषाद इसी इलाके से हैं, जिन्हें सपा इस बार नहीं भेज रही है. ऐसे में बीजेपी ने बाबूराम निषाद को टिकट देकर बड़ा दांव चल दिया है.
पूर्वांचल से पश्चिमी यूपी तक के समीकरण
पूर्वांचल में बीजेपी ने सपा के कोर वोटबैंक यादव समुदाय में सेंध लगाने के लिए संगीता यादव को राज्यसभा का कैंडिडेट बनाया है, जो चौरी-चौरा विधानसभा सीट से विधायक रही हैं. पूर्वांचल में यादव वोटर अच्छी खासी संख्या में है. ऐसे ही पार्टी डा. राधामोहन दास अग्रवाल को भी राज्यसभा भेज रही है, जिनका टिकट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर सदर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ने के कारण कट गया था. इस तरह उन्हें उचित सम्मान देकर सियासी संदेश दिया गया है. डा. दर्शना सिंह चंदौली से आती हैं और भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं.
पश्चिम यूपी के इलाके में सपा-आरएलडी की नजर गढ़ी है, जहां पर वो अपनी सियासी जमीन मजबूत करना चाहते हैं. ऐसे में बीजेपी ने पश्चिम यूपी को भी खास तवज्जो दी है. नोएडा से आने वाले सुरेंद्र सिंह नागर को दोबारा मौका दिया गया है तो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. लक्ष्मीकांत बाजपेयी को पार्टी राज्यसभा भेज रही है. लोकसभा चुनाव में ब्राह्मण और गुर्जर वोटों को थामे रखने की भी रणनीति के तहत नागर और बाजपेयी पर बीजेपी दांव खेल रही है. वहीं, विधायकों के आंकड़े को देखते हुए बीजेपी दो सीटों पर अभी भी कैंडिडेट उतार सकती है, जिसके जरिए जातीय-क्षेत्रीय समीकरणों को साधने का भरपूर प्रयास कर सकती है.
कांग्रेस ने चला ब्राह्मण-मुस्लिम दांव
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के महज दो विधायक हैं, जिनके दम पर सूबे से राज्यसभा सीट जीतने की स्थिति में वो नहीं है. लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी कांग्रेस ने दूसरे राज्यों से यूपी के तीन नेताओं को राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया है. कांग्रेस ने दो ब्राह्मण और एक मुस्लिम पर दांव खेला है. ब्राह्मण चेहरे के तौर पर प्रमोद तिवारी और राजीव शुक्ला को तो मुस्लिम चेहरे के तौर पर इमरान प्रतापगढ़ी को राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाया है. इससे साफ है कि कांग्रेस ने अपने पुराने ब्राह्मण-मुस्लिम वोटबैंक को साधने का दांव चला है.
कांग्रेस ने सात राज्यों की 10 राज्यसभा सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया है. इनमें यूपी से आने वाले नेताओं को खास तवज्जो दी गई है. कांग्रेस की केंद्रीय कार्यसमिति के सदस्य प्रमोद तिवारी को राजस्थान से टिकट दिया गया है. पूर्व सांसद राजीव शुक्ला को छत्तीसगढ़ से तो इमरान प्रतापगढ़ी महाराष्ट्र के कोटे से प्रत्याशी बनाए गए हैं. प्रमोद तिवारी और इमरान प्रतापगढ़ी मूल रूप से प्रतापगढ़ के रहने वाले हैं जबकि राजीव शुक्ला कानपुर के निवासी हैं.
राजीव शुक्ला और प्रमोद तिवारी को 2024 के चुनाव से पहले अपना राजनीतिक कौशल साबित करना होगा. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में साल 2023 में विधानसभा चुनाव है. इसके बावजूद स्थानीय किसी बड़े नेता को राज्यसभा भेजने के बजाय पार्टी ने इन्हें तवज्जो दी है. इससे साफ जाहिर है कि कांग्रेस की प्राथमिकता 2024 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन करने की है, लेकिन 2022 के चुनाव में जिस तरह से ब्राह्मण बीजेपी और मुस्लिम वोटर्स सपा के साथ एकमुश्त गए हैं, उन्हें कांग्रेस वापस लाने के लिए यह दांव चला गया है ताकि सूबे मुस्लिम-ब्राह्मण समीकरण को फिर से अमलीजामा पहनाने में सफल हो सके.
सपा का जाट-मुस्लिम कॉम्बिनेशन
सपा ने राज्यसभा चुनाव के जरिए जातीय और सियासी समीकरण का तवज्जो दी है. सपा ने भी यूपी में अपने कोटे की तीन राज्यसभा सीटों के लिए कपिल सिब्बल, जावेद अली खान और जयंत चौधरी को प्रत्याशी बनाया है. सपा ने निर्दलीय कपिल सिब्बल को समर्थन देकर अपने नेता आजम खान की नाराजगी को दूर करने का दांव चला. इसके अलावा लोकसभा चुनाव में आरएलडी के साथ गठबंधन को बनाए रखने के मद्देनजर जयंत चौधरी को समर्थन दिया है. जबकि अपने खाते से पार्टी जावेद अली खान को फिर से राज्यसभा भेज रही है. इस तरह से सपा ने जाट-मुस्लिम समीकरण को साधे रखने की कवायद की है.