पश्चिम बंगाल को ममता बनर्जी का सबसे मजबूत दुर्ग माना जाता था, जहां पर बीजेपी ने कमल खिलाकर इतिहास रच दिया है. विपक्ष के सबसे बड़ी 'क्षत्रप' रही ममता बनर्जी की सियासत को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से उनका उभर पाना मुश्किल दिख रहा है. बीजेपी 207 सीटों के साथ सत्ता में आई है तो टीएमसी 80 सीटों से नीचे रह गई.
हालांकि, ममता बनर्जी ने 2021 की जीत के बाद खुद को पीएम मोदी के विकल्प के रूप में पेश करने के लिए 'विस्तार नीति' अपनाई थी. उन्होंने गोवा, त्रिपुरा और मेघालय में टीएमसी का झंडा बुलंद करने की हरसंभव कोशिश करती दिखी थी. इसके साथ ही विपक्ष का चेहरा बनने और कांग्रेस-बीजेपी के खिलाफ 'थर्ड फ्रंट' बनाने तक का दांव चला था, लेकिन पांच साल के बाद अपनी ही सियासी जमीन खो दी है.
देश के सियासी कैनवास पर 'तीसरा मोर्चा' यानि थर्ड फ्रंट एक ऐसा मृगतृष्णा रहा है, जिसके पीछे भागते-भागते ममता बनर्जी ही नहीं बल्कि कई क्षेत्रीय दिग्गजों की सियासी जमीन खिसक गई. चंद्रबाबू नायडू से लेकर केसीआर, शरद पवार और अरविंद केजरीवाल तक का सियासी हश्र सबसे सामने हैं. कांग्रेस और बीजेपी के इतर देश की सियासत में एक समानांतर धुरी बनाने की कोशिश की, उसे अपने ही गढ़ में भारी कीमत चुकानी पड़ी.
दिल्ली की दौड़ में केसीआर ने हैदराबाद खोया
तेलंगाना के 10 साल मुख्यमंत्री रहे केसीआर की कहानी 'थर्ड फ्रंट' की विफलता का सबसे ताजा और सटीक उदाहरण है. केसीआर ने 2018 का चुनाव जीतने के बाद राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बनाने के लिए गैर-कांग्रेसी दलों के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाने के लिए काफी मशक्कत की थी. इसके अलावा उन्होंने अपनी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) को भारत राष्ट्र समिति (BRS) में तब्दील तक कर दिया था.
केसीआर ने थर्ड फ्रंट बनाने के लिए पटना से लेकर लखनऊ, चेन्नई और कोलकाता तक के चक्कर लगाए थे. अखिलेश यादव से ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और एमके स्टालिन तक से मुलाकात कर विपक्षी नेताओं को गोलबंद करते नजर आए थे. केसीआर ने खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में पेश किया था, लेकिन अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के फेर में तेलंगाना की सियासत को भी खो बैठे. 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने केसीआर को उन्हीं के घर में पटखनी देकर सत्ता छीन ली. केसीआर की पार्टी न केवल सत्ता से बाहर है, बल्कि उनके कई दिग्गज नेता साथ छोड़ चुके हैं.
चंद्रबाबू नायडू की रही 2019 की 'हताश' दौड़
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने बीजेपी से गठबंधन तोड़कर थर्ड फ्रंट बनाने के लिए बहुत हाथ-पैर मारा. 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चंद्रबाबू नायडू ने जो सक्रियता दिखाई थी, वह अभूतपूर्व थी. वे कभी ममता बनर्जी के मंच पर थे, तो कभी राहुल गांधी से हाथ मिला रहे थे, वे खुद को एक ऐसे सूत्रधार के रूप में देख रहे थे जो गैर-भाजपा दलों को एक साथ लाएगा,
दिल्ली की सियासत के बेताज बादशाह बनने चक्कर में नायडू 2019 में अमरावती (आंध्र प्रदेश) हार गए. जगन मोहन रेड्डी ने उन्हें ऐसी करारी शिकस्त दी कि नायडू की राजनीति पर ही सवालिया निशान लग गया. हालांकि, राजनीति संभावनाओं का खेल है और 2024 में उन्होंने एनडीए में वापसी कर अपनी राजनीति को दोबारा से बचाई है,लेकिन 'तीसरा मोर्चा' बनाने का उनका सपना उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुआ था.
शरद पवार की उलझी राजनीतिक बिसात
एनसीपी (एसपी) के प्रमुख शरद पवार को भारतीय राजनीति का 'पितामह' कहा जाता है. उन्होंने दशकों तक क्षेत्रीय दलों को एकजुट कर एक राष्ट्रीय विकल्प देने की कोशिश की. 2019 में महाविकास अघाड़ी बनाना उनकी इसी रणनीति का हिस्सा था ताकि भाजपा को रोका जा सके. इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी चेहरे बनने के लिए हर दांव चला और राहुल गांधी पर सवालिया निशाना भी लगाया, पर कुछ हाथ नहीं आया.
शरद पवार की राजनीति का अंत उनकी अपनी ही पार्टी (NCP) के दोफाड़ होने के रूप में सामने आया. उनकेही अपने भतीजे अजित पवार ने बगावत कर दी और पार्टी भी छीन ली. शरद पवार अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर अपनी विरासत और पार्टी के नाम-निशान को बचाने की कानूनी और सियासी लड़ाई लड़ रहे हैं.
ममता और केजरीवाल का 'चेक-मेट' सियासत
ममता बनर्जी ने 2021 में पश्चिम बंगाल की भारी जीत के बाद 'खेला होबे' के नारे को दिल्ली तक ले जाने की कोशिश की. उन्होंने गोवा और त्रिपुरा जैसे राज्यों में पार्टी का विस्तार किया ताकि वे थर्ड फ्रंट का चेहरा बन सकें. इसी तरह अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के सीएम रहते हुए पंजाब की जीत के बाद गुजरात और गोवा में पूरी ताकत झोंकी.
केजरीवाल और ममता बनर्जी ने खुद को राष्ट्रीय स्तर पर पेश किया. इतना ही नहीं गैर-कांग्रेस दलों के साथ मिलकर गठबंधन तक बनाने की हरसंभव कोशिश की. ममता ने अखिलेश यादव से लेकर लालू-तेजस्वी तक से मुलाकात की थी. उनकी कोशिश थर्ड फ्रंट बनाने की रही, लेकिन सफल नहीं हो सकी. 2024 के चुनाव के लिए विपक्षी इंडिया गठबंधन से भी ममता अलग हो गई थीं, लेकिन अब बंगाल की हार के बाद उनकी राजनीति पर सवालिया निशान लग गए.
ममता बनर्जी बंगाल के बाहर तृणमूल कांग्रेस (TMC) का जादू नहीं चल पाया. वक्त ने आज उन्हें ऐसी जगह पर लाकर खड़ा कर दिया है कि 'इंडिया' गठबंधन के भीतर ही अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं. ऐसे ही आम आदमी पार्टी के विस्तार की कोशिशों में केजरीवाल ने दिल्ली की सियासत गंवा दी. इसके बाद आम आदमी पार्टी ने हुई टूट ने अब पंजाब में भी मुश्किलें खड़ी कर दी है. राष्ट्रीय राजनीति के चक्कर में दिल्ली मॉडल की चमक भी धुंधली पड़ने लगी.
'थर्ड फ्रंट' क्यों बन जाता नेताओं का गेम ओवर
भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे की असफलता के पीछे कुछ बुनियादी कारण रहे हैं. तीसरे मोर्चे के नेताओं में 'कॉमन मिनिमम प्रोग्राम' से ज्यादा 'पीएम पद' की चाहत हावी रहती है. ममता, केजरीवाल और नीतीश कुमार जैसे नेता एक-दूसरे के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते. जब कोई क्षेत्रीय नेता राष्ट्रीय राजनीति में अधिक समय बिताने लगता है, इस चक्कर में अपनी जमीन ही खो बैठते हैं?
1990 के दशक में तीसरा मोर्चा इसलिए सफल हो जाता था, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस दोनों कमजोर थीं. मौजूदा सियासत में भाजपा एक बेहद अनुशासित और मजबूत कैडर वाली पार्टी है, जो किसी भी अस्थिर गठबंधन को टिकने नहीं देती. मौजूदा दौर की राजनीति में के क्षत्रपों ने जब-जब अपनी सीमाएं लांघकर दिल्ली की ओर रुख किया, उनके अपने राज्यों के किले दरकने लगे.
तेलंगाना में केसीआर की हार, पवार की पार्टी का टूटना और नायडू का फिर से एनडीए की शरण में जाना यह साबित करता है कि भारत की वर्तमान राजनीति अब 'त्रिकोणीय' मुकाबले के बजाय दो ध्रुवों (NDA बनाम विपक्ष) की ओर बढ़ रही है. ऐसे में 'थर्ड फ्रंट' की कोशिश केवल उन नेताओं के राजनीतिक पतन का कारण बन रही है. इन नेताओं के लिए सबक साफ है कि दिल्ली दूर है, पहले अपना घर बचाएं.