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महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें ही क्यों रखी गईं आरक्षित? ये हैं 3 मुख्य वजह

लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पास हो गया है. अब राज्यसभा की बारी है. हालांकि 1990 के दशक से ही राजनीति में महिला आरक्षण के मुद्दे को पिछड़ी जातियों के उत्थान का मुकाबला करने के लिए ऊंची जातियों की साजिश के रूप में देखा जाता रहा है. यही कारण है कि इस बार लोकसभा में भी इसका विरोध हुआ. लेकिन इसके विरोध में महज दो ही वोट पड़े.

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महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पास हो चुका है
महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पास हो चुका है

लोकसभा में बुधवार 20 सितंबर को महिला आरक्षण बिल 454 मतों से पास हो गया. इस बिल के जरिए लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित हो जाएंगी. हालांकि केंद्र सरकार के इस नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू होने में कई साल लगने की संभावना है. दरअसल, कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान भी ये बिल राज्यसभा में पेस हुआ. लेकिन जब ये लोकसभा में पहुंचा तो मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव जैसे नेताओं ने अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग कोटा इसमें नहीं होने के चलते इसका कड़ा विरोध किया था.

1990 के दशक से ही राजनीति में महिला आरक्षण के मुद्दे को पिछड़ी जातियों के उत्थान का मुकाबला करने के लिए ऊंची जातियों की साजिश के रूप में देखा जाता रहा है. यही कारण है कि इस बार लोकसभा में भी इसका विरोध हुआ. हालांकि मतदान के दौरान विरोध में महज दो ही वोट पड़े. बुधवार को बिल के खिलाफ मतदान करने वाले केवल दो सांसदों में से एक, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने संसद में ओबीसी और मुस्लिम प्रतिनिधित्व की कमी को इसका कारण बताया. उन्होंने कहा कि यह केवल सवर्ण महिलाओं को आरक्षण प्रदान करेगा. वहीं विधेयक का समर्थन करने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी कहा कि ओबीसी महिलाओं के लिए कोटा के बिना यह अधूरा है.

अब यह समझने वाली बात है कि इस महिला आरक्षण बिल को लाने के पीछे क्या राजनीति है. क्या महिला आरक्षण बिल जातीय षड्यंत्र है और कैसे केंद्र सरकार ने बिल के जरिए पिछड़ी जाति के नेताओं की शिकायतों को दूर करने की कोशिश की है.

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जेंडर कोटा बनाम मंडल राजनीति

बता दें कि सत्तारूढ़ बीजेपी का कहना है कि महिला आरक्षण बिल ने नवनिर्मित संसद के पहले सत्र को ऐतिहासिक बना दिया है. वहीं कुछ लोग इसे INDIA गठबंधन के बैनर तले पिछड़ी जाति के नेताओं के चल रहे एकीकरण को विफल करने के प्रयास के रूप में भी देख रहे हैं. कारण, विपक्षी दल जाति जनगणना और आनुपातिक आरक्षण जैसे जाति संबंधी मुद्दों के जरिए पिछड़ी जातियों को एकजुट कर रहे हैं. मंडल राजनीति की ओर विपक्षी दलों की इस पहल ने बीजेपी के लिए चिंता बढ़ा दी है, इसलिए वह सुधारात्मक उपायों की तलाश में जुट गई है. माना जा रहा है कि इस बिल को लाने के पीछे केंद्र सरकार की ये भी एक योजना हो सकती है.

महिला आरक्षण के पीछे बीजेपी की चुनावी गणना से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि जेंडर आधारित मतदान के प्रमाण बढ़ रहे हैं और पार्टी को महिला मतदाताओं के बीच समर्थन मिलना शुरू हो गया है. इसलिए, महिला आरक्षण के पीछे बीजेपी का प्लान ओबीसी वोटर की भरपाई महिला वोटर्स के जरिए करना हो सकता है.

महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण के पीछे क्या है तर्क?

जब भी महिला आरक्षण पर बहस शुरू होती है, तो एक आम सवाल जरूर पूछा जाता है. वो है महिलाओं के लिए केवल 33 प्रतिशत आरक्षण क्यों, जबकि उनकी आबादी 50 प्रतिशत है. इस सवाल का जवाब तीन अनुमानों पर आधारित है.

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पहला- सरकारी संस्थानों में महिलाओं की मौजूदगी विभिन्न मानदंड और मूल्य लाता है जो संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार करते हैं. उदाहरण के लिए, पुलिस जैसे संस्थानों में महिलाओं की बढ़ती संख्या भ्रष्टाचार और पुलिस हिंसा को कम कर सकती है, और इससे महिलाओं और अन्य हाशिये पर रहने वाले समुदायों का पुलिस में विश्वास बढ़ सकता है.

हालांकि यहां एक और सवाल उठता है कि आखिर कितनी संख्या में महिलाएं किसी संस्थानों में प्रभाव डालना शुरू करती हैं. कई रिसर्च से पता चला है कि जब संस्था की कुल संख्या में महिलाओं की उपस्थिति एक तिहाई से अधिक बढ़ने लगती है तो इसका प्रभाव पड़ने लगता है. यही कारण है कि महिलाओं की जनसंख्या 50 प्रतिशत होने के बावजूद केवल 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव किया गया है.

दूसरा- राजनीति हो या फिर सरकारी संस्थान, इनमें कुछ ही गिनी चुनी महिला नेता देखने को मिलती हैं जो किसी बड़े पद पर होती हैं. फिर वही महिला नेता लंबे समय तक राजनीति में नजर आती हैं. लेकिन महिला आरक्षण उस बैरियर को भी खत्म करने का काम करेगा.  कारण, जब महिलाओं के सीटें आरक्षित होंगी तो संबंधित समाज की महिलाओं को राजनीति में आने का मौका मिला. 

तीसरा- सरकारी संस्थानों में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी रूढ़िवादी सोच को भी कम करने में मदद मिल सकती है. उदाहरण के लिए, पुरुष यह मानकर महिलाओं के प्रति पक्षपाती हो सकते हैं कि वे अच्छे नेता नहीं हो सकतीं. हालांकि, जब वे महिलाओं को नेतृत्व करते हुए देखते हैं तो यह रूढ़िवादी सोच कम हो जाती है. जब उन्हें महिलाओं के नेतृत्व में काम करने को कहा जाता है तो इस सोच में कमी आती है.

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अमेरिकन पॉलिटिकल साइंस रिव्यू में प्रकाशित मुंबई के स्थानीय चुनावों में महिलाओं के कोटा के प्रभाव से संबंधित "क्या चुनावी कोटा वापस लेने के बाद भी काम करता है" शीर्षक से एक रिसर्च छपी. इसमें, रिखिल आर भवनानी ने दूसरे और तीसरे अनुमानों को सही करार देते हुए कुछ सबूत पेश किए हैं.

जाति बनाम महिला आरक्षण

बढ़ते बाहरी दबाव के कारण भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण का मुद्दा उठा. संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओं पर चार विश्व सम्मेलन आयोजित किए जो 1975 में मैक्सिको में, 1980 में कोपेनहेगन में, 1985 में नैरोबी में और 1995 में बीजिंग में हुए. अंतिम सम्मेलन में बीजिंग घोषणापत्र और कार्रवाई के लिए मंच तैयार किया गया जिसे 189 देशों द्वारा सर्वसम्मति से अपनाया गया. इसमें महिलाओं के लिए कोटा का प्रावधान था और भारत ने भी बीजिंग घोषणा पर काम किया.

हालांकि, जब भी सरकार ने महिला आरक्षण बिल को पास कराने की कोशिश की, तो उसे पिछड़ी जाति के नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ा. उन्होंने इसे संसद में अपने उत्थान को उलटने के लिए एक उच्च जाति की साजिश के रूप में देखा. ये मंडल आयोग की रिपोर्ट के कार्यान्वयन के कारण 1990 के दशक में शुरू हुआ था. लेकिन यह डर बिल्कुल निराधार नहीं है. जातीय अल्पसंख्यक समूहों के पुरुषों को अपने पार्टी संगठन में शक्तिशाली पदों का आनंद नहीं मिलता है. इसलिए, पार्टी नेतृत्व के लिए उन्हें टिकट देने से इनकार करना और उनकी जगह महिलाओं को टिकट देना आसान हो जाता है.

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फ्रांसेस्का आर जेन्सेनियस ने ऐसा ही मामला ओडिशा में पाया. यहां बीजू जनता दल ने आरक्षित सीटों के लिए ज्यादातर महिला उम्मीदवारों को नामित किया था. बीजेडी की महिलाओं के आरक्षण की राजनीति ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पुरुषों को उनके उच्च जाति के समकक्षों की तुलना में अधिक नुकसान पहुंचाया. ओडिशा में बीजेडी के उम्मीदवार नामांकन के मामले के रिसर्च से पता चलता है कि यह अनुमान लगाना गलत नहीं है कि महिलाओं के कोटे में पिछड़ी जाति के पुरुषों को नुकसान पहुंचाने की प्रबल क्षमता है.

केंद्र ने ओबीसी नेताओं की चिंताओं को कैसे कम किया?

लोकसभा में पास हुआ महिला आरक्षण बिल 2024 के चुनावों के बाद ही लागू हो सकेगा. कारण, इसके लिए परिसिमन और जनगणना की जरूरत है और इसमें कम से कम दो साल का वक्त लगेगा. माना जा रहा है कि मोदी सरकार ने यह प्रावधान करके पिछड़ी जाति के नेताओं की चिंताओं को कम कर दिया है. चूंकि इस बात की प्रबल संभावना है कि अगले परिसीमन में निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बढ़ जाएगी और अतिरिक्त सीटें महिलाओं के पास जाने की संभावना है. इसलिए, यह बिल संभवतः मौजूदा राजनेताओं की संभावनाओं को कम नहीं करेगा.

वहीं यह भी माना जा रहा है कि सरकार संसद में नई सीटें जोड़कर पिछड़ी जाति के नेताओं की शिकायतों का समाधान कर रही है. हालांकि राज्य विधानसभाओं के लिए भी ऐसा ही किया जाएगा, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि महिला आरक्षण बिल का पारित होना एक ऐतिहासिक विकास है और यह भारत में लैंगिक समानता हासिल करने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा. 
 
(इस आर्टिकल के लेखक अरविंद कुमार राजनीति, आईआर और फिलोसोफी विभाग में पीएचडी विद्वान हैं और रॉयल होलोवे, लंदन यूनिवर्सिटी के कानून और अपराध विज्ञान विभाग में विजिटिंग ट्यूटर हैं.)

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