UGC ने नए इक्विटी नियम (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूशंस रेगुलेशंस) 13 जनवरी 2026 को लागू किया. इन नियमों को जातिगत भेदभाव, भेदभाव की शिकायतों और कॉलेज/यूनिवर्सिटी में समानता के दृष्टिकोण से तैयार किया गया था. लेकिन इसके अस्पष्ट प्रावधान, जनरल कैटेगरी को सुरक्षा न देना और नियमों की भाषा ने विरोध की चिंगारी भड़का दी जो इन 16 दिनों में देशव्यापी आंदोलन, इस्तीफों और अब सुप्रीम कोर्ट के 'स्टे' तक पहुंच चुकी है.
यहां देखें 16-दिन की टाइमलाइन: कैसे भड़की चिंगारी
13 जनवरी 2026
UGC ने नए प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूशंस रेगुलेशंस को नोटिफाई किया. ये नियम SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव रोकने पर केंद्रित हैं और हर कॉलेज/यूनिवर्सिटी में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स (ईओसी) और इक्विटी कमेटीज बनाना अनिवार्य करते हैं.
15-18 जनवरी
कैंपसों में विरोध के शुरुआती सुर सुने गए. कई छात्रों ने कहा कि ये नियम वर्तमान सिनेरियो को समझते हुए लागू किये नहीं गए और जनरल कैटेगरी की कोई चिंता नहीं की गई.
सोशल मीडिया पर #RollbackUGC ट्रेंड होने लगा जहां विरोध कर रहे यूजर्स ने कहा कि ये नियम अस्पष्ट हैं और भेदभाव को किसी एक समूह तक सीमित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन हो सकता है.
19-22 जनवरी
इस दौरान छात्र संगठनों ने कई कैंपसों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए. छात्रों ने लिखित ज्ञापन, सोशल मीडिया कैंपेन और प्रदर्शन की घोषणाओं के जरिए आवाज बुलंद हुई.
23-25 जनवरी
विरोध कैंपस से बाहर सड़क तक फैल गया. लखनऊ, प्रयागराज, कानपुर, फरीदाबाद और अन्य शहरों में छात्र और युवा समूह यूजीसी नियमों के हटाने की मांग कर रहे थे.
26 जनवरी
बरेली के PCS अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने अपने प्रशासनिक पद से इस्तीफा दे दिया, यह कहते हुए कि वे नए नियमों की वजह से सामाजिक तनाव और भेदभाव बढ़ने से चिंतित हैं. इस कदम ने आंदोलन को राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ दे दिया.
27-28 जनवरी
इन दो दिनों के दौरान विरोध का स्वर और तेज हुआ. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने DU के आर्ट्स फैकल्टी के पास विरोध प्रदर्शन किया और यूजीसी मुख्यालय में ज्ञापन सौंपा.
पीलीभीत में सामान्य वर्ग के लोगों ने काले पट्टे, काले तिलक और सिर मुंडाकर विरोध जताया और राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा.
इंदौर के DAVV में करणी सेना ने नियमों के खिलाफ कड़ा विरोध किया और पुतला जलाया.
पटना में 300 से ज्यादा युवाओं ने रैली निकाली और जमकर विरोध किया.
विरोध के मुख्य कारण: क्या कहा जा रहा है?
भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट- कई लोग मानते हैं कि नियमों में भेदभाव की परिभाषा इतनी विस्तृत नहीं दी गई कि यह सभी संभव स्थितियों को कवर करे.
जनरल कैटेगरी की सुरक्षा पर सवाल- विरोधियों का आरोप है कि नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं देते और गलत आरोपों के खिलाफ उपाय मौजूद नहीं हैं.
झूठी शिकायतों के खिलाफ स्पष्ट प्रावधान नहीं- कुछ आलोचकों ने कहा कि पहले के मसौदे में ये प्रावधान थे पर अंतिम नियम में शामिल नहीं हैं.
सोशल मीडिया पर डर और अफवाहें- कई X/Reddit पोस्ट में दावा किया गया कि यह नियम 'सिविल लाइबर्टीज का उल्लंघन' या 'उच्च जातियों के खिलाफ विशेष कानून' बन सकता है. लेकिन इसका कोई सत्यापित सबूत नहीं मिला है; यह आक्रोश की भावनात्मक अभिव्यक्ति है.
सोशल मीडिया पर किस तरह विरोध उभरा
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर #RollbackUGC के साथ कई भावनात्मक आवाजें उठीं. कुछ पोस्ट्स ने बताया कि नियम बेहतर विवाद समाधान नहीं बल्कि दुरुपयोग के रास्ते खोल सकते हैं और कुछ ने दावा किया कि सामान्य वर्ग छात्रों को 'नेचुरली गिल्टी' मान लिया जाएगा.
विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी आईं सामने
बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती ने कहा कि विरोध बिल्कुल अनुचित है और नियमों का उद्देश्य समानता और संवैधानिक निर्देशों पर आधारित है, पर व्यापक परामर्श होना चाहिए था.
समाजवादी पार्टी (SP) ने नियमों का समर्थन किया, कहा कि SC/ST/OBC की प्रतिनिधित्व और सुरक्षा ऐतिहासिक और संवैधानिक आधार पर उचित है.
विश्व ब्राह्मण कल्याण परिषद ने कहा कि नियमों से प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के अधिकारों में कमी आ सकती है और संशोधन की मांग की.
आज सुप्रीम कोर्ट ने दिया 'सुप्रीम स्टे' का मतलब
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए UGC के नियमों पर फिलहाल रोक (स्टे) लगा दी है, ताकि नियमों की भाषा और संभावित दुरुपयोग, सामाजिक और संवैधानिक प्रभाव, सभी पक्षों के हितों का संतुलन जैसे पॉइंट्स का गहराई से परीक्षण किया जा सके.
कोर्ट के रुख से साफ हुआ कि यह मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक नियम नहीं रह गया, बल्कि संविधान, समानता और सामाजिक संतुलन का प्रश्न बन चुका है.
इस तरह देखा जाए तो 13 जनवरी को लागू हुआ UGC का नियम अब 16 दिनों में सड़क, राजनीति, सोशल मीडिया और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर बड़े मुद्दे में बदल चुका है. विरोध का स्वर सामान्य वर्ग सुरक्षा, अस्पष्ट परिभाषा और संभावित दुरुपयोग के इर्द-गिर्द रचा गया है, जबकि सरकार और कुछ दल इसे संवैधानिक सुरक्षा का कदम बताते हैं. अब अगली सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं.