सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मामले की सुनवाई में कहा कि अदालत चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती है. सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं तय हैं और इस चरण में कोर्ट दखल नहीं दे सकता. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मीनाक्षी नटराजन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. उनकी याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने चुनावी प्रक्रिया को जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन मामले में आदेश सुनते हुए कहा कि हमने सभी दलीलों पर ध्यान दिया. जिसमें याचिका कर्ता की ओर से बताया गया कि RO ने आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता ने अधूरा फॉर्म भरा है और अपने खिलाफ चल रहे शिकायत मामले की जानकारी नहीं दी है. इसमें यह भी कहा गया है कि याचिकाकर्ता ने मामले में लिखित दलीलें पेश की थीं, इसलिए उन्हें मामले की पूरी जानकारी थी.
याचिकाकर्ता ने RO के आदेश के खिलाफ ECI का रुख किया था, लेकिन लिखित आवेदन देने और 10 जून को पूरी ECI के सामने व्यक्तिगत रूप से दलीलें पेश करने के बावजूद ECI ने कोई आदेश पारित नहीं किया. वही याचिका कर्ता की ओर से शुरुआत में ही कहा कि संविधान के अनुच्छेद 329 b के तहत रोक (Stay) लागू नहीं होती क्योंकि याचिकाकर्ता चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से पूरा करना चाहती हैं.
क्या दी गई थीं दलीलें?
याचिका कर्ता का कहना है कि याचिका दायर करने का मकसद चुनाव में बाधा डालना नहीं है. इस मामले में RP एक्ट की धारा 33A का भी ज़िक्र किया गया है, जिसके तहत क़ानून में ऐसे लंबित मामले की जानकारी देना ज़रूरी है जिसमें 2 साल से ज़्यादा की सज़ा का प्रावधान हो और आरोप तय किए जा चुके हों. य़ह भी दलील दी गई है कि चूंकि इस मामले में अभी आरोप तय किए जाने बाकी हैं और मामले का संज्ञान (cognizance) भी नहीं लिया गया है इसलिए नामांकन रद्द करना स्पष्ट रूप से ग़ैर-क़ानूनी और मनमाना है.
कोर्ट के सामने MS गिल 1975 और अशोक कुमार 2004 के मामलों के आधार पर यह भी दलील दी गई है कि संविधान चुनाव से जुड़े विवादों पर विचार करने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाता, जब याचिका में मांगी गई राहत चुनाव में बाधा डालने के लिए नहीं, बल्कि उसे सुचारू रूप से जारी रखने के लिए हो.
वही ECI के लिए पेश वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्री नायडू, मुकुल रोहतगी और मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से SG तुषार मेहता ने न केवल याचिका में की गई मांग का विरोध किया साथ ही उन्होंने इस याचिका को सुनवाई के योग्य होने का भी विरोध किया. इन सभी की और से एकमत दलील दी कि चुनाव लड़ने का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है, और भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर नहीं की जा सकती क्योंकि किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है.
उन्होंने यह भी दलील दी कि यह क़ानून अच्छी तरह से स्थापित है कि जब किसी चुनाव में प्रस्तावित उम्मीदवार का नामांकन किसी भी आधार पर रद्द किया जाता है, तो एकमात्र उपाय चुनाव याचिका दायर करना होता है. इसके अलावा यह भी कहा कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 32 के तहत इस मामले पर विचार नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि फॉर्म 26 के तहत जानकारी देने की ज़रूरत कानूनी प्रावधान और 'चुनाव संचालन नियम 1961' के नियम 4A के तहत बताई गई है. य़ह नियम कहता है कि उम्मीदवार या प्रस्तावक को उम्मीदवार द्वारा शपथ-पत्र (फॉर्म 26 के तहत) भी जमा करना होगा. फॉर्म 26 में अलग-अलग तरह की जानकारी होती है जिसे उम्मीदवार को बताना ज़रूरी होता है.
क्या है मामला?
बता दें कि मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को ये बड़ा राजनीतिक झटका लगा है. पार्टी उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन जांच (स्क्रूटनी) के दौरान खारिज कर दिया गया था. इसके साथ ही राज्य की तीसरी राज्यसभा सीट पर मुकाबला समाप्त हो गया और भाजपा उम्मीदवार महेश केवट का निर्विरोध निर्वाचित होना तय हो गया. बीजेपी ने कांग्रेस उम्मीदवार पर नामांकन एफिडेविट में आपराधिक मामला छिपाने का आरोप लगाया था.
जांच में सामने आया कि उन्होंने अपने हलफनामे में एक अदालती शिकायत का जिक्र नहीं किया था. इस वजह से उनका नामांकन पत्र अधूरा माना गया और उसे रद्द कर दिया गया. विधानसभा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बीजेपी के उम्मीदवार महेश केवट ने इस बारे में चुनाव अधिकारी के सामने एक शिकायत दर्ज कराई थी. इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि नटराजन ने तेलंगाना में अपने खिलाफ दर्ज एक अदालती मामले की जानकारी जानबूझकर छिपाई है.