रज्जू भैया यूं तो फिजिक्स के प्रोफेसर थे, कभी नोबेल विजेता सीवी रामन ने उन्हें साथ काम करने का प्रस्ताव भी दिया था, लेकिन उनका रचा गया एक संघ गीत ये साबित करता है कि संघ की आत्मा ही नहीं हिंदी साहित्य पर भी उनकी गहरी पकड़ थी. गीत के बोल थे -
“दसों दिशाओं में जायें
दल बादल से छा जायें
उमड़ घुमड़ कर हर धरती पर
नंदनवन सा लहरायें
ये मत समझो किसी क्षेत्र को खाली रह जाने देंगे
दानवता की बेल विषैली
कहीं नहीं छाने देंगे
जहां कहीं लू झुलसाती,
अमृत रिमझिम बरसायें
दसों दिशाओं में जायें
दल बादल से छा जायें।“
ये गीत यहां आधा ही लिखा है, लेकिन उनके इस गीत को अधिकांश स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने मन में संकल्प की तरह धारण कर लिया है. परिणाम ये निकलकर आया कि जहां संघ के संस्थापक डॉ केबी हेडगेवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अलावा दूसरा संगठन शुरू करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने के लिए वो भी 11 साल बाद लक्ष्मीबाई केलकर काफी मेहनत करनी पड़ी थी, तब जाकर राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना हो पाई थी. वहीं आज देश के हर कौने में, और हर क्षेत्र में किसी ना किसी नए संगठन का संकल्प लिया जा रहा है, नींव रखी जा रही है, या कुछ सालों पहले शुरू होकर वो संघ की मुख्य धारा में आने के लिए कोशिशों में लगा है.
कुछ संगठन तो ऐसे शुरू हुए कि RSS ने उन्हें विभागों के रूप में अपना लिया, जैसे 1989 में सेवा विभाग शुरू किया गया, 1993-94 में सम्पर्क व प्रचार विभाग शुरू हुए. ऐसे सैकड़ों गुमनाम नायक हैं, जो इन संगठनों की जरुरत को समझकर उन्हें इस तरह तराशने में जुटे हैं कि वो ना केवल संघ की बल्कि पूरे समाज की आवश्यकता बन जाएं. संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर लिखी जा रहीं इन 100 कहानियों की सूची की इस 100वीं कहानी में पिछले तीन चार दशक में शुरू हुए ऐसे ही संगठनों, गुमनाम नायकों-प्रचारकों-स्वयंसेवकों की चर्चा की गई है. कोशिश है कि अधिकांश को समेटा जा सके.
विज्ञान भारती
भारत एक कल्याणकारी राज्य बनने की राह पर अग्रसर है और इस दौरान उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, इन चुनौतियों की प्रकृति को देखते हुए, भारत की विरासत के अनुरूप विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तीव्र प्रगति ही इन चुनौतियों का समाधान कर सकती है. इस संदर्भ में, स्वदेशी भावना से ओतप्रोत विज्ञान आंदोलन, विज्ञान भारती की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. स्वदेशी विज्ञान आंदोलन की शुरुआत स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से स्थापित हुई देश की नंबर 1 यूनीवर्सिटी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु (IISC) में प्रोफेसर के.आई. बसु के मार्गदर्शन में कुछ प्रख्यात वैज्ञानिकों द्वारा की गई थी.
यह आंदोलन धीरे-धीरे गति पकड़ता गया और एक राष्ट्रीय स्तर के संगठन के रूप में उभरा. 20-21 अक्टूबर 1991 को नागपुर सम्मेलन में स्वदेशी विज्ञान आंदोलन को अखिल भारतीय स्तर पर शुरू करने का निर्णय लिया गया और इसे विज्ञान भारती नाम दिया गया. विज्ञान भारती की देश भर के 22 राज्यों में इकाइयां हैं और 4 राज्यों में इसके संपर्क सूत्र हैं, यह स्वायत्त संस्थानों, स्वतंत्र संगठनों और परियोजना संस्थाओं के माध्यम से 11 विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत है.
इस संस्था के संरक्षकों में इतने बड़े बड़े वैज्ञानिक हैं कि युवा हैरत में पड़ जाएंगे, संस्थापक केआई बसु तो हैं हीं, प्रोफेसर आर ए माशेलकर और डॉ अनिल काकोडकर भी हैं. इस संगठन से सुपर कम्प्यूटर परम के निर्माता विजय भाटकर और विवेक सारस्वत जैसे नाम तो जुड़े ही हुए हैं, इसके अध्यक्ष सीएसआईआर के पूर्व निदेशक डॉ शेखर सी मांडे और राष्ट्रीय संगठन मंत्री का दायित्व डॉ शिव कुमार शर्मा संभाल रहे हैं.
अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद
दत्तोपंत ठेंगड़ी कभी सरसंघचालक तो नहीं बने, लेकिन उनकी चर्चा उनसे कम नहीं होती. उन्होंने इतने संगठन खड़े किए कि लोग जानकर हैरान हो जाते हैं. राष्ट्रवादी अधिवक्ताओं (वकीलों) के संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद की स्थापना भी उन्हीं की प्रेरणा से हुई थी. 7 सितंबर 1992 को नई दिल्ली में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद का उद्घाटन करते हुए दत्तोपंत ठेंगड़ी ने अधिवक्ता परिषद के कार्यकर्ताओं के साथ भारत के पुनरोत्थान के अपने दृष्टिकोण को साझा किया.
न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को लेकर चिंतित उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के विभिन्न सम्मेलनों के संकल्पों के कार्यान्वयन न होने, समान नागरिक संहिता विकसित करने के प्रयासों की कमी, बढ़ती अलगाववादी प्रवृत्तियों, संविधान के अनुच्छेद 48 के कार्यान्वयन न होने, सस्ती और त्वरित न्याय की अनुपलब्धता और न्यायाधीशों की कमी आदि मुद्दों को उजागर किया. उन्होंने सभी कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर नए सिरे से विचार करने और कानूनों, कानूनी व्यवस्था, संविधान में संशोधन और सबसे बढ़कर इस प्रक्रिया में शामिल सभी लोगों की मानसिकता में बदलाव लाने की आवश्यकता पर बल दिया.

अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, संबद्ध राज्य निकायों के माध्यम से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अपनी इकाइयों के साथ वकीलों का एक संगठन है. यह समान दृष्टिकोण रखने वाले विभिन्न राज्य निकायों का एक छत्र संगठन है। परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की वार्षिक बैठकें देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित की जाती हैं ताकि देश के हर हिस्से से वकीलों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके.
राष्ट्रीय सम्मेलन हर तीन साल में आयोजित किया जाता है, जिसमें देश के सभी हिस्सों से सदस्य भाग लेते हैं. परिषद नियमित रूप से सम्मेलन, संगोष्ठियां और व्याख्यान आयोजित करती है जिनमें संवैधानिक, राष्ट्रीय, सामाजिक, कानूनी, पारिवारिक और समाज को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों पर चर्चा की जाती है. इसका उद्देश्य अधिवक्ताओं को उनके पेशे में बेहतर ढंग से प्रशिक्षित करना और भारतीय परंपराओं, मूल्यों और न्याय की भावना के अनुरूप न्याय के लिए बेहतर सेवा प्रदान करना है.
एकल विद्यालय संगठन
हजारों स्कूल देश में आजादी से पहले थे औऱ आजादी के बाद भी सरकारों द्वारा बनाए गए, बावजूद इसके मुख्य सड़कों से दूर या दुगर्म इलाकों के हजारों गांव स्कूलों की पहुंच से वंचित थे. शिक्षक वहां जाना नहीं चाहते थे. ऐसी मुश्किलों के चलते ही एकल विद्यालयों का जन्म हुआ. आज 4 लाख से भी ज्यादा स्वयंसेवक लाखों बच्चों को पढ़ाकर उनका जीवन व भाग्य बदल रहे हैं. एकल विद्यालय यानी एक शिक्षक वाले स्कूल. एकल विद्यालय संगठन की स्थापना की कहानी रोचक है और प्रेरक भी. 1980 के दशक के आरंभ में, आईआईटी कानपुर में परमाणु भौतिकी के प्रोफेसर डॉ. राकेश पोपली और उनकी पत्नी, प्राथमिक शिक्षा विशेषज्ञ रमा पोपली, महात्मा गांधी के इस उपदेश से प्रेरित होकर कि राष्ट्र का विकास ही सबसे महान कार्य है, ने ग्रामीण भारत में हालात सुधारने के लिए अपने पद त्याग दिए.
गुमला जिले (जो अब झारखंड में है) के ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करते समय, वे गरीबी, लैंगिक असमानता और शिक्षा तक पहुंच की कमी से ग्रस्त जीवन को देखकर दंग रह गए. समान विचारधारा वाले कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर, पोपली दंपति ने क्षेत्र की सबसे बड़ी जरूरतों का पता लगाने के लिए एक अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि शिक्षा ही भारत के ग्रामीण विकास का सबसे प्रभावी मार्ग है.
गणित, विज्ञान, भाषा, रचनात्मक कला और शारीरिक शिक्षा के समग्र पाठ्यक्रम को शामिल करते हुए, पहला एकल स्कूल 1986 में अस्तित्व में आया, जिसमें रमा पोपली शिक्षिका थीं. जब 1986 में झारखंड के धनबाद जिले में अकाल पड़ा, तो क्षेत्र में कई कोयला खदानों के मालिक मदनलाल अग्रवाल ने इलाके में 60 एकल स्कूलों की स्थापना के लिए धन देकर समुदाय की मदद करने का फैसला किया. उनके सहयोग से बच्चे तीन साल तक या जब तक वे निकटतम सरकारी स्कूल तक पैदल जाने लायक उम्र के नहीं हो जाते, तब तक मुफ्त में स्कूल जा सके.
श्याम जी गुप्ता ने लाखों के जीवन में रोशनी भर दी
श्यामजी गुप्ता 1989 में एकल टीम में शामिल हुए. स्वयंसेवकों को भर्ती करने की प्रतिभा से संपन्न श्यामजी एक उत्साही सामाजिक कार्यकर्ता थे, वे ग्रामीण भारत की स्थितियों में सुधार लाने में दृढ़ विश्वास रखते थे. श्यामजी के नेतृत्व, अग्रवाल के धन जुटाने के नेटवर्क और पोपली परिवार की शैक्षिक पृष्ठभूमि के साथ, एकल की मूल टीम पूरी हुई. तीनों ही टीमें एक भावना के साथ अलग अलग काम कर रही हैं. झारखंड में पहले 60 स्कूलों की स्थापना के बाद, पड़ोसी राज्यों में विस्तार करने के उद्देश्य से, एकल के नेताओं ने स्थानीय ग्राम पंचायतों से संपर्क किया और एकल मॉडल को प्रस्तुत किया तथा पश्चिम बंगाल और ओडिशा के पड़ोसी राज्यों में सफलतापूर्वक विस्तार किया.
सैकड़ों स्थानीय बोलियों, सीमित सड़क संपर्क और गांवों के बीच विशाल दूरी जैसी चुनौतियों के बावजूद, एकल टीम ने दृढ़ता दिखाई. स्कूलों के कुशल प्रबंधन के लिए, गांवों को 30-30 के समूहों में बांटा गया। प्रत्येक समूह का प्रबंधन एक स्वयंसेवक द्वारा किया जाता था जो गांवों के बीच यात्रा कर सके और गांवों के बीच संचार को बढ़ावा दे सके.
इस परिचालन संरचना ने शिक्षकों को अपने समूह के अन्य शिक्षकों से सीखने में सक्षम बनाया. सन 2000 तक जो 60 एकल स्कूल थे, वो 5000 पहुंच गए. तब श्यामजी ने 1 लाख स्कूलों तक पहुंचने का संकल्प बनाकर विदेशों में बसे भारतीयों से सम्पर्क किया, 2001 में रमेश शाह ने एकल यूएसए स्थापित किया, आज अमेरिका में ही उसकी 70 शाखाएं हैं जो भारत के 80 हजार एकल विद्यालयों को चलाने में सहायता कर रही हैं. अब तक 1 करोड़ से भी अधिक बच्चों को एकल विद्यालय में शिक्षित किया जा चुका है. बाद के वर्षों में एकल विद्यालय संगठन स्किल ट्रेनिंग, रोजगार और ग्रामोत्थान के क्षेत्र में एक बड़े उत्प्रेरक के रूप में उभरा है.
संस्कार भारती और चित्र साधना
बहुत कम लोगों को पता है कि डॉ हेडगेवार फिल्में देखना पसंद करते थे, फिल्म क्षेत्र के कई लोगों को उन्होंने संघ में शामिल किया था. तब मराठी फिल्मों का गढ़ था कोल्हापुर, जहां प्रतिबंध के चलते संघ का नाम था ‘राजाराम स्वयंसेवक संघ’. उसके एक कार्यक्रम के लिए वहां डॉ हेडगेवार गए तो मराठी फिल्मों के मशहूर निर्दैशक भालजी पंढारकर उनसे इतने प्रभावित हुए कि संघ के स्वयंसेवक बन गए. ऐसी कई घटनाएं हैं जब वे फिल्म के प्रीमियर तक में गए, प्रोडक्शन कम्पनी के स्टूडियोज का भी दौरा किया. नागपुर वर्ग समाप्त होने के बाद जून 1939 में समर्थ गुरु रामदास के जीवन पर बनी ‘भगवा झंडा’ फिल्म देखने गुरु गोलवलकर के साथ उस फिल्म के प्रीमियर पर गए थे, फिल्म प्रोडक्शन कम्पनी सिनेटोन के स्टूडियो भी गए थे.
लेकिन फिल्मों और थिएटर्स आदि कलाओं के क्षेत्र में इप्टा जैसा कोई संगठन खड़ा करने का विचार देर से ही उपजा. देर से ये समझा गया कि फिल्में भारतीय समाज को अपनी एजेंडा आधारित अभियान के जरिए दुष्प्रभावित कर रही हैं. धीरे धीरे समाज के कुछ हिस्सों या संगठनों की छवि उन फिल्मों के जरिए खराब की जा रही थी. वामपंथी फिल्मकारों को नेहरू सरकार से खुलकर समर्थन मिल रहा था, रूसी वामपंथी सरकार भी धन से सहायता कर रही थी. नतीजा ये हुआ कि राष्ट्रीय नायकों पर फिल्में बनना लगभग बंद ही हो गया. आज तक महाराणा प्रताप या छत्रपति शिवाजी को केन्द्र में रखकर कोई बड़ी फिल्म सामने नहीं आई है. ये दुष्प्रचार कला और अभिव्यक्ति के बाकी क्षेत्रों में भी फैलता चला गया.
हालांकि भाऊराव देवरस के मन में ये विचार दशकों से पल रहा था, साकार करने के लिए बाबा योगेन्द्र आगे आए. बाबा योगेन्द्र उत्तर प्रदेश के बस्ती के निवासी थे, पिता कांग्रेस से जुड़े थे. शहर में जब शाखा लगने लगी तो पिता को लगा कि वहां कुछ कबड्डी, कुश्ती वगैरह सीख लेगा, उन्हें शाखा भेज दिया. उन्हें क्या पता था, वहां से कभी वापस नहीं आएगा. 16 साल की आयु में नानाजी देशमुख से परिचय हुआ, जो सुबह पांच बजे उन्हें शाखा के लिए जगाने आ जाते थे. 1945 में तो उन्हें प्रचारक बनाकर नेपाल सीमा पर महाराज गंज भेज दिया गया था. कितने ही दिन उन्होंने पान के खोखे की बेंच पर सोकर गुजारीं. 1943 में ही अटलजी से हुई दोस्ती जिंदगी भर रही. प्रचारक कार्य से मन ऊब जाता था तो कला की तरफ मुड़ने लगे, नानाजी की सलाह पर विभाजन से जुड़े चित्र एकत्र करने लगे. फिर एक दिन उनकी प्रदर्शनी लगाई.
इतनी तारीफ मिली कि फिर ये अभियान बन गया, शिवाजी, धर्म गंगा, जनता की पुकार, जलता कश्मीर, संकट में गोमाता, विदेशी षडयंत्र जैसी तमाम प्रदर्शनियां लगाईं. भीमबेटका गुफाएं ढूंढने वाले हरिभाऊ वाकणकर उनकी प्रदर्शनी को अमेरिका में भी ले गए, नाम था ‘इंडियाज कंट्रीब्यूशन टू द वर्ल्ड थॉट’. भाऊराव, हरिभाऊ, माधवराव देवले व नानाजी देशमुख जैसे प्रचारकों की प्रेरणा से बाबा योगेन्द्र की अगुवाई में मकर संक्रांति के दिन 11 जनवरी 1981 को लखनऊ के रविन्द्रालय सभागार में ‘संस्कार भारती’ की नींव रखी गई. 8 कलाओं के क्षेत्रों में काम करने का संकल्प लिया गया, ये 8 क्षेत्र हैं, साहित्य, संगीत, भू - अलंकरण, नाट्य, चित्रकला, लोककला, नृत्य और प्राचीन कला. बाबा योगेन्द्र के प्रयासों से ये संगठन अब देश के 500 जिलों में 1200 से अधिक शाखाएं खोल चुका है. 2018 में बाबा योगेन्द्र को पदमश्री सम्मान मिला. 4 साल बाद लखनऊ में उनका देहांत हो गया.
बलिया के अमीर चंद 1985 में संघ के प्रचारक बने थे औऱ 2 साल बाद ही उन्हें संस्कार भारती में पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दे दी गई. अक्तूबर 2018 में संस्कार भारती के राष्ट्रीय महामंत्री बने. देश की कला, संस्कृति, लोकविधाओं, लोक कलाओं व कलाकारों के अभिभावक के रूप में लोकप्रिय अमीरचंद ने पूर्वोत्तर भारत की लोक कलाओं को देश व विदेशों में पहुंचाने का कार्य किया. पूर्वोत्तर भारत की यात्रा में ही उन्होंने 2021 में अंतिम सांस ली. अमीरचंद को अंतिम विदाई देने के लिए संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रय होसबाले खुद उनके पैतृक गांव पहुंचे, साथ में थे बाबा योगेन्द्र भी.
संस्कार भारती के पूर्व अध्यक्ष वासुदेव कामथ मशहूर चित्रकार हैं, उनको देश विदेश के कई चर्चित पुस्कारों के अलावा पदमश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है. संस्कार भारती के संगठन मंत्री अभिजीत गोखले (दादा) की अगुवाई में संस्कार भारती ने बड़ी तेजी से कई क्षेत्रों में काम करना शुरू किया है. एक तरफ संगठन ने कोरोना जैसी आपदाओं में छोटे कलाकारों और तकनीशियनों की काफी सहायता की, दूसरी तरफ फिल्मों, व वेबसीरीज के जरिए जो भारतीय संस्कृति के खिलाफ एजेंडा चलता है, उसके खिलाफ भी आवाज उठाई. साथ ही देश भर में कार्यशालाओं में भी काफी बढ़ोत्तरी की है. सिने टॉक जैसे कार्यक्रमों के जरिए देश के जाने माने फिल्मी चेहरों को मंच देने और उनके बीच संस्कार भारती का काम ले जाने में संदीप पाटिल भी अहम भूमिका निभाते रहे हैं.
2016 से भारतीय चित्र साधना नाम की संस्था भी दिल्ली में अस्तित्व में आई है. इसका उद्देश्य संस्कार भारती की तरह 8 अलग अलग क्षेत्रों के बजाय केवल फिल्मों (व शॉर्ट फिल्मों व डॉक्यूमेंट्रीज) के क्षेत्र में काम करना है. 'चित्र भारती फिल्मोत्सव' (CBFF) का आयोजन ये संस्था करती है, जो द्विवार्षिक (हर दो साल में) होता है. पहला फिल्मोत्सव राज्य के बहु-सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक केंद्र इंदौर में आयोजित किया गया था. वर्ष 2016 में राजपाल यादव, मनोज तिवारी, मधुर भंडारकर, केवी विजयेंद्र प्रसाद जैसी हस्तियों ने प्रतिभागियों और दर्शकों के साथ अपने अनुभव साझा किए थे.
उसके बाद दूसरा चित्र भारती फिल्मोत्सव 2018 राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित हुआ, इस फिल्मोत्सव में 700 से अधिक प्रविष्टियाँ आयीं थीं. वहीं, सीबीएफएफ-2020 का आयोजन अहमदाबाद में हुआ, जिसमें अन्य दिग्गजों के साथ सुभाष घई और अब्बास-मस्तान जैसे प्रख्यात फिल्म निर्देशकों की भी मास्टर क्लास थी. 2022 में ये फिल्मोत्सव भोपाल में हुआ, जिसमें अक्षय कुमार ने सभी विजेताओं को एक एक लाख का पुरस्कार अपनी तरफ से भी दिया था.
विवेक रंजन अग्निहोत्री, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, अभिनव कश्यप जैसे बड़े फिल्मी चेहरे आए. पिछला फिल्मोत्सव 2024 में चंडीगढ़ में आयोजित किया गया था. जहां लघु फिल्मों के इस उत्सव में सामाजिक विषयों पर ही प्रविष्टियां मंगाई जाती रही हैं. चित्र साधना उदीयमान फिल्म निर्देशकों और यूनीवर्सिटी छात्रों के लिए अवसरों की सीढ़ी साबित हो रहा है. संघ के सह प्रचार प्रमुख नरेन्द्र ठाकुर इस संगठन के लिए प्रेरक रहे हैं, पूर्व कुलपति बीके कुठियाला की अध्यक्षता में महासचिव अतुल गंगवार और पूर्व में आकाशादित्य लामा की भी आयोजनों में प्रमुख भूमिका रही है.
भारत विकास परिषद और लघु उद्योग भारती
भारत विकास परिषद (BVP) की स्थापना 12 जनवरी, 1963 को स्वामी विवेकानंद की जन्म शताब्दी के अवसर पर दिल्ली में हुई थी, जिसे मूल रूप से 'नागरिक समिति' के नाम से जाना जाता था, ताकि चीनी आक्रमण के समय नागरिकों को संगठित किया जा सके. बाद में 10 जुलाई, 1963 को इसे 'भारत विकास परिषद' नाम दिया गया और एक पंजीकृत संस्था के रूप में स्थापित किया गया, जिसके संस्थापक डॉ. सूरज प्रकाश और लाला हंसराज जैसे प्रमुख व्यक्ति थे, जिसका उद्देश्य सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण है. सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश बी. पी. सिन्हा पहले मुख्य संरक्षक, लाला हंस राज गुप्ता पहले अध्यक्ष और डॉ. सूरज प्रकाश पहले महासचिव बने.
आजकल इस संगठन को आम बोलचाल में रोटरी और लॉयंस क्लब के पर्याय के तौर पर जाना जाता है. राष्ट्रवादी व्यापारियों, उद्योगपतियों का ये संगठन समाज में कई तरह के सामाजिक कार्य़ करता है. 1967 में प्रथम समूह गीत प्रतियोगिता का आयोजन हुआ और अध्यक्ष जाकिर हुसैन ने विजेताओं को पुरस्कार वितरित किए. यह परिषद का पहला सार्वजनिक रूप से आयोजित प्रकल्प था. दिल्ली से बाहर परिषद की पहली शाखा 1967 में देहरादून में स्थापित की गई थी, तब ये शहर उत्तर प्रदेश में था.
1969 में भारत विकास परिषद ने ‘नीति’ पत्रिका प्रकाशित करने का निर्णय लिया और डॉ. सूरज प्रकाश इसके पहले प्रबंध संपादक बने. भारत विकास परिषद ने नई दिल्ली में 30 फीट ऊंचे चबूतरे पर छत्रपति शिवाजी महाराज की 18.5 फीट ऊंची अश्वारोही प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया. रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम ने प्रतिमा की आधारशिला रखी थी. 1973 में शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के 300वें साल में शिवाजी महाराज की एक प्रतिमा बनवाई, जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि ने अनावरित किया था.
1973 में ही अध्यक्ष के तौर पर लाला हंसराज की जगह एलएम सिंघवी ने ले ली. इमरजेंसी का प्रतिबंध झेलने के बाद परिषद ने 1982 में अपना गवर्निंग बोर्ड बनाया, सिंघवी लंदन में भारतीय उच्चायुक्त बन गए तो 1985 में जस्टिस हंसराज खन्ना इसके अध्यक्ष बने. 1988 में इसके 25 साल पूरे हुए तब तक लगभग पूरे भारत में परिषद की शाखाएं बन चुकी थीं. विकलांग सहायता, बनवासी कल्याण और विकास सप्ताह जैसे कार्यक्रम शुरू हो चुके थे. 1990 में दिल्ली में पहला विकलांग सहायता केन्द्र स्थापित किया गया.
1991 में पहले सचिव सूरज प्रकाश का देहांत हुआ तो उनकी जगह प्यारा लाल राही ने ले लीं. 1992 में इसकी विदेश में पहली शाखा कनाडा में स्थापित की गई. उसके बाद तो देश दुनियां में इतने आपदा राहत और गरीब कल्याण कार्यक्रम परिषद ने किए हैं कि किताबें भर जाएंगी. 2013 में शानदार तरीके से स्वर्ण जयंती मनाई गई. 2021 में संस्थापक सूरज प्रकाश के जन्म शताब्दी कार्यक्रम को सम्बोधित करने के लिए खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत आए. 2024 में 2 साल के लिए न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल, दुर्गा दास शर्मा और महेश बाबू गुप्ता क्रमशः राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव और राष्ट्रीय वित्त सचिव चुने गए हैं.
कभी संघ प्रमुख सुदर्शनजी और वरिष्ठ प्रचारक मदन दास देवी की प्रेरणा से लघु उद्योगों से जुड़े उद्योगपतियों के बीच शुरू हुआ संगठन लघु उद्योग भारती आज इतना बड़ा हो चुका है कि 64439 लघु उद्योगपित इससे वर्तमान में जुड़े हुए हैं, जिनमें से 5435 महिला उद्यमी हैं. देशभर में इसकी 1075 शाखाएं हैं, जिनमें से 60 शाखाएं केवल महिलाओं की हैं. देश के 596 जिलों में लघु उद्योग भारती की शाखाएं चल रही हैं. उद्योग टाइम्स नाम की इनकी एक पत्रिका निकलती है. जिसमें तमाम उद्योपतियों की कामयाबियों की कहानियां काफी प्रेरणास्पद होती हैं. इस संस्था को तमाम सरकारी समितियों और बोर्डस में जगह मिलती रही है. भारत में लघु उद्योग भारती ने इतनी ताकत अर्जित कर ली है कि उनके क्षेत्र का कोई भी कानून अब सरकारें उनसे बिना सलाह किए नहीं बना सकती हैं.
ऐसे समय में ये संगठन शुरू हुआ था जब सरकार का कोई संगठन लघु उद्योगों की समस्याएं नहीं सुनता था. ये संगठन ना केवल लघु उद्योगों के क्षेत्र में आने वाली समस्याओं के समाधान पर काम करता है बल्कि सरकारों को भी सचेत करता रहता है. साथ में भारत विकास परिषद की तरह ही समाज सेवा के काफी काम करता है, जिनमें स्किल ट्रेनिंग और रोजगार के अवसर मुहैया करवाना प्रमुख है. राष्ट्रवादी विचारों का ये संगठन 1994 में शुरू हुआ था. विश्वमित्र बहल लघु उद्योग भारती के संस्थापक अध्यक्ष थे. वर्तमान में मधुसूदन दादू हैं. इसके संगठन मंत्री का दायित्व प्रकाश चंद्रा के पास है.
जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र
ये कोई योजना बनाकर शुरू की गई संस्था नहीं थी, इसके पीछे कुछ ऐसे पत्रकार थे, जो जम्मू कश्मीर को अरसे से कवर कर रहे थे. जो और ज्यादा इस विषय में जाना चाहते थे, वो 2009 में आपस में मिले और चर्चाएं शुरू की. जाहिर था इसके लिए पढ़ना, लिखना, शोध करना शुरू किया. उन्होंने उन विशेषज्ञों से भी चर्चाएं की जो मीडिया में जम्मू कश्मीर विशेषज्ञ माने जाते थे. लेकिन ये चर्चा उलटी पड़ गईं, इन चर्चाओं के बाद उनकी समझ में आया कि सवालों के जवाब ढूंढने निकले थे लेकिन उससे भी ज्यादा सवाल खड़े हो गए हैं कि जो दिखाया जा रहा है, या बताया जा रहा है या फिर सबको पता है, जम्मू कश्मीर की सच्चाई उससे कहीं अलग है. उनकी समझ में आ गया कि पिछले कुछ सालों में कश्मीर को लेकर एक नरेटिव गढ़ा गया है, जो पूरे तथ्यों पर आधारित नहीं थी.
सो उन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए 2011 में एक समूह थिंक टैंक के रूप में बनाया गया, और उसे एक नाम दिया गया जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र. 14 मई 2013 को इस संस्था का रजिस्ट्रेशन हुआ, संयोग से ये वो दिन था जिस दिन 60 साल पहले कश्मीर से जुड़ा आर्टिकल 35A लागू हुआ था, ये संयोग ही था क्योंकि जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र के वर्तमान निदेशक आशुतोष भटनागर कहते हैं कि पंजीयन में इतनी देरी हुई कि ये तारीख आ गई, जबकि हमारी उस दिन पंजीयन की कोई पहले से योजना नहीं थी औऱ ना तब हमें पता था कि एक दिन आर्टिकल 35A भी हमारी चर्चाओं और शोध का विषय बन जाएगा. इस अध्ययन केन्द्र की सबसे खास बात थी कि मीडिया की तरह खबरें चलाने की उन्हें कोई जल्दी नहीं थी, सो सुनी-सुनाई बातों से परहेज किया, केवल मूल कागजातों, तथ्यों पर ही भरोसा किया. ये भी तय हुआ कि पूरे जम्मू कश्मीर की बात होगी यानी जो पाकिस्तान के कब्जे में है और जो उसने चीन को दे दिया है वो भी.
पिछले कुछ वर्षों में, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र (जेकेएससी) जम्मू-कश्मीर पर विस्तृत चर्चा के लिए एक प्रमुख मंच के रूप में विकसित हुआ है. आंतरिक राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों पर केंद्रित इस अध्ययन ने अब क्षेत्रीय सामाजिक-आर्थिक विकास, शासन व्यवस्था और क्षेत्र से जुड़ी वैश्विक भू-राजनीति को भी शामिल कर लिया है. भारत में अपनी 15 शाखाओं, 25 गतिविधि केंद्रों और विभिन्न सहयोगी संस्थानों के साथ, जेकेएससी ने जम्मू-कश्मीर के विकास और कल्याणकारी पहलों को आकार देने में एक प्रमुख संस्था के रूप में अपनी पहचान बनाने में महत्वपूर्ण प्रगति की है. शैक्षणिक संस्थानों और नीति निर्माताओं के साथ सहयोग के माध्यम से, जेकेएससी एक शांतिपूर्ण, समृद्ध और स्थिर जम्मू-कश्मीर की दिशा में निरंतर प्रयासरत है.
अगर आप मीडिया रिपोर्ट्स को पढ़ेंगे तो सभी ने इस संस्था के पीछे की प्रेरणा संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार को माना है. वे जम्मू कश्मीर में प्रांत प्रचारक रहे, लेकिन जब 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने बाबा अमरनाथ श्राइन बोर्ड भंग कर उसका नियंत्रण अपने हाथों में लिया तो उसका विरोध हुआ. नबी की सरकार के खिलाफ जोरदार आंदोलन चला. आखिरकार सरकार को फैसला बदलना पड़ा और फिर से श्राइन बोर्ड बहाल हुआ. संघ में सभी मानते हैं कि उस लंबे आंदोलन को जनांदोलन का रुप देने और उसे परिणाम तक पहुंचाने में अरुण कुमार ने प्रभावी और निर्णायक भूमिका निभाई.
इस घटना के एक साल के अंदर ही दिल्ली में जम्मू कश्मीर को लेकर ये समूह चर्चा शुरू हो गई थी. माना जाता है कि अरुण कुमार की प्रमुख भूमिका इसमें रही. आशुतोष भटनागर हालांकि लगातार इस समूह के साथ शुरू से ही जुड़े रहे थे. इस अध्ययन केन्द्र के संकल्पों, मुद्दों आदि को ध्यान से देखा जाए तो पता चलता है कि उन्होंने कश्मीर के इतिहास और संस्कृति पर भी काफी शोध किया, तभी दिल्ली के मंडी हाउस गोल चक्कर का नाम कश्मीर के विद्वान अभिनव गुप्त के नाम पर रखने की मांग की गई थी. इस अध्ययन केन्द्र ने कश्मीर की कलाओं, सिनेमा, साहित्य सभी विषयों पर ध्यान दिया. कई किताबें इस अध्ययन केन्द्र के शोध स्वरूप प्रकाशित हो चुकी हैं और ये अभियान अभी भी जारी है.
संघ अनंत संघ कथा अनंता...
यही सच है, संघ की कहानियों को सौ क्या एक हजार कहानियों में भी समेटना सम्भव नहीं है. सो जितना सम्भव हो पाया, आज तक की इस लेख श्रंखला में किया गया. इतने व्यापक रूप में इतने क्षेत्रों में काम हो रहा है कि अब संगठन के रूप में नहीं बल्कि थिंक टैंक्स और आयोजनों के तौर पर देश दुनियां में हो रहा है. नित नए आयोजन और संस्थाएं सामने आ रही हैं. नोएडा का प्रेरणा शोध संस्थान को जब से वरिष्ठ प्रचारक कृपाशंकरजी की अगुवाई मिली है, पूरे देश भर के विचारकों की नजरों में आ गया है, हर कोई उनके कार्यक्रमों में आने के लिए इंतजार करता है. तो वही जे नंद कुमार की अगुवाई में वैचारिक आंदोलन को मजबूत करने के लिए शुरू हुआ थिंक टैंक इतनी तेजी से विस्तारित हुआ है कि मेरठ और खंडवा जैसे शहरों में इसकी शाखाएं खुल गई हैं और सामान्य समझ बूझ रखने वाले आम लोग भी बौद्धिक चर्चाओं में भाग ले रहे हैं.
बौद्धिक चर्चाओं के आयोजन भी देश भर के तमाम शहरों में होने लगे हैं, उनको लोकप्रिय बनाने के लिए देश के अलग अलग चर्चित चेहरों को भी वहां बुला लिया जाता है. उन आयोजनों के थीम सोंग तक बनाए जा रहे हैं, तमाम किताबें बड़े चेहरों के हाथों से वहां अनावरित होती हैं तो लेखकों का भी उत्साह बढ़ता है, इन आयोजनों में दिल्ली का शब्दोत्सव, काशी शब्दोत्सव, नर्मदा साहित्य मंथन, हरियाणा फिल्मोत्सव, चित्र भारती फिल्मोत्सव, मुंबई का सिने टॉक, प्रेरणा संवाद जैसे तमाम कार्यक्रम हैं. प्रज्ञा प्रवाह के काम में जुटे प्रचारक विनय दीक्षित ने इंदौर के नर्मदा साहित्य मंथन की शुरूआत की तो दिल्ली में शब्दोत्सव में राजीव तुली की प्रमुख भूमिका रही.
तमाम संगठनों के भी सहयोगी संगठन बीच बीच में उदित होते रहे, जैसे विश्व हिंदू परिषद के सहयोगी संगठनों के तौर पर बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी जैसे संगठन अस्तित्व में आए. दधीचि देहदान समिति, उड़ान, भारत रक्षा मंच, इतिहास संकलन समिति, सहकार भारती, साहित्य परिषद, आरोग्य भारती, क्रीड़ा भारती जैसे तमाम संगठन अपने अपने क्षेत्र में उभरकर आए और इनमें से कई संगठन अपने अपने क्षेत्र में बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं. लेकिन इन लेखों में उनके ऊपर चर्चा नहीं हो पाई.
कई ऐसे भी हैं जिनका जिक्र नहीं हो पाया. ऐसे ही हजारों संघ के ऐसे स्वयंसेवक व प्रचारक हैं, जिनका संघ कार्य में, समाज कार्य में बड़ा योगदान है, लेकिन उनका जिक्र भी नहीं हो पाया. उम्मीद है कि फिर कभी ऐसी श्रंखला फिर शुरू होगी, तो उन सबके संघर्ष की कहानियां लोगों तक पहुंचाई जा सकेंगी.