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6 महीने के नोटिस पर 'वन नेशन वन इलेक्शन' को तैयार चुनाव आयोग- JPC चेयरमैन

देश में चुनावी सुधारों को लेकर बहस के बीच एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की पहल पर मंथन तेज हो गया है. विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से लगातार राय ली जा रही है. अब इस मुद्दे पर चुनाव आयोग की शुरुआती तैयारी को लेकर भी अहम जानकारी सामने आई है.

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वन नेशन वन इलेक्शन पर तेज हुई कवायद, चेयरमैन ने बताया प्रधानमंत्री का विजन. (File Photo: ITG)
वन नेशन वन इलेक्शन पर तेज हुई कवायद, चेयरमैन ने बताया प्रधानमंत्री का विजन. (File Photo: ITG)

'वन नेशन वन इलेक्शन' को लेकर केंद्र सरकार की पहल पर काम कर रही संसद की संयुक्त समिति (JPC) के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने बड़ा दावा किया है. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग (EC) ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट में समिति को बताया है कि यदि छह महीने पहले नोटिस दिया जाए तो वह लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए तैयार है.

पी.पी. चौधरी ने यह जानकारी लखनऊ में एकेडेमिया के साथ तीन दिन तक चली संयुक्त समिति की कंसल्टेशन मीटिंग के समापन के बाद दी. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित संविधान संशोधन पर अंतिम सिफारिश देने से पहले संयुक्त समिति चुनाव आयोग का विस्तृत पक्ष भी सुनेगी. उन्होंने कहा, "हम चुनाव आयोग से सुनेंगे कि वो वन नेशन वन इलेक्शन कराने की योजना कैसे बना रहा है.'' 

उन्होंने आगे कहा, ''हम उससे अपने सवाल पूछेंगे और उसके विचार सुनने के बाद ही कमेटी यह सिफारिश करेगी कि यह संभव है या नहीं." चुनाव आयोग की शुरुआती रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पोल बॉडी ने संकेत दिया है कि यदि छह महीने का एडवांस नोटिस दिया जाए तो देशभर में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं.

उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग का मानना है कि यदि संसद 2028 में कानून पारित कर देती है, तो वह 2029 से वन नेशन वन इलेक्शन कराने की स्थिति में होगा." पी.पी. चौधरी ने इस प्रस्ताव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विजन बताया. उन्होंने कहा कि 1954 से 1960 के बीच देश में बैलेट पेपर के जरिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा चुके हैं.

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उन्होंने कहा, "हम अपने मतदाताओं को कम नहीं आंक सकते. भारतीय मतदाता राजनीतिक रूप से जागरूक हैं और यह तय करने में सक्षम हैं कि उन्हें किसे वोट देना है. यही भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है." समिति के सामने पेश हुए संवैधानिक विशेषज्ञों की राय है कि यह प्रस्ताव संविधान, संघवाद या लोकतंत्र के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता.

उन्होंने विशेषज्ञों के हवाले से कहा, "यह केवल लोकसभा और विधानसभा चुनावों का एक साझा टाइमटेबल तय करने का प्रस्ताव है. इससे राज्यों की शक्तियों या अधिकारों में कोई कमी नहीं आती." संयुक्त समिति के अध्यक्ष ने दावा किया कि नागरिक समाज और आम लोगों का व्यापक समर्थन इस प्रस्ताव को मिल रहा है.

इससे पहले संयुक्त समिति ने प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयकों पर उत्तर प्रदेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों और संस्थानों के कुलपतियों, निदेशकों और विभागाध्यक्षों के साथ विस्तृत चर्चा की है. बैठक में डॉ. राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, BHU, IIIT कानपुर, IIM लखनऊ और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया.

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