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जहां हिज्बुल्लाह कर रहा फायरिंग, वहां भारत से ले जाकर लोगों को क्यों बसा रहा इजरायल, गुरुवार पहुंचे 250 व्यक्ति

मध्य-पूर्व से दूर इजरायल ने भारत में एक गुप्त मिशन को अंजाम दिया. पिछले साल बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा घोषित इजरायल ने गुरुवार को अपने 'ऑपरेशन विंग्स ऑफ़ डॉन' के तहत 'बनेई मेनाशे' समुदाय के लगभग 250 सदस्यों को हवाई मार्ग से इजरायल पहुंचाया.

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बनेई मेनाशे 2700 साल पहले इजरायल से निर्वासित हुए थे. (Photo: AP)
बनेई मेनाशे 2700 साल पहले इजरायल से निर्वासित हुए थे. (Photo: AP)

ईरान से लगभग 4000 किलोमीटर दूर इजरायल भारत में एक और ऑपरेशन चला रहा है. 'ऑपरेशन विंग्स ऑफ़ डॉन' नाम का यह मिशन भारत के पूर्वोत्तर की पहाड़ियों से शुरू होता है, जिसका मकसद 'बनेई मेनाशे' समुदाय के लगभग 5,000 सदस्यों को मणिपुर से तेल अवीव ले जाना है.  

कुछ लोगों के लिए यह एक हिंसा प्रभावित क्षेत्र से दूसरे हिंसा प्रभावित क्षेत्र की यात्रा है. लेकिन बनेई मेनाशे समुदाय के ज़्यादातर सदस्यों के लिए, जो खुद को इज़रायल की बाइबिल वाली 'खोए हुए कबीलों' में से एक का वंशज मानते हैं, यह अपने पूर्वजों के घर पहुंचने की एक लंबी यात्रा का अंत है. 

दरअसल बनेई मेनाशे पूर्वोत्तर भारत जैसे कि मिजोरम और मणिपुर के कुकी, चिन और मिजो जातीय समूहों का एक समूह है. ये समुदाय खुद को 2700 साल पहले निर्वासित हुई इजरायल की "खोई हुई जनजाति" मनस्से कबीले का वंशज मानते हैं. ये लोग पारंपरिक रूप से यहूदी धर्म का पालन करते हैं और 'शावेई इज़राइल' नामक संस्था के सहयोग से अपनी पैतृक भूमि इज़रायल लौट रहे हैं. 

इजरायली सरकार ने गुरुवार को दिल्ली के रास्ते इस समुदाय के लगभग 250 सदस्यों का पहला जत्था हवाई जहाज से भेजा. पिछले साल बेंजामिन नेतन्याहू सरकार ने भारत से समुदाय के लगभग 4600 सदस्यों को इजरायल में बसने के लिए आर्थिक मदद देने की एक पहल की घोषणा की थी. पिछले दो दशकों में लगभग 5000 लोग पहले ही इजरायल में बस चुके हैं. 

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इज़राइल के इमिग्रेशन मंत्री ओफिर सोफ़र ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "यह एक ऐसे अभियान की शुरुआत है, जिसके तहत पूरे समुदाय को इजरायल में बसने का मौका मिलेगा, हर साल 1200 लोग इजरायल में बसाए जाएंगे."

बनेई मेनाशे कौन हैं?

इजरायल का ये ऑपरेशन मन में कई जिज्ञासाएं पैदा करता है. यहूदी धर्म को मानने वाले ये लोग इजरायल से भारत के सुदूर उत्तर-पूर्व में कैसे पहुंचे? 

बाइबल के अनुसार प्राचीन इजरायल के लोग 12 कबीलों में बंटे हुए थे. इनमें से दस कबीलों के नाम याकूब के बेटों के नाम पर रखे गए थे और दो कबीलों के नाम उनके पोतों- एफ़्रैम और मनस्से के नाम पर रखे गए थे. जो यूसुफ़ के बेटे थे.

बनेई मनस्से समुदाय का दावा है कि वे मनस्से के ही वंशज हैं. 722 ईसा पूर्व में इजरायल साम्राज्य की हार के बाद असीरियाई विजेताओं ने उन्हें देश निकाला दे दिया था. फ़ारस (ईरान), अफ़गानिस्तान, तिब्बत और चीन से होते हुए सदियों की लंबी यात्रा के बाद इस समुदाय के लगभग 10000 सदस्य भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में पहुंचे और मणिपुर तथा मिज़ोरम में बस गए. 

IIT-दिल्ली के समाजशास्त्र शोधकर्ता आसफ़ रेंथलेई ने इस समुदाय की उत्पत्ति का ज़िक्र करते हुए इंडिया टुडे को कहा कि "बनेई का अर्थ है 'बच्चे', और मनस्से का अर्थ है 'पोता'."

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अब सवाल यह उठता है कि भारत ही क्यों? ऐतिहासिक रूप से यहूदियों ने भारत को हमेशा एक सुरक्षित जगह के तौर पर देखा है; क्योंकि दुनिया के अन्य हिस्सों के विपरीत उन्हें इस देश में कभी भी धार्मिक उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ा. 

मणिपुर में बनेई मनस्से समुदाय को 'कूकी' समुदाय के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है. 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी मिशनरियों के प्रभाव में आकर अधिकांश कूकी लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया था. हालांकि बनेई मनस्से समुदाय आज भी यहूदी धर्म और उसकी रीति-रिवाजों तथा परंपराओं का ही पालन करता है. 

इजरायल क्यों जाना चाहते हैं?

दरअसल धर्म उन मुख्य कारणों में से एक है जिनकी वजह से यह समुदाय इजरायल जाना चाहता है. 

मणिपुर के रहने वाले बेंजामिन हाओकिप ने 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' को बताया कि दूर-दराज की पहाड़ियों में धार्मिक सुविधाओं तक सीमित पहुंच एक बड़ी रुकावट थी. 

हाओकिप ने कहा, "यहां हम अपने सभी रीति-रिवाजों का पालन नहीं कर पाते. कुछ प्रार्थनाओं के लिए 'मिन्यान' यानी की कोरम की जरूरत होती है, जो पहाड़ियों में मिलना मुश्किल है. हम अपने धर्म के लिए इजरायल जाना चाहते हैं." 'मिन्यान' एक हिब्रू शब्द है जो धार्मिक अनुष्ठानों के लिए जरूरी 10 यहूदी वयस्कों की गणपूर्ति को दर्शाता है. 

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पारंपरिक भोजन और सांस्कृतिक संसाधनों की उपलब्धता भी इस समुदाय के सामने आने वाली एक बाधा है. समुदाय के सदस्यों ने Duolingo ऐप पर हिब्रू सीखना पहले ही शुरू कर दिया है.

पहले गाजा में बसे अब उत्तरी इजरायल में बसेंगे

पिछले साल समुदाय को बसाने की पहल की घोषणा करते हुए नेतन्याहू ने इसे एक "महत्वपूर्ण  फैसला" बताया था. 

बनेई मनस्से समुदाय के ज़्यादातर लोग जो 2005 से पहले भारत से आकर बसे थे, हेब्रोन और गाजा में बनी इज़रायली बस्तियों जैसी जगहों पर बस गए. गुरुवार को आए 250 सदस्य उत्तरी इजरायल में बसेंगे; इस इलाके के कुछ हिस्सों पर पिछले हफ़्ते ही लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन ने मिसाइलें दागी थीं. अब वहां एक नाजुक संघर्ष-विराम लागू है.

इज़राइली प्रधानमंत्री ने कहा है कि इन लोगों के वहां बसने से उत्तरी और गैलिली इलाके "मज़बूत" होंगे. 'द टाइम्स ऑफ़ इज़रायल' की रिपोर्ट के अनुसार अब इजरायली नागरिक बनने के लिए इन लोगों को अपना धर्म बदलना होगा. 

इजरायल उन्हें क्यों दूसरी जगह बसाना चाहता है?

लेकिन इजरायल के इस फ़ैसले ने इस पहल के पीछे उसके असली मकसद पर एक सवाल खड़ा कर दिया है.

इज़रायल जो गाजा में हमास के साथ और बाद में ईरान के साथ एक लंबी लड़ाई में उलझा हुआ है, उसे अब मज़दूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है. 2023 में हमास के हमले से शुरू हुए इन संघर्षों की वजह से उसके ज़्यादातर मजदूर काम छोड़कर चले गए हैं. युद्ध के कारण नेपाल और थाईलैंड जैसे देशों से आने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या में आई कमी ने भी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डाला है. 

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बनेई मेनाशे समुदाय के पुनर्वास से उनके वर्कफोर्स को फिर से भरने में मदद मिलेगी. इसरायली सरकार का इस समुदाय को गैलिली जैसे सीमावर्ती इलाकों में बसाने का कदम अरब-इजराइली आबादी में संतुलन बनाने की एक कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है.

दरअसल 2023 में इजरायल-हमास युद्ध के चरम पर मणिपुर और मिज़ोरम से आए 200 से ज़्यादा बनेई मेनाशे लोगों ने इसरायली सेना के साथ मिलकर मोर्चे पर लड़ाई लड़ी थी. भारत में जन्मे इन यहूदियों ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी. 

इस समुदाय के लिए आर्थिक पहलू भी बहुत अहम है. मणिपुर में ज़्यादातर लोग खेतों में या मजदूर के तौर पर काम करते हैं. जो लोग इजरायल चले गए हैं, वे ट्रक चला रहे हैं या कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम कर रहे हैं; वे भारत में मिलने वाले लगभग $1,200 के मुकाबले यहां लगभग $55,000 कमा रहे हैं.

मई 2023 में मणिपुर में बहुसंख्यक मेतेई और कुकी समुदायों के बीच भड़की जातीय हिंसा ने उनकी आमदनी को और भी ज़्यादा नुकसान पहुंचाया है. आज भी वहां हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं. 

हाओकिप ने कहा कि झड़पों के बाद जिंदगी और भी मुश्किल हो गई है. मणिपुर में हिब्रू के टीचर नगामथेनलाल ने NYT को बताया, "वहां इजरायल में दूसरी चीजें भी बेहतर हैं - जैसे शिक्षा."

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लेकिन सबसे मुश्किल काम है इजरायल के तकनीकी रूप से बहुत आगे बढ़े हुए माहौल में ढलना. इससे पहले इस समुदाय के जो लोग इजरायल में बस गए हैं उन्होंने नस्लवाद और आर्थिक मुश्किलों जैसी बड़ी चुनौतियों की शिकायत की है. नस्लवाद एक बड़ी समस्या है; समुदाय के लोगों को अक्सर उनके अलग दिखने की वजह से "चाइनीज" कहकर बुलाया जाता है.

फिर भी बनेई मेनाशे लोगों के लिए इजरायल की यात्रा बहुत मायने रखती है. समुदाय के एक सदस्य डैनियल हैंगशिंग ने NYT को बताया, "भारत हमारी जन्मभूमि है, लेकिन इजरायल हमारी मंजिल है. वह हमारी वादा की गई जमीन है. हमें वहीं जाना है."

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