विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है. इस बयान के बाद यह सवाल फिर से उठने लगा है कि आखिर भारत में कोई एक ऐसा डॉक्यूमेंट क्यों नहीं है जो सीधे यह बता सके कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है या नहीं.
अभी आधार कार्ड, वोटर कार्ड या पासपोर्ट में से कोई भी डॉक्यूमेंट कानूनी रूप से नागरिकता का सर्टिफिकेट नहीं माना जाता. सरकारी सूत्रों ने गुरुवार को यह भी कहा कि पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का प्रमाण नहीं रहा और मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में इस मामले में कोई नया फैसला नहीं लिया गया. साथ ही यह भी साफ किया गया कि बुधवार को इस बारे में कोई नया फैसला नहीं हुआ था.
नागरिकता एक कानूनी पहचान है जो किसी व्यक्ति के जन्म, उसके माता-पिता की स्थिति और सालों में मिले सरकारी कागजों से तय होती है. अब सवाल यह है कि जो आम पहचान पत्र हम रोज इस्तेमाल करते हैं, वो नागरिकता का सबूत क्यों नहीं हैं.
पासपोर्ट को लेकर भले ही पूरी जांच के बाद बनाया जाता है, लेकिन पासपोर्ट कानून 1967 की धारा 20 के तहत सरकार कुछ खास हालात में गैर नागरिकों को भी पासपोर्ट दे सकती है. इसी वजह से कोर्ट इसे मजबूत सबूत तो मानता है, लेकिन कानूनी प्रमाण नहीं.
आधार कार्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट और यूआईडीएआई दोनों ने साफ कहा है कि आधार सिर्फ पहचान और निवास का सबूत है, नागरिकता का नहीं. कोई भी गैर नागरिक भी तय प्रोसेस फॉलो करके आधार बनवा सकता है.
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वोटर आईडी और पैन कार्ड की बात करें तो पैन कार्ड सिर्फ टैक्स से जुड़ा डॉक्यूमेंट है. वोटर आईडी यह बताता है कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है, लेकिन यह लिस्ट समय समय पर दोबारा जांची जाती है.
चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने हाल ही में कहा था कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR के बाद जिनका नाम वोटर लिस्ट में आएगा, उन्हें भारत का नागरिक माना जा सकता है. लेकिन सिर्फ कार्ड होने से कानूनी विवाद में नागरिकता साबित नहीं होती.
तो आखिर नागरिकता साबित कैसे होती है. भारत में कोई एक यूनिवर्सल नागरिकता कार्ड नहीं है. कानूनी तौर पर नागरिकता पांच तरीकों से मिल सकती है, जन्म से, वंश यानी माता-पिता से, रजिस्ट्रेशन से, नेचुरलाइजेशन से और इनकॉर्पोरेशन से. यानी हर व्यक्ति का दावा इन पांच में से किसी एक तरीके पर निर्भर करता है.