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600 रुपये में 6000 लीटर... बेंगलुरु में जल संकट के बीच ऐसे चल रहा टैंकर माफियाओं का खेल, पढ़ें- पूरी पड़ताल

कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार का कहना है कि पिछले 30 से 40 सालों में हमने इस तरह का सूखा नहीं देखा है. हालांकि, यहां सूखे पहले भी आए हैं. लेकिन हमने इतने बड़े पैमाने पर तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया गया है.

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बेंगलुरु जल संकट
बेंगलुरु जल संकट

भारत की सिलिकॉन वैली माने जाने वाला बेंगलुरु इस समय सबसे बुरे जल संकट से गुजर रहा है. जल संकट की वजह से राज्य सरकार ने यहां के 240 में से 223 तहसीलों को सूखा घोषित कर दिया है. लेकिन बेंगलुरु की इस हालत में टैंकर माफियाओं का बहुत बड़ा हाथ है. 

इंडिया टुडे की पड़ताल में पता चला है कि अवैध तरीक से बोरवेल से पानी निकालने से लेकर मुनाफाखोरी योजनाओं तक अंडरग्राउंड नेटवर्क पानी निकालने में लगा है. 1.4 करोड़ की आबादी वाले बेंगलुरु में वॉलमार्ट, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कई अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां हैं लेकिन बेंगलुरु कमजोर मॉनसून, लगातार घट रहे भूजल, जलाशय और अत्यधिक शहरीकरण की मार झेल रहा है.

चार दशकों का सबसे बड़ा जल संकट

कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार का कहना है कि पिछले 30 से 40 सालों में हमने इस तरह का सूखा नहीं देखा है. हालांकि, यहां सूखे पहले भी आए हैं. लेकिन हमने इतने बड़े पैमाने पर तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया गया है.

बेंगलुरु में पीने के पानी की लगातार हो रही कमी के बीच इंडिया टुडे की पड़ताल में यहां वाटर टैंकर माफियाओं का पता चला है, जो बिना सरकारी रजिस्ट्रेशन के कानून की धज्जियां उड़ाते हुए धड़ल्ले से पानी बेच रहे हैं.

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लगातार घट रहे ग्राउंड वाटर से मुनाफा

इंडिया टुडे की पड़ताल में टैंकर माफिया का एक सदस्य लोकेश जिगनी इंडस्ट्रियल इलाके में बोरवेल लगाता मिला. बोरवेल के जरिए वह यहां जमीन से पानी निकालता है और बेचकर मोटा मुनाफा कमा रहा है.

इंडिया टुडे के रिपोर्टर ने खुद को मार्बल ट्रेडर बताकर लोकेश से बात की. लोकेश ने 600 रुपये में 6000 लीटर पीने का पानी देने की पेशकश की. इस दौरान उसने ये भी माना कि उनका टैंकर सरकार के नए नियमों के तहत रजिस्टर्ड नहीं है. दोनों के बीच हुई बातचीत के कुछ अंश:-

रिपोर्टर: क्या आप मार्बल कटिंग फैक्ट्री में भी पानी सप्लाई कर सकते हैं. 

लोकेश: हां, बोरवेल से करते हैं. 600 रुपये में 6000 लीटर पानी देते हैं.

रिपोर्टर: क्या आपका टैंकर सरकार के नए नियमों के तहत रजिस्टर्ड है.

लोकेश: नहीं

सरकार के नए नियमों के तहत 15 मार्च से नए बोरवेल के लिए मंजूरी लेनी जरूरी है और पीने के पानी का इस्तेमाल कार की धुलाई सहित अन्य कामों के लिए करने की मनाही है. लेकिन इसके बावजूद टैंकर माफिया लगातार पीने का पानी बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं.

बेंगलुरु के बाहर के गांवों में धड़ल्ले से टैंकर माफिया बोरिंग पम्प लगाकर पानी निकालते देखे गए. इस दौरान बोरिंग पम्प लगा रहे एक ऑपरेटर ने ग्रेनाइट फैक्ट्री में पानी की सप्लाई करने की बात स्वीकार की. उसने कहा कि ग्रेनाइट फैक्ट्री से रोजाना पानी के 20 से 30 टैंकर की डिमांड है.

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इस दौरान रिपोर्टर ने बोरवेल पम्प लगा रहे एक शख्स राजू से पूछा कि क्या ये बोरवेल खेती के लिए है. तो इस पर राजू ने कहा कि नहीं, ये पानी की सप्लाई के लिए है. यहां एक ग्रेनाइट फैक्ट्री है. वहां पानी की सप्लाई की जाती है. वहां रोजाना 20 से 30 पानी के टैंकर की डिमांड है.

वहीं, बेंगलुरु के जिगानी इंडस्ट्रियल इलाके में मार्बल कटिंग इंडस्ट्री को पानी सप्लाई करने वाले एक अन्य सप्लायर गुरुप्रकाश का कहना है कि स्थानीय अधिकारियों को घूस देकर आसानी से बोरवेल लगाए जा सकते हैं. एक बोरवेल लगाने के लिए लगभग दो लाख की रिश्वत लगती है. हमने गहरा गड्ढा खोदने के लिए तीन से साढ़े तीन लाख घूस में दिए थे.

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