मॉनसून की बारिश किसानों के लिए वरदान होती है. लेकिन कभी-कभी दूर प्रशांत महासागर में होने वाली एक घटना 'El Nino' मॉनसून की बारिश को बिगाड़ देती है. साल 2026 में अल नीनो के आने की संभावना मजबूत हो रही है, जिससे इस साल मॉनसून कमजोर पड़ सकता है. आइए जानते हैं अल नीनो आखिर है क्या, यह कैसे बनता है और भारत की बारिश पर क्या असर डालता है.
अल नीनो क्या है?
अल नीनो एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, जो प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के मध्य और पूर्वी हिस्से में होती है. अल नीनो प्रशांत महासागर में पानी के गर्म होने की स्थिति है. सामान्य दिनों में समुद्र का पानी ठंडा रहता है लेकिन अल नीनो में मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र के पानी का तापमान अधिक हो जाता है. गर्मी 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाती है. अल नीनो मॉनसून की हवाओं को कमजोर कर देता है, जिससे भारत में बारिश कम हो जाती है.
अल नीनो कैसे बनता है?
सामान्य स्थिति में पूर्वी प्रशांत (पेरू के पास) का पानी ठंडा होता है और हवाएं (ट्रेड विंड्स) पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं. ये हवाएं गर्म पानी को पश्चिम (इंडोनेशिया-ऑस्ट्रेलिया) की तरफ ढकेलती हैं. अल नीनो में ये हवाएं कमजोर हो जाती हैं या उल्टी दिशा में चलने लगती हैं. जिससे पूर्वी प्रशांत में गर्म पानी जमा हो जाता है. इससे ऊपर की हवा का दबाव बदल जाता है, बादल और बारिश का पैटर्न बिगड़ जाता है.
भारत के मॉनसून पर अल नीनो का असर
भारत का दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (जून से सितंबर) मुख्य रूप से अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी लाता है. अल नीनो इसे कमजोर कर देता है. जिससे बारिश कम होती है. अल नीनो की वजह से मॉनसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं.
अल नीनो के असर से मॉनसून प्रभावित होता है. बारिश शुरू होने में देरी हो सकती है. नमी में कमी की वजह से पूरे देश में औसत से कम बारिश होती है. वहीं, कई इलाकों में सूखा पड़ सकता है तो कई इलाकों में बारिश बहुत कम हो जाती है, खासकर उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में मॉनसून की बारिश पर असर पड़ता है.
अल नीनो के असर से गर्मी बढ़ जाती है. कम बादल होने से तापमान ज्यादा रहता है और हीटवेव बढ़ती है. इससे पहले भी अल नीनो वाले सालों में भारत में अक्सर कम बारिश हुई है. 2002, 2009, 2015 में अल नीनो ने सूखे के हालात पैदा किए थे.
मौजूदा समय में ला नीना कमजोर हो रहा है. अप्रैल 2026 में ENSO न्यूट्रल है, लेकिन मई-जुलाई से अल नीनो बनने की संभावना है. IMD और मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट एवं अन्य वेदर एजेंसियां 2026 में औसत से कम मॉनसून की बारिश की भविष्यवाणी कर रही हैं. बता दें कि ला नीना अल नीनो का उल्टा है. ला नीना में प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा ठंडा हो जाता है. जिससे भारत में अच्छी बारिश होती है.
कृषि की बात करें तो अल नीनो के असर से किसानों को नुकसान का डर होता है. खरीफ फसलें (धान, मक्का, सोयाबीन) प्रभावित होती हैं. पानी की कमी से पैदावार घट सकती है. वहीं, बांधों में कम पानी, सिंचाई और बिजली पर भी असर हो सकती है.
बता दें कि जलवायु परिवर्तन अल नीनो को और ताकतवर बना सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अल नीनो और ला नीना के प्रभाव बढ़ रहे हैं.