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अजित पवार की प्लेन क्यों हुई क्रैश? घटना के पीछे हो सकती हैं ये संभावित वजहें

महाराष्ट्र के बारामती इलाके में अजित पवार का प्लेन क्रैश होने से ठीक पहले आखिरी लम्हों में मौसम, इंसानी फैसले और सिर्फ VFR वाले एयरफील्ड का क्या रोल था?

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बारामती में हुए प्लेन क्रैश में अजित पवार की मौत हो गई. (Photo: ITG)
बारामती में हुए प्लेन क्रैश में अजित पवार की मौत हो गई. (Photo: ITG)

महाराष्ट्र के बारामती में हुए प्लेन क्रैश हादसे में गुरुवार को महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित का निधन हो गया. उनके साथ चार अन्य लोग भी मौजूद थे, जो इस हादसे में मारे गए. उन्हें ले जाने वाले Learjet 45 XR क्रैश के बाद कई सवाल उठ रहे हैं. जांचकर्ताओं ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, जबकि मीडिया हेडलाइंस में कई तरह की बातें चल रही हैं. 

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा और एक्सपर्ट एनालिसिस के आधार पर, इंडिया टुडे की OSINT टीम ने कई ऐसे संभावित सिनेरियो का मूल्यांकन किया, जो विमान के आखिरी पलों को समझा सकते हैं और हर थ्योरी की सापेक्ष ताकत का आकलन किया.

कुल मिलाकर, पहली असफल लैंडिंग से लेकर CCTV में रिकॉर्ड की गई झुकी हुई दिशा तक के सबूत पायलट के आखिरी फैसलों को समझने में मदद करते हैं. इसके साथ ही, ये दिखाते हैं कि कैसे कई रिस्की वजहें मिलकर एक घातक नतीजे की वजह बनी होंगी.

मौसम का असर...

प्लेन क्रैश होने से पहले दो बार लैंडिंग की कोशिश की गई थी. क्रू के मूवमेंट से पता चलता है कि अप्रोच के दौरान रनवे दिखाई नहीं दे रहा था, जिससे पता चलता है कि ज़मीन के पास देखने की स्थिति खराब थी. पहली कोशिश में गो-अराउंड से पता चलता है कि शुरुआत में सुरक्षित लैंडिंग जारी रखने के लिए पायलटों का रनवे से ज़रूरी विज़ुअल कॉन्टैक्ट नहीं था.

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ajit pawar plane crash

इंडियन एयर फ़ोर्स विंग कमांडर दिनेश के नायर (रिटायर्ड) ने कहा, “अगर पायलट ने विज़ुअल मिनिमम से कम होने के बावजूद लैंडिंग की कोशिश की, तो यह मौसम का नहीं जजमेंट का सवाल बन जाता है. कम विज़िबिलिटी एक वजह हो सकती है, लेकिन वहां मुख्य वजह मानवीय गलती होगी.”

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नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने बुधवार शाम को जारी एक बयान में बताया कि विजिबिलिटी करीब 3,000 मीटर थी. हालांकि, रनवे के पास हल्का कोहरा, ज़मीन पर धुंध या लोकल धुंध फाइनल अप्रोच के दौरान रनवे को छिपा सकती है.

छोटे और अनियंत्रित एयरफील्ड कम विजिबिलिटी की स्थिति में विज़ुअल भ्रम के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं. खासकर तब, जब अप्रोच लाइटिंग सीमित होती है, जिससे पायलटों के लिए रनवे को सही ढंग से देखना और उसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है.

इंजन में कोई खामी?

एक क्लीन गो-अराउंड, आखिरी पलों तक स्थिर रडार ट्रैकिंग और किसी मेडे कॉल का नहीं आना... ये सभी एक ही दिशा में इशारा करते हैं कि विमान सामान्य रूप से उड़ रहा था, जिससे किसी तरह की खराबी की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है.

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बुधवार देर रात कहानी तब बदल गई, जब CCTV फुटेज सामने आया, जिसमें विमान असामान्य झुकाव के साथ नीचे उतरता हुआ दिख रहा था.

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फ्लाइट के शुरुआती चरण या पहले अप्रोच में किसी भी चीज़ से टेक्निकल खराबी का संकेत नहीं मिला था. विमान के सफल गो-अराउंड से सामान्य इंजन परफॉर्मेंस और रिस्पॉन्सिव फ्लाइट कंट्रोल्स का पता चला. तो फिर इस झुकाव की वजह क्या है?

एक्सपर्ट्स द्वारा एनालाइज़ किए गए फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा से पता चलता है कि जेट अपने आखिरी पलों में 130-140 नॉट्स की स्पीड से उड़ रहा था, जो प्राइवेट जेट्स के लिए तय लिमिट से काफी ज़्यादा है. यह गलत रास्ते और देर से रिकवरी की कोशिशों के साथ मिलकर बताता है कि अप्रोच स्टेबल नहीं था, जिसके कारण स्थिति की जानकारी में कमी आई और असामान्य रूप से नीचे उतरना पड़ा.

क्या इंसानी गलती हुई?

बारामती जैसे अनकंट्रोल्ड, या VFR (विज़ुअल फ़्लाइट रूल्स) वाले एयरफ़ील्ड पर कोई एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर नहीं होता है. ऐसे एयरस्ट्रिप, जिनका इस्तेमाल आमतौर पर प्राइवेट जेट और सीमित कमर्शियल ट्रैफिक करते हैं, लैंडिंग के फैसले पूरी तरह पायलट के विवेक पर छोड़ देते हैं.

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पायलटों को रनवे के साथ सीधे विज़ुअल कॉन्टैक्ट और अलाइनमेंट, ऊंचाई और नीचे उतरने की दर के लिए मैनुअल जजमेंट पर निर्भर रहना पड़ता है. फैसला लेने का ज़्यादातर काम पायलट का होता है, जिसे फुल एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) सेवाओं के बजाय सिर्फ़ एक फ्लाइंग कैडेट से बेसिक ग्राउंड सलाह मिलती है.
 

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विंग कमांडर दिनेश के नायर (रिटायर्ड) कहते हैं, "दो संभावनाएं हैं- या तो मौसम खराब था और पायलट ने इसके बावजूद आगे बढ़ने का फैसला किया, या बढ़ते कॉग्निटिव प्रेशर के कारण पायलट का विज़ुअल रेफरेंस खत्म हो गया, दोनों ही बातें फैसले लेने में गलतियों की ओर इशारा करती हैं."

विंग कमांडर नायर (रिटायर्ड) इस तर्क के साथ अपनी बात रखते हैं कि हवाई दुर्घटनाओं में अस्सी फीसदी गलती इंसानी होती है, जबकि नई जानकारी सामने आने के साथ कई तरह के सिनेरियो भी मुमकिन बने हुए हैं.

जो बात सामने आती है, वह कोई एक मुख्य कारण नहीं है, बल्कि एक छोटा सा फैसला लेने का वक्त है, जिसमें मौसम की सीमाएं, सिर्फ VFR वाले एयरफील्ड की मजबूरियां, आखिरी समय में एयरक्राफ्ट का संभावित व्यवहार और इंसानी फैसला आपस में टकरा सकते हैं. हालांकि, अब आखिरी जवाब ब्लैक बॉक्स में ही मिलेंगे.

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(रिपोर्ट- विजयेश तिवारी, खुशी सोनकर)
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